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प्रदूषित जल से जलचरों के जीवन को खतरा
Updated Tue, 13 Mar 2018 12:12 AM IST
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गाजीपुर।
गंगा सहित सहायक नदियों का दायरा सिमटने से पानी भी प्रदूषित होने लगा है। इससे जलचरों के जीवन खतरे में पड़ गया है। इन्हें संकट से उबारने की कोई पहल जनपद में नहीं की जा रही है। जल प्रदूषण की वजह से जलचरों की संख्या पर भी फर्क पड़ना शुरू हो गया है। सबसे अहम बात यह है कि इन जलचरों के संरक्षण के लिए जिला प्रशासन की ओर से कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया तो स्थिति और भयावह हो सकती है। साथ ही जिला प्रशासन के लिए इनके संरक्षण के लिए कोई प्रोजेक्ट भी नहीं चलाया जा रहा है।
जिले में गंगा और गोमती दोनों प्रवाहित नदियां है, इसके अलावा गांगी, बेसो, नोन, उदंती, भैंसही, टोंस, कर्मनाशा, गोधनी, दोना और अकौंझी जैसी सहायक नदियां भी जिले में बहती हैं। गंगा में जगह-जगह बांध बनाकर बिजली उत्पादन होने के चलते इसकी प्रवाह पर अंकुश लगने से भीषण गर्मी शुरू होते ही नदी की धारा दो भाग में बंट जाती है। इसके साथ बीच में बालू का टीला दिखाई पड़ने लगता है। गोमती सहित अन्य सहायक नदियों में प्रवाह न होने से पानी प्रदूषित हो चुका है। इसके चलते गंगा सहित सहायक नदियों में रहने वाले जलचरों के जीवन पर संकट गहराता जा रहा है। जबकि इन जलचरों को बचाने के लिए शासन की ओर से तमाम वायदे किए जाते हैं। इसके बावजूद स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। सामाजिक संस्थाओं ने गंगा और सहायक नदियों में मौजूद जलचरों के संकट को बचाने के लिए कई बार जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को जागरूक करने के साथ इनकी प्रवाह बरकरार रखने की मांग भी शासन और जिला प्रशासन से की। समाजसेवी ब्रजभूषण दूबे की मांग पर तत्कालीन डीएम संजय कुमार खत्री ने गंगा के मध्य धारा से दो किमी के दायरे में पॉलीथिन की बिक्री के साथ कूड़े-कचरों पर रोक लगा दी थी लेकिन इसकी जमीनी हकीकत कुछ अलग ही है। राइजिंग यूथ ट्रस्ट के वर्चस्व पांडेय गंगा सहित सहायक नदियों को प्रदूषण मुक्त और जलचरों के जीवन को बचाने के लिए लोगों को जागरूक करने के साथ शासन और जिला प्रशासन से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगवाने की मांग की। लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया। गंगा सहित सहायक नदियों में मौजूद जलचरों के जीवन को बचाने के लिए जिला प्रशासन की ओर से अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। जानकारों की माने तो सैदपुर तहसील क्षेत्र में गंगा के गहरे पानी में एक दशक पहले तक सैकड़ों की संख्या में डालफिन देखी जाती थी। कई तरह की मछलियां भी गंगा में पाई जाती थी, लेकिन इनकी संख्या में तेजी से कमी आती जा रही है। धीरे-धीरे अन्य जलचर जीवों को भी यही हाल है। इस संबंध में डीएम के बालाजी ने बताया कि गंगा सहित सहायक नदियों के जल प्रदूषित होने से बचाने की दिशा में जिला स्तर पर कार्य चल रहा है।
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गंगा सहित सहायक नदियों का दायरा सिमटने से पानी भी प्रदूषित होने लगा है। इससे जलचरों के जीवन खतरे में पड़ गया है। इन्हें संकट से उबारने की कोई पहल जनपद में नहीं की जा रही है। जल प्रदूषण की वजह से जलचरों की संख्या पर भी फर्क पड़ना शुरू हो गया है। सबसे अहम बात यह है कि इन जलचरों के संरक्षण के लिए जिला प्रशासन की ओर से कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया तो स्थिति और भयावह हो सकती है। साथ ही जिला प्रशासन के लिए इनके संरक्षण के लिए कोई प्रोजेक्ट भी नहीं चलाया जा रहा है।
जिले में गंगा और गोमती दोनों प्रवाहित नदियां है, इसके अलावा गांगी, बेसो, नोन, उदंती, भैंसही, टोंस, कर्मनाशा, गोधनी, दोना और अकौंझी जैसी सहायक नदियां भी जिले में बहती हैं। गंगा में जगह-जगह बांध बनाकर बिजली उत्पादन होने के चलते इसकी प्रवाह पर अंकुश लगने से भीषण गर्मी शुरू होते ही नदी की धारा दो भाग में बंट जाती है। इसके साथ बीच में बालू का टीला दिखाई पड़ने लगता है। गोमती सहित अन्य सहायक नदियों में प्रवाह न होने से पानी प्रदूषित हो चुका है। इसके चलते गंगा सहित सहायक नदियों में रहने वाले जलचरों के जीवन पर संकट गहराता जा रहा है। जबकि इन जलचरों को बचाने के लिए शासन की ओर से तमाम वायदे किए जाते हैं। इसके बावजूद स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। सामाजिक संस्थाओं ने गंगा और सहायक नदियों में मौजूद जलचरों के संकट को बचाने के लिए कई बार जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को जागरूक करने के साथ इनकी प्रवाह बरकरार रखने की मांग भी शासन और जिला प्रशासन से की। समाजसेवी ब्रजभूषण दूबे की मांग पर तत्कालीन डीएम संजय कुमार खत्री ने गंगा के मध्य धारा से दो किमी के दायरे में पॉलीथिन की बिक्री के साथ कूड़े-कचरों पर रोक लगा दी थी लेकिन इसकी जमीनी हकीकत कुछ अलग ही है। राइजिंग यूथ ट्रस्ट के वर्चस्व पांडेय गंगा सहित सहायक नदियों को प्रदूषण मुक्त और जलचरों के जीवन को बचाने के लिए लोगों को जागरूक करने के साथ शासन और जिला प्रशासन से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगवाने की मांग की। लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया। गंगा सहित सहायक नदियों में मौजूद जलचरों के जीवन को बचाने के लिए जिला प्रशासन की ओर से अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। जानकारों की माने तो सैदपुर तहसील क्षेत्र में गंगा के गहरे पानी में एक दशक पहले तक सैकड़ों की संख्या में डालफिन देखी जाती थी। कई तरह की मछलियां भी गंगा में पाई जाती थी, लेकिन इनकी संख्या में तेजी से कमी आती जा रही है। धीरे-धीरे अन्य जलचर जीवों को भी यही हाल है। इस संबंध में डीएम के बालाजी ने बताया कि गंगा सहित सहायक नदियों के जल प्रदूषित होने से बचाने की दिशा में जिला स्तर पर कार्य चल रहा है।
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