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कारागार में चौकसी, स्वास्थ्य सेवाएं जांची
ब्यूरो, अमर उजाला फतेहपुर
Updated Mon, 27 Mar 2017 12:04 AM IST
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जिला कारागार
- फोटो : Amar ujala
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फतेहगढ़ जिला जेल में रविवार को हुई घटना ने जेल प्रशासन की कार्यशैली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। गुस्साए बंदियों ने जेल में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। असली वजह तो जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन कमोबेश एक से हालात सभी जगह हैं। बवाल के बाद यहां भी प्रशासन ने जिला कारागार में चौकसी बढ़ा दी है।
यहां भी कारागार में एक साल पहले कुख्यात फैजान ने खाने की गुणवत्ता को लेकर हंगामा काटा था। बंदियों के परिजनों का आरोप है कि रसूखदार बंदियों तक हर तरह के व्यंजन पहुंचाए जाते हैं। ऐसे में आम बंदी की नाराजगी पनपती है। जेल में होने वाली मौतें अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सवाल खड़े करती हैं। जिला कारागार में दो चिकित्सक हैं। माह भर पूर्व रायबरेली के 26 साल के बंदी की हार्टअटैक से मौत हुई थी। दस दिन पहले मलवां थाने के 70 साल के वृद्ध की बीमारी से मौत हुई।
दोनों मामलों में परिजनों ने जेल में स्वास्थ्य सेवाएं सही न होने का आरोप लगाया था। अधिकांश बंदियों को जिला अस्पताल रेफर कर देते हैं। सवाल उठता है कि जिले की चिकित्सा व्यवस्था क्या सेकेंड्री स्टेज लायक भी नहीं? बंदियों के परिजनों का कहना है कि रसूखदार बंदियों को लजीज व्यंजन मिलते हैं। बाकी पानी वाली दाल और जली हुई रोटियाें से गुजारा करते हैं। कुछ के लिए मेस में ही भोजन पकाया जाता है। कुछ रोज मिलने वाली दाल में व्यक्तिगत इंतजाम से तड़का भी लगाते हैं। सूत्रों की मानें तो बंदियों तक सामान पहुंचाने के लिए उन्हें चेकिंग के हर दरवाजे पर रकम अदा करनी पड़ती है। हर जगह रेट फिक्स है।
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यहां भी कारागार में एक साल पहले कुख्यात फैजान ने खाने की गुणवत्ता को लेकर हंगामा काटा था। बंदियों के परिजनों का आरोप है कि रसूखदार बंदियों तक हर तरह के व्यंजन पहुंचाए जाते हैं। ऐसे में आम बंदी की नाराजगी पनपती है। जेल में होने वाली मौतें अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सवाल खड़े करती हैं। जिला कारागार में दो चिकित्सक हैं। माह भर पूर्व रायबरेली के 26 साल के बंदी की हार्टअटैक से मौत हुई थी। दस दिन पहले मलवां थाने के 70 साल के वृद्ध की बीमारी से मौत हुई।
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दोनों मामलों में परिजनों ने जेल में स्वास्थ्य सेवाएं सही न होने का आरोप लगाया था। अधिकांश बंदियों को जिला अस्पताल रेफर कर देते हैं। सवाल उठता है कि जिले की चिकित्सा व्यवस्था क्या सेकेंड्री स्टेज लायक भी नहीं? बंदियों के परिजनों का कहना है कि रसूखदार बंदियों को लजीज व्यंजन मिलते हैं। बाकी पानी वाली दाल और जली हुई रोटियाें से गुजारा करते हैं। कुछ के लिए मेस में ही भोजन पकाया जाता है। कुछ रोज मिलने वाली दाल में व्यक्तिगत इंतजाम से तड़का भी लगाते हैं। सूत्रों की मानें तो बंदियों तक सामान पहुंचाने के लिए उन्हें चेकिंग के हर दरवाजे पर रकम अदा करनी पड़ती है। हर जगह रेट फिक्स है।
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