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Ghazipur News: बिहार तक खनक रहीं लहुरी काशी की चूड़ियां
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चूड़ियों के लिए फिरोजाबाद प्रसिद्ध है लेकिन अब रंग-बिरंगी और विभिन्न डिजाइनों की चूड़ियां जनपद में बन रही हैं। इनकी खनकने की आवाज से जनपद ही नहीं बल्कि बिहार तक गूंज रहा है। पहले जनपद के चूड़ी व्यवसायी फिरोजाबाद से चूड़ियां मंगाते थे लेकिन अब उन्हें जनपद स्तर पर ही उचित दाम में विभिन्न प्रकार की डिजाइनों की चूड़ियां उपलब्ध हो जा रही हैं।
जनपद में चूड़ी फैक्ट्री स्थापित करने का व्यावसायिक जोखिम युवा उद्यमी धर्मेंद्र मौर्या ने उठाया है। उन्होंने चार वर्ष पूर्व भदौरा क्षेत्र के लहना में चूड़ी फैक्ट्री स्थापित की, इसमें आज वह सफल हैं। चूड़ी फैक्ट्री से गांव की 12 महिलाओं को रोजगार भी मिला है। इनमें एक दिव्यांग है। फैक्ट्री में काम करने वाले श्रमिक प्रतिदिन 150 से 200 रुपये तक कमा लेते हैं। उन्हें एक चूड़ी तैयार करने के हिसाब से पारिश्रमिक मिलता है। डिजाइन और नग के कार्य के अनुसार एक चूड़ी पर श्रमिकों को 50, 60 से 70 पैसे के हिसाब से भुगतान होता है। धर्मेंद्र ने एक लाख रुपये से चूड़ी फैक्ट्री की शुरुआत की थी। आज उनका निवेश 10 लाख से ऊपर तक पहुंच चुका है। हाईस्कूल उत्तीर्ण धर्मेंद्र वर्ष 2009 में 12 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर दिल्ली पहुंच गए थे। उन्होंने वहां चूड़ी बनाने का कार्य सीखा। लगभग 10 वर्षों तक वह दिल्ली में रहे। इसके बाद वह फिरोजाबाद और अन्य स्थानों पर कार्य किए। कार्य के दौरान उनके जेहन में विचार आया कि क्यों न गांव पर चूड़ी की फैक्ट्री लगाई जाए। अपने विचार को उन्हाेंने पिता जिबोध सिंह कुशवाहा से साझा किया लेकिन वह तैयार नहीं हुए। उनकी सोच थी कि धर्मेंद्र बाहर रहकर फैक्ट्री में नौकरी करें लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत उन्होंने चूड़ी फैक्ट्री स्थापित की। इसके लिए उन्हें कर्ज तक लेना पड़ा।
धर्मेंद्र बताते हैं कि सालाना उन्हें दो लाख रुपये की बचत हो जाती है। वह जिला मुख्यालय सहित दिलदारनगर, भदौरा के अलावा बिहार के कैमूर और बक्सर में भी खुद की फैक्ट्री में निर्मित चूड़ियों को बिक्री के लिए भेजते हैं। उनकी फैक्ट्री में नग वाली चूड़ियां विभिन्न डिजाइनों और रंगों में तैयार होती हैं। कुल 607 डिजाइनों की चूड़ियां बनाई जाती हैं। जब उन्होंने फैक्ट्री की शुरुआत की थी तो वह गांव की महिलाओं को प्रशिक्षित करने के लिए फिरोजाबाद से तीन कारीगर लेकर आए थे। महिलाओं के प्रशिक्षण प्राप्त कर लेने पर दो कारीगर चले गए लेकिन एक दिव्यांग कारीगर यही रह गया, वह आज भी कार्य कर रहा है। उनकी फैक्ट्री में ज्यादातर नग वाली चूड़ियां बनती हैं। चूड़ी बनाने के लिए कच्चा माल वह दिल्ली और फिरोजाबाद से मंगाते हैं। कच्चा माल ट्रांसपोर्ट से भी आ जाता है लेकिन कभी-कभी उनको जाना पड़ता है। इससे फायदा यह होता है कि कच्चा माल के वर्तमान वाजिब दाम की जानकारी उन्हें मिलती रहती है।
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वर्तमान दौर में बेरोजगारी चरम पर है। प्रोफेशनल डिग्रियां लेकर युवा नौकरी के लिए दर-दर की ठोकर खा रहे हैं लेकिन केवल हाईस्कूल उत्तीर्ण धर्मेंद्र प्राइवेट नौकरी को ठोकर मारकर खुद के गांव में अपनी छवि एक युवा उद्यमी के रूप में बना लिए हैं। वह खुद कमाई करने के साथ ही औरों को भी रोजगार दे रहे हैं। आज के परिवेश में बेरोजगार युवाओं के लिए धर्मेंद्र मौर्य एक प्रेरणास्रोत हैं।
