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Farrukhabad News: कटरी किंग के नाम से जाना जाता था कलुआ, गैंग के आतंक से थर्राती थी कटरी
सार
फर्रुखाबाद और आसपास के क्षेत्रों में कुख्यात डकैत देवेंद्र उर्फ फौजी ने कलुआ गिरोह के साथ दो दशक तक आतंक फैलाया। पुलिसकर्मियों की हत्या सहित कई संगीन अपराधों में उसे उम्रकैद और 12 लाख रुपये अर्थदंड की सजा मिली है।
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विस्तार
फर्रुखाबाद। प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्रों खासकर फर्रुखाबाद, बदायूं, शाहजहांपुर और बरेली की गंगा-रामगंगा कटरी में दो दशक तक राज करने वाला राजाराम यादव उर्फ कलुआ यादव लोगों के बीच कटरी किंग के नाम से कुख्यात था। उसका गैंग लूटपाट, अपहरण और पुलिसकर्मियों की हत्या जैसी वारदातों को अंजाम देकर न केवल ग्रामीणों को बल्कि पुलिस को भी दहशत में डाल देता था। कटरी का इलाका उसका सुरक्षित अड्डा बन चुका था, जहां पुलिस भी कदम रखने से पहले कई बार सोचती थी।
कलुआ की सक्रियता फर्रुखाबाद से सटे शाहजहांपुर, बदायूं और बरेली तक फैली थी। गंगा-रामगंगा की कटरी के दलदली रास्तों और घने जंगलों में वह आसानी से छिप जाता था। उसके गिरोह की ताकत और स्थानीय जानकारियों के कारण पुलिस को हर बार बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता था। करीब 20 वर्षों तक कलुआ ने कानून को खुली चुनौती दी। कई बार पुलिस टीमों को भारी नुकसान पहुंचाया।
कलुआ गिरोह के खिलाफ पुलिस ने कई बार अभियान चलाए, लेकिन हर बार उसे पकड़ने की कीमत जवानों की शहादत के रूप में चुकानी पड़ी। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार चार मार्च 2001 को कायमगंज कोतवाली क्षेत्र के गांव अहमदगंज के निकट कलुआ गिरोह से मुठभेड़ में कांस्टेबल शांतिराम शहीद हुए। डकैत उनकी रायफल लूटकर फरार हो गए। 26 मार्च 2003 को कंपिल क्षेत्र की कारव कटरी में हुई मुठभेड़ में तत्कालीन कंपिल थाना प्रभारी राजेश कुमार सिंह, मेरापुर के दारोगा उदयवीर सिंह, कंपिल थाने के कांस्टेबल उमेश चंद्र और पीएसी कांस्टेबल सेवाराम यादव बलिदान हुए। गिरोह पुलिस की रिवॉल्वर, कारबाइन, पिस्टल, राइफल और वायरलेस सेट लूट ले गया। इसमें दारोगा विवेक श्रीवास्तव, कांस्टेबल मुन्ना सिंह, सूरज सिंह, मोहर सिंह, रक्षपाल सिंह और पीएसी के साधू राम सहित आठ लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। इसी मामले में कोर्ट ने देवेंद्र कुमार उर्फ फौजी का आजीवन कारावास की सजा सुनाई। 17 सितंबर 2005 को कंपिल क्षेत्र में कारव की कटरी में नाव से जा रही पुलिस टीम पर कलुआ गैंग ने फायरिंग कर दी। इस हमले में पीएसी दारोगा चंद्रपाल सिंह, कांस्टेबल इशरत अली और दिलीप तिवारी शहीद हो गए, जबकि रमेश यादव, कमलेश दीक्षित, ओमप्रकाश और राजेश राठौर घायल हुए।
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लगातार बढ़ते पुलिस दबाव और घेराबंदी के बीच आखिरकार कलुआ का आतंक 16 जनवरी 2006 को समाप्त हुआ। बरेली पुलिस के साथ हुई भीषण मुठभेड़ में कलुआ मारा गया। उसकी मौत के साथ गंगा-रामगंगा कटरी का खौफनाक अध्याय