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औड़िहार में गंगा तट पर महादेव व माता सती ने किया था श्रीहरि से भेंट

Wed, 29 Jul 2020 11:03 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 29 Jul 2020 11:03 PM IST
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Mahadev and Mother Sati met Srihari on the banks of the Ganges in Oudihar
भीमापार। लहुरी काशी भी पौराणिक कथाओं से भरी पड़ी है। कई कथाएं ऐसी भी हैं, जो साधारण मानव में भी भगवान के प्रति आस्था जगा देती है। सैदपुर तहसील क्षेत्र के औड़िहार बाजार के पास से गंगा किनारे स्थित वराह धाम की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। माना जाता है कि भगवान शिव और पार्वती एक अरघे में यहां विराजमान रहते हैं। सावन माह में वराह धाम में दर्शन-पूजन के लिए जनपद ही नहीं पूरे पूर्वांचल के लोग आते थे। लेकिन इस बार कोरोना संकट और लाकडाउन की वजह से मंदिरों के मुख्य द्वार बंद हैं। ऐसे में लोग बाहर से ही पूजन कर वापस लौट जा रहे हैं।
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औड़िहार के समीप स्थित वराह धाम कहे जाने वाले भूभाग पर ही कभी श्रृंगी ऋषि का आश्रम था। श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में महाराज दशरथ के यहां पुत्र्येष्टि यज्ञ संपन्न कराया था। इसके परिणाम स्वरूप भगवान नारायण ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया। अयोध्या में प्रभु श्रीराम के अवतार के बाद तो ऋषि श्रृंगी और उनके आश्रम का महात्म्य काफी बढ़ चुका था। औड़िहार स्थित उनके आश्रम में तो अन्य महान विभूतियों, ऋषियों के अलावा देवी देवता भी स्वर्ग से सीधे आगमन करने लगे थे। शांत और बड़े ही मनोहर दृश्यों से भरा रहता था ऋषि का आश्रम।
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उधर ऋषि कश्यप के पुत्र हृण्याक्ष का दक्षिण भारत पर राज था। ब्रम्हा जी से अजरता और अमरता का वरदान पाने के बाद उसने धरती को ही अपना निशाना बनाया। पृथ्वी को लेकर वह रसातल में घुस गए। तब सामान्य जनजीवन के अलावा ऋषि, मुनि और देवी देवता भी जीवन से निराश हो गए। तब करूणजनों की क्रन्दन पुकार सुनकर करूणा के सागर श्रीहरि ने वराह का रूप धारण किया। प्रभु ने हृण्याक्ष का वध करके पृथ्वी का उद्धार किया। संसार का उद्धार करने के बाद श्रीहरि का मन अपने ईष्ट देवाधिदेव महादेव से मिलने को व्याकुल हो उठा। कहते हैं कि तब श्री हरि ने महादेव से मिलने के लिए जो स्थान तय किया वह ऋषि श्रृंगी का औड़िहार स्थित आश्रम ही था। फिर तो ऋषि श्रृंगी के पावन आश्रम में श्रीहरि के स्मरण करने के बाद महादेव ने उन्हें वहां अकेले नहीं, बल्कि सती माता के साथ दिव्य दर्शन दिए। भगवान शिव और माता सती दोनों ही भगवान श्रीहरि को दर्शन देने के बाद दो शिवलिंगों के रूप में वहां पहले से स्थापित एक अरघे में विराजमान हो गए। कहते हैं कि भगवान शिव और माता सती के दो प्रतिरूपों का एक ही अरघे में दो शिवलिंगों के रूप में स्थापित मंदिर का वराह धाम के अलावा पूरे भारत में कोई दूसरा उदाहरण कहीं नहीं मिलता है। यहीं कारण है कि साल के बारहो महीने भगवान शिव के भक्तों के साथ ही श्रीहरि के भक्तों का यहां तांता लगा रहता है।
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बिड़ला समूह ने कराया पक्का घाट का निर्माण
भीमपुरा। पौराणिक काल की इन्हीं रोचक कथाओं ने देश के अग्रणी औद्योगिक घराने के बिड़ला समूह के चेयरमैन कुमार मंगलम को भी काफी प्रभावित किया। इसलिए उन्होंने वराह धाम के पास गंगाजी किनारे पक्का घाट का निर्माण कराया। जिसे आदित्य बिड़ला घाट कहा जाता है। इसके बाद वह अपनी माता और बिड़ला समूह की संरक्षक राजश्री के साथ नवंबर 2014 को वराह धाम आकर आदित्य बिड़ला घाट नाम से बने पक्का घाट को देश की जनता के नाम समर्पित भी कर दिया।
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