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जनपद में चूड़ी फैक्ट्री स्थापित करने का व्यावसायिक जोखिम युवा उद्यमी धर्मेंद्र मौर्या ने उठाया है। उन्होंने चार वर्ष पूर्व भदौरा क्षेत्र के लहना में चूड़ी फैक्ट्री स्थापित की, इसमें आज वह सफल हैं। चूड़ी फैक्ट्री से गांव की 12 महिलाओं को रोजगार भी मिला है। इनमें एक दिव्यांग है। फैक्ट्री में काम करने वाले श्रमिक प्रतिदिन 150 से 200 रुपये तक कमा लेते हैं। उन्हें एक चूड़ी तैयार करने के हिसाब से पारिश्रमिक मिलता है। डिजाइन और नग के कार्य के अनुसार एक चूड़ी पर श्रमिकों को 50, 60 से 70 पैसे के हिसाब से भुगतान होता है। धर्मेंद्र ने एक लाख रुपये से चूड़ी फैक्ट्री की शुरुआत की थी। आज उनका निवेश 10 लाख से ऊपर तक पहुंच चुका है। हाईस्कूल उत्तीर्ण धर्मेंद्र वर्ष 2009 में 12 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर दिल्ली पहुंच गए थे। उन्होंने वहां चूड़ी बनाने का कार्य सीखा। लगभग 10 वर्षों तक वह दिल्ली में रहे। इसके बाद वह फिरोजाबाद और अन्य स्थानों पर कार्य किए। कार्य के दौरान उनके जेहन में विचार आया कि क्यों न गांव पर चूड़ी की फैक्ट्री लगाई जाए। अपने विचार को उन्हाेंने पिता जिबोध सिंह कुशवाहा से साझा किया लेकिन वह तैयार नहीं हुए। उनकी सोच थी कि धर्मेंद्र बाहर रहकर फैक्ट्री में नौकरी करें लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत उन्होंने चूड़ी फैक्ट्री स्थापित की। इसके लिए उन्हें कर्ज तक लेना पड़ा।
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धर्मेंद्र बताते हैं कि सालाना उन्हें दो लाख रुपये की बचत हो जाती है। वह जिला मुख्यालय सहित दिलदारनगर, भदौरा के अलावा बिहार के कैमूर और बक्सर में भी खुद की फैक्ट्री में निर्मित चूड़ियों को बिक्री के लिए भेजते हैं। उनकी फैक्ट्री में नग वाली चूड़ियां विभिन्न डिजाइनों और रंगों में तैयार होती हैं। कुल 607 डिजाइनों की चूड़ियां बनाई जाती हैं। जब उन्होंने फैक्ट्री की शुरुआत की थी तो वह गांव की महिलाओं को प्रशिक्षित करने के लिए फिरोजाबाद से तीन कारीगर लेकर आए थे। महिलाओं के प्रशिक्षण प्राप्त कर लेने पर दो कारीगर चले गए लेकिन एक दिव्यांग कारीगर यही रह गया, वह आज भी कार्य कर रहा है। उनकी फैक्ट्री में ज्यादातर नग वाली चूड़ियां बनती हैं। चूड़ी बनाने के लिए कच्चा माल वह दिल्ली और फिरोजाबाद से मंगाते हैं। कच्चा माल ट्रांसपोर्ट से भी आ जाता है लेकिन कभी-कभी उनको जाना पड़ता है। इससे फायदा यह होता है कि कच्चा माल के वर्तमान वाजिब दाम की जानकारी उन्हें मिलती रहती है।
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वर्तमान दौर में बेरोजगारी चरम पर है। प्रोफेशनल डिग्रियां लेकर युवा नौकरी के लिए दर-दर की ठोकर खा रहे हैं लेकिन केवल हाईस्कूल उत्तीर्ण धर्मेंद्र प्राइवेट नौकरी को ठोकर मारकर खुद के गांव में अपनी छवि एक युवा उद्यमी के रूप में बना लिए हैं। वह खुद कमाई करने के साथ ही औरों को भी रोजगार दे रहे हैं। आज के परिवेश में बेरोजगार युवाओं के लिए धर्मेंद्र मौर्य एक प्रेरणास्रोत हैं।