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बेटी के बिना घर का हर सृजन अधूरा है
ब्यूरो/अमर उजाला,गाजीपुर
Updated Tue, 27 Sep 2016 12:09 AM IST
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स्थानीय एक पैलेस में चल रहे दो दिवसीय साहित्यकार सम्मेलन में दूसरे दिन रविवार की रात कार्यक्रम दो सत्र में संपन्न हुआ। प्रथम सत्र आगंतुक साहित्यकारों का रहा जिसमें प्रदेश के पर्यटन मंत्री के प्रतिनिधि मन्नू सिंह, जिला पंचायत सदस्य मनीष सिंह एवं भाजपा नेत्री सुनीता सिंह की ओर से देश के विभिन्न हिस्सों से आए रचनाकारों का स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्रम से सम्मान किया गया।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना से हुआ। इसमें पटना से आई कवयित्री आराधना प्रसाद ने "चरागे मुहब्बत जलाने से पहले, इजाजत तो ले लें जमाने से पहले "सुनाकर मंच को ऊंचाई प्रदान की। भोपाल के अशोक व्यग्र की कविता "मलिन म्लान मुख मृदा मूर्ति में प्रणव प्राण भर दे, प्रखर प्रकाश ज्ञान का भरकर दिव्य दृष्टि कर दे" को लोगों ने काफी सराहा। भोपाल के अरुण अर्णव ने "अधिक और खिल गयी पूनम की वह रात, नजरें झुकाकर कह दी, उसने मन की बात" तथा आगरा के विनोद सांवरिया की बेटी पर आधारित रचना "श्रद्धा के बिना मन का हर भजन अधूरा है, कलियों के बिना सूना हर चमन अधूरा है। तुम लाख सजा लेना अपने घर आंगन को, बेटी के बिना घर का हर सृजन अधूरा है" सुनाकर श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। अलीगढ से आए कुमार संजय की कविता "झूठ ही हंसना झूठ ही रोना झूठा कारोबार यहां, झूठ ही बिस्तर झूठ ही चादर झूठा है घर बार यहां" सुनाकर समाज में नकली संबंधों पर व्यंग्य किया। जम्मू के प्यासा अंजुम को संचालक ने आवाज दी तो हाल में काफी देर तक तालियां बजती रहीं। उनकी रचना "हमको हर बार क्यों है टाला गया, आज का काम कल पर है डाला गया। ऊंचे-ऊंचे दिखाकर ख्वाब हमें, अपनी हर बात को उछाला प्रस्तुत किया। इसके अलावा कार्यक्रम में दानिश जयपुरी, उर्मिला साव, सागर सूद, शांति कुमार स्याल, उर्मिला श्रीवास्तव, रामगरीब विकल, नीलाभ श्रीवास्तव, रमा वर्मा, नागेश शांडिल्य, अमर लाहतो, डा.संदीप, अर्जुन राही, चंद्रावती नागेश्वर, फ़जीहत गहमरी आदि कवियों ने काव्य पाठ कर कार्यक्रम में चार-चांद लगा दिया। संचालन मिथिलेश गहमरी ने किया। अंत में कार्यक्रम के आयोजक अखंड गहमरी ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।
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कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना से हुआ। इसमें पटना से आई कवयित्री आराधना प्रसाद ने "चरागे मुहब्बत जलाने से पहले, इजाजत तो ले लें जमाने से पहले "सुनाकर मंच को ऊंचाई प्रदान की। भोपाल के अशोक व्यग्र की कविता "मलिन म्लान मुख मृदा मूर्ति में प्रणव प्राण भर दे, प्रखर प्रकाश ज्ञान का भरकर दिव्य दृष्टि कर दे" को लोगों ने काफी सराहा। भोपाल के अरुण अर्णव ने "अधिक और खिल गयी पूनम की वह रात, नजरें झुकाकर कह दी, उसने मन की बात" तथा आगरा के विनोद सांवरिया की बेटी पर आधारित रचना "श्रद्धा के बिना मन का हर भजन अधूरा है, कलियों के बिना सूना हर चमन अधूरा है। तुम लाख सजा लेना अपने घर आंगन को, बेटी के बिना घर का हर सृजन अधूरा है" सुनाकर श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। अलीगढ से आए कुमार संजय की कविता "झूठ ही हंसना झूठ ही रोना झूठा कारोबार यहां, झूठ ही बिस्तर झूठ ही चादर झूठा है घर बार यहां" सुनाकर समाज में नकली संबंधों पर व्यंग्य किया। जम्मू के प्यासा अंजुम को संचालक ने आवाज दी तो हाल में काफी देर तक तालियां बजती रहीं। उनकी रचना "हमको हर बार क्यों है टाला गया, आज का काम कल पर है डाला गया। ऊंचे-ऊंचे दिखाकर ख्वाब हमें, अपनी हर बात को उछाला प्रस्तुत किया। इसके अलावा कार्यक्रम में दानिश जयपुरी, उर्मिला साव, सागर सूद, शांति कुमार स्याल, उर्मिला श्रीवास्तव, रामगरीब विकल, नीलाभ श्रीवास्तव, रमा वर्मा, नागेश शांडिल्य, अमर लाहतो, डा.संदीप, अर्जुन राही, चंद्रावती नागेश्वर, फ़जीहत गहमरी आदि कवियों ने काव्य पाठ कर कार्यक्रम में चार-चांद लगा दिया। संचालन मिथिलेश गहमरी ने किया। अंत में कार्यक्रम के आयोजक अखंड गहमरी ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।
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