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Ghazipur News: किताबों की महंगाई के बोझ तले हांफ रहे अभिभावक
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गाजीपुर। साल दर साल पाठ्य पुस्तकों में किए जाने वाले बदलाव और प्रतिवर्ष पाठ्य पुस्तकों की मूल्य वृद्धि के कारण अभिभावक आर्थिक बोझ तले दबते जा रहे हैं। प्रतिवर्ष फीस में बढ़ोतरी और महंगी हो रहीं किताबों का बोझ उठाने में वे खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। कई बार शिकायतों के बाद भी स्कूल संचालक तो दूर, जिम्मेदार अधिकारियों पर भी इसका प्रभाव पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है।
शिक्षा मंत्रालय और बोर्ड की ओर से समय-समय पर निर्देश जारी किया जाता है। इसके बावजूद जिले के कई निजी स्कूल एनसीईआरटी की किताबों के साथ-साथ निजी प्रकाशनों की महंगी और भारी किताबें थोप रहे हैं।
पहले एक ही पुस्तक से कई भाई-बहन पढ़ लिया करते थे लेकिन अब प्रत्येक वर्ष सिलेबस में कुछ न कुछ परिवर्तन कर देते हैं जिस कारण पुरानी किताबें बेकार हो जाती हैं। निचली क्लास से प्रमोट होने वाले बच्चों के वह किसी काम की नहीं रह जाती है।
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पुस्तकों में प्रति वर्ष कुछ पाठ में परिवर्तन कर दिया जाता है। इस कारण यह पुस्तकें खुले बाजार में नहीं मिल पाती हैं। प्रकाशन के लोग सत्रारंभ से पूर्व विभिन्न विद्यालयों के प्रबंधतंत्र से संपर्क कर उनकी मंशा की किताबें प्रकाशित कर समय से उपलब्ध करा देते हैं।
अभिभावक विनय कुमार, दिग्विजय सिंह, अश्विनी कुमार गोंड, जैनेंद्र सिंह और सिंटू यादव ने बताया कि किताबों और कॉपियों पर हर वर्ष हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं। उनका बोझ भी अत्यधिक होता है।
छोटे बच्चे इन भारी बैगों को ढोते हुए स्कूल आते-जाते हैं, जिससे उनकी पीठ, गर्दन और शरीर के अन्य हिस्सों पर असर पड़ रहा है। अभिभावकों की तरफ से शिकायत करने पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जाती।
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शिक्षा मंत्रालय और बोर्ड की ओर से समय-समय पर निर्देश जारी किया जाता है। इसके बावजूद जिले के कई निजी स्कूल एनसीईआरटी की किताबों के साथ-साथ निजी प्रकाशनों की महंगी और भारी किताबें थोप रहे हैं।
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पहले एक ही पुस्तक से कई भाई-बहन पढ़ लिया करते थे लेकिन अब प्रत्येक वर्ष सिलेबस में कुछ न कुछ परिवर्तन कर देते हैं जिस कारण पुरानी किताबें बेकार हो जाती हैं। निचली क्लास से प्रमोट होने वाले बच्चों के वह किसी काम की नहीं रह जाती है।
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पुस्तकों में प्रति वर्ष कुछ पाठ में परिवर्तन कर दिया जाता है। इस कारण यह पुस्तकें खुले बाजार में नहीं मिल पाती हैं। प्रकाशन के लोग सत्रारंभ से पूर्व विभिन्न विद्यालयों के प्रबंधतंत्र से संपर्क कर उनकी मंशा की किताबें प्रकाशित कर समय से उपलब्ध करा देते हैं।
अभिभावक विनय कुमार, दिग्विजय सिंह, अश्विनी कुमार गोंड, जैनेंद्र सिंह और सिंटू यादव ने बताया कि किताबों और कॉपियों पर हर वर्ष हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं। उनका बोझ भी अत्यधिक होता है।
छोटे बच्चे इन भारी बैगों को ढोते हुए स्कूल आते-जाते हैं, जिससे उनकी पीठ, गर्दन और शरीर के अन्य हिस्सों पर असर पड़ रहा है। अभिभावकों की तरफ से शिकायत करने पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जाती।