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वेंटीलेटर पर सधवाड़ा का छपाई उद्योग
ब्यूरो/अमर उजाला,फर्रुखाबाद
Updated Thu, 04 Feb 2016 11:41 PM IST
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फर्रुखाबाद। ब्रिटिश काल का छपाई उद्योग विभागीय एवं प्रशासनिक अधिकारियों की अनदेखी से वेंटीलेटर पर पहुंच गया है। इस उद्योग के बंद होने से हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं। कभी फर्रुखाबाद में छापी गई सिल्क की साड़ी दुनिया भर में मशहूर मानी जाती थी। मौजूदा समय में यही उद्योग महानगरों में पहुंच रहा है।
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कपड़ा छपाई का उद्योग वर्ष 1703 से चल रहा है, लेकिन इसका आधुनिकीकरण 1875 में आरंभ हुआ। श्यामलाल और जुगल किशोर साध ने यहां नई शुरुआत की थी। वर्ष 1911 में इलाहाबाद में आयोजित प्रदर्शनी में यहां की छापी गई सिल्क की साड़ियों की सबसे ज्यादा मांग हुई। सिल्क की साड़ी और लिहाफ की छपाई के लिए मशहूर फर्रुखाबाद में इटावा, मैनपुरी, एटा, शाहजहांपुर, हरदोई से लोग आकर नौकरी करते थे। फर्रुखाबाद के गजेटियर में इसका स्पष्ट उल्लेख है कि साध समुदाय द्वारा यह उद्योग चलाया जा रहा था।
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वर्ष 1960 में फर्रुखाबाद में लकड़ी के छापों द्वारा हाथ से ही छपाई का कार्य वस्त्रों पर होता था तथा रंगाई का काम भी किया जाता था। वर्ष 1960 के बाद यह कार्य स्क्रीन पर होने लगा और धीरे-धीरे ब्लाक प्रिंटिंग का काम होता गया। 1980 के बाद निर्यात व्यवसाय का विस्तार हुआ। जैसे-जैसे इस व्यवसाय का विस्तार होता गया कच्चे माल की दिक्कतें बढ़ती गईं। एक ही ट्रेन दिल्ली तक होने के कारण दिल्ली के व्यापारी आने में सकुचाने लगे।
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इस व्यवसाय को सबसे बड़ा झटका उस समय लगा जब सतनामी प्रिंट के प्रमुख श्रवण कुमार साध और उनके पुत्र लोकेश साध की दिल्ली से कच्चा माल लाते समय ट्रेन में हत्या कर दी गई। नतीजतन यह उद्योग धीरे-धीरे दिल्ली, सूरत और मुंबई की ओर पलायन कर गया। इस उद्योग को बचाने का प्रयास न तो जनप्रतिनिधियों ने किया और न ही उद्योग विभाग की ओर से कोई प्रयास किए गए केवल खानापूर्ति ही चलती रही।
एसआर प्रिंट के मालिक विपिन साध, नरेश साध, राकेश मणि, लक्ष्मण बाबू, राधेमोहन, मोती लाल, जवाहर साध सभी लोग दिल्ली के लिए पलायन कर गए। किशोर साध बताते हैं कि समुचित सुविधाएं नहीं मिलीं। कभी गंगा में रंग पहुंचने के नाम पर इस उद्योग के मालिकों को प्रताड़ित किया गया तो कभी उनसे पैसा वसूलने का दबाव डाला गया। मौजूदा समय में एक या दो कारखाने यहां काम कर रहे हैं, जिससे हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं।
वर्जन
टेक्सटाइल पार्क बनाने की स्वीकृति मिल गई है। 15 जनवरी को 120 करोड़ खर्च कर सधवाड़ा उद्योग को पुनर्जन्म देने की स्वीकृति प्रदान की गई है। अब बंद छपाई कारखाने शीघ्र चालू हो जाएंगे। - जय सिंह, महाप्रबंधक जिला उद्योग केंद्र