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राम को मनाने पहुंचे भरत, चरणपादुका लेकर लौटे
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अतिप्राचीन रामलीला कमेटी की ओर से हरिशंकरी स्थित श्रीराम सिंहासन से भरत, गुरु वशिष्ठ और शत्रुघ्न की शोभायात्रा बाजे-गाजे के साथ मुरली कटरा परसपुर, झुन्नुलाल चौराहा, आमघाट, राजकीय महिला महाविद्यालय, महुआबाग, पहाड़खां का पोखरा होते हुए सकलेनाबाद पहुंची।
लीला के दौरान भरत तथा शत्रुघ्न गुरु वशिष्ठ के आदेशानुसार अपने ननिहाल कैकेय प्रदेश से अयोध्या पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने पूरे अयोध्यावासियों को उदास देखा। माता कैकेयी के कक्ष में पहुंचकर पिता जी व बड़े भाई श्रीराम के बारे में जानकारी प्राप्त किए।
जब कैकेयी ने बताया कि पिताजी स्वर्ग को सिधार गए और श्रीराम 14 वर्ष के लिए वनवास चले गए। ये सुनते ही भरत क्रोधित हो जाते हैं। थोड़ी समय बाद जब क्रोध शांत हुआ तो राजदरबार में पहुंच कर अयोध्यावासियों के साथ अपने बड़े भाई श्रीराम को मनाने के लिए चित्रकुट जाते हैं। वहां पर श्रीराम को दंडवत प्रणाम कर अयोध्या चलने के लिए निवेदन करते हैं।
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श्रीराम ने भरत की बात को सुनकर अयोध्या जाने से इंकार करते हुए अपनी चरणपादुका (खड़ाऊं) देकर भरत को अयोध्या लौट जाने के लिए कहा। श्रीराम के आदेशानुसार महाराज भरत श्रीराम के खड़ाऊ को सिर पर रख कर अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं। इस दृश्य को देखकर पूरे दर्शनार्थी भाव विभोर हो जाते हैं।
राम ने किया खर-दूषण और ताड़का का वध
मरदह। स्थानीय गांव स्थित रामलीला मैदान में प्राचीन रामलीला कमेटी मरदह कुटी के द्वारा रामलीला का मंचन किया गया। जिसमें राम जन्म, मुनि याचना, दशरथ के पुत्र राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र का ले जाना और हवन यज्ञ सिद्ध करना, खर-दूषण वध और ताड़का वध का मंचन किया गया।
रामलीला अयोध्या में प्रभु राम का जन्म होते ही जयकारे से पूरा परिसर गूंज उठा।जंगल में राक्षसों के द्वारा ऋषि मुनियों के यज्ञ पूजा-पाठ को भंग करने से आजिज आ चुके ऋषि मुनि विश्वामित्र के द्वारा दशरथ के पुत्र राम लक्ष्मण की याचना कर जंगल में अधर्म के पर्याय बन चुके राक्षसों को मुक्ति के लिए मांग कर ले जाना और अधर्म पर जीत के लिए यज्ञ सिद्ध करना इसके साथ ताड़का का वध लीला मंचन किया गया। मंच पर ताड़का राक्षसी सेना दल बल के साथ प्रभु राम से सामना करने के लिए पहुंची, जहां ताड़का और प्रभु राम के बीच आमना-सामना हुआ। ताड़का ने ऋषि मुनियों को बेहद परेशान कर दिया था जिसको अंत प्रभु राम ने किया।
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लीला के दौरान भरत तथा शत्रुघ्न गुरु वशिष्ठ के आदेशानुसार अपने ननिहाल कैकेय प्रदेश से अयोध्या पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने पूरे अयोध्यावासियों को उदास देखा। माता कैकेयी के कक्ष में पहुंचकर पिता जी व बड़े भाई श्रीराम के बारे में जानकारी प्राप्त किए।
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जब कैकेयी ने बताया कि पिताजी स्वर्ग को सिधार गए और श्रीराम 14 वर्ष के लिए वनवास चले गए। ये सुनते ही भरत क्रोधित हो जाते हैं। थोड़ी समय बाद जब क्रोध शांत हुआ तो राजदरबार में पहुंच कर अयोध्यावासियों के साथ अपने बड़े भाई श्रीराम को मनाने के लिए चित्रकुट जाते हैं। वहां पर श्रीराम को दंडवत प्रणाम कर अयोध्या चलने के लिए निवेदन करते हैं।
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श्रीराम ने भरत की बात को सुनकर अयोध्या जाने से इंकार करते हुए अपनी चरणपादुका (खड़ाऊं) देकर भरत को अयोध्या लौट जाने के लिए कहा। श्रीराम के आदेशानुसार महाराज भरत श्रीराम के खड़ाऊ को सिर पर रख कर अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं। इस दृश्य को देखकर पूरे दर्शनार्थी भाव विभोर हो जाते हैं।
राम ने किया खर-दूषण और ताड़का का वध
मरदह। स्थानीय गांव स्थित रामलीला मैदान में प्राचीन रामलीला कमेटी मरदह कुटी के द्वारा रामलीला का मंचन किया गया। जिसमें राम जन्म, मुनि याचना, दशरथ के पुत्र राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र का ले जाना और हवन यज्ञ सिद्ध करना, खर-दूषण वध और ताड़का वध का मंचन किया गया।
रामलीला अयोध्या में प्रभु राम का जन्म होते ही जयकारे से पूरा परिसर गूंज उठा।जंगल में राक्षसों के द्वारा ऋषि मुनियों के यज्ञ पूजा-पाठ को भंग करने से आजिज आ चुके ऋषि मुनि विश्वामित्र के द्वारा दशरथ के पुत्र राम लक्ष्मण की याचना कर जंगल में अधर्म के पर्याय बन चुके राक्षसों को मुक्ति के लिए मांग कर ले जाना और अधर्म पर जीत के लिए यज्ञ सिद्ध करना इसके साथ ताड़का का वध लीला मंचन किया गया। मंच पर ताड़का राक्षसी सेना दल बल के साथ प्रभु राम से सामना करने के लिए पहुंची, जहां ताड़का और प्रभु राम के बीच आमना-सामना हुआ। ताड़का ने ऋषि मुनियों को बेहद परेशान कर दिया था जिसको अंत प्रभु राम ने किया।