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श्रद्धा की बारिश व जयकारों की गूंज से भरी आस्था की नगरी

Thu, 25 Feb 2021 10:59 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 25 Feb 2021 10:59 PM IST
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Worship of Mother India in the city of faith
मेला रामनगरिया के सांस्कृतिक पंडाल में आल्हा गाते कलाकार। संवाद - फोटो : FARRUKHABAD
पांचालघाट पर बसी आस्था की नगरी में भारत माता की भी पूजा की गई। महाराष्ट्र के कलाकारों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के चित्रों के माध्यम से भारत माता नाटक का मंचन किया। मुन्ना लाल ने आल्हा गायन किया।
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सांस्कृतिक पंडाल में महाराष्ट्र से आये सत्यनारायण मौर्या के भारत माता नाटक का मंचन किया गया। इसमें चित्रों के माध्यम से भारत माता का गुणगान किया गया। भारत मां के सपूत स्वामी विवेकानंद, सरदार भगत सिंह के अलावा देश में बहने वाली गंगा मइया आदि के चित्र बनाए। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की वीरगाथा का वर्णन भी किया।
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उधर आदर्श क्षेत्र में चल रही भागवत कथा का समापन के दौरान स्वामी ब्रह्मचारी सत्यस्वरूप महाराज ने कहा कि भागवत कथा का श्रवण करने से पापी के क्षण भर में पाप से मुक्त हो जाते हैं।
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वह भगवान के शरण में चले जाते हैं। जो भागवत कथा को मन से सुनता है तो उसे शीघ्र फल प्राप्त होता है। गंगा तट पर एक माह तक कल्पवास करने वाले भक्तों से कहा कि गंगा स्नान करने के बाद जब गंगा मइया से विदा लें, तो उनसे भूल से हुई गलती ही क्षमा मांगने के बाद घर को राम नाम का जाप करते हुए वापस जाएं। मन, बुद्धि, वचन व कर्म से कभी किसी को दुख न दें। दुख देने से पाप मिलता है। कल्पवास, पूजा, ध्यान, जप व तप से मिले पुण्य कर्म को अच्छे कार्यों में लगाएं।
वैदिक क्षेत्र चरित्र निर्माण शिविर में संत सम्मेलन हुआ। इसमें संतों को सम्मानित किया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता षड्दर्शन अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत सोमवारपुरी ने की। उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम व योगिराज श्रीकृष्ण ने संतों के चरणों में बैठकर धर्मरक्षा का संकल्प लिया था। देश में जब जब संकट आया तो संतों ने ही निवारण किया।
मध्यकाल में संत स्वामी दयानंद ने वैदिक धर्म पर आए संकट व सामाजिक कुरीतियों के अंधकार को दूर किया। वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना के लिए वेद की शिक्षाओं को प्रसारित करने की आवश्यकता है।
संतों की वाणी सुनकर गृहस्थ सुख के साधन पाते हैं। संचालन आचार्य चंद्रदेव शास्त्री ने किया। उन्होंने कहा कि धर्म का मूल वेद है। बिना धर्म के शांति स्थापित नहीं हो सकती। देश में फैले जातिवाद की खाई को यदि पाटना है तो वेद की शरण में जाना होगा। यजुर्वेद परायण महायज्ञ के यजमान हरिओम शास्त्री, आचार्य सूर्यदेव वेदांशु ने यज्ञ सम्पन्न कराया।

यजमान के भंडारे में साधु-संत व कल्पवासियों प्रसाद लिया। दोपहर की सभा में सत्यदेव शर्मा, हरदेव शास्त्री व उदिता आर्या ने भजन सुनाए।महंत लखन पुरीजी, स्वामी महेेद्रानंद, रात्रिपुरी महाराज श्रीपंच आह्वान अखाड़ा, रघुवंश पुरी, मीरा शास्त्री, भाष्कर दत्त द्विवेदी, संदीप आर्य आदि मौजूद रहे।
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