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कभी बना था मिसाल... आज पहचान खो रहा सैदपुर का गांधी आश्रम

Sat, 01 Oct 2022 11:54 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sat, 01 Oct 2022 11:54 PM IST
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Gandhi Ashram of Saidpur is losing its identity today.
2 अक्तूबर को गांधी जयंती पर गांधी को देश-दुनिया में याद किया जाता है। गांधी जी साल 1928 में सैदपुर आए थे। उस दौरान बूढ़ेनाथ महादेव मंदिर पर चरखा संघ की स्थापना कर लोगों को स्वदेशी अपनाने की सीख दी थी। परिणामत के रूप में सैदपुर नगर क्षेत्र के सादात मार्ग पर लगभग 5 बीघे से अधिक भू-भाग में क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम एवं खादी उत्पत्ति केंद्र की स्थापना यहां के सौना गांव निवासी ठाकुर देव शरण सिंह ने की।
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उनके साथ गांधी विचारधारा के लोगों ने जन सहयोग से यहां एक बड़ा गांधी आश्रम तैयार करने में रुचि दिखाई। दर्जनों कमरे और बरामदे के निर्माण के साथ खादी उत्पादन के उपकरण भी लगाए गए। और यहां से तैयार की गई खादी उत्तर भारत से लगायत जम्मू काश्मीर तक अपनी पहचान बनाने में सफल रही।
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सैदपुर के क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम से खादी वस्त्रों के अलावा ऊनी शॉल दुशाले भी तैयार होने लगे। देखते ही देखते चौड़े अर्ज की धोती और चमकदार सफेद कुर्ते के कपड़े का थान देश के विभिन्न महानगरों में बिकने लगा। अब यहां के गांधी आश्रम के बदौलत घर बैठे महिलाओं को रोजी रोटी का साधन मिल गया। गांधी जी का सपना साकार हुआ।
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शुरुआती दौर में 500 से अधिक कार्यकर्ता यहां काम करते थे । लेकिन बदले परिवेश में आज गांधी आश्रम पूंजी के अभाव में दम तोड़ रहा है। जबकि एक जमाने में इस आश्रम की साफ-सफाई लोगों को प्रेरणा देती थी। बुनकर यहां आकर न केवल रोजी रोटी कमाते थे बल्कि यहां से ईमानदारी की प्रेरणा भी लेते थे। आज इस गांधी आश्रम में मात्र गिनती के 15 से 20 कार्यकर्ता रह गए हैं। गांधी जयंती पर केवल झंडा रोहण और उनके चित्र पर माल्यार्पण कर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है इससे खादी प्रेमियों को आघात लग रहा है।

सैदपुर का क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम पूंजी के अभाव में दम तोड़ रहा है। सीजन में अभी भी खादी के ऊनी सूती कपड़ों की मांग बनी है। अभी यहां बिक्री और खरीद करके कार्यकर्ताओं का वेतन भुगतान नो प्रॉफिट नो लॉस के सिद्धांत पर किया जा रहा है। इसे उबारने के लिए सरकार से अनुदान की जरूरत है।
-हरे राम चौहान, क्षेत्रीय मंत्री, श्रीगांधी आश्रम सैदपुर
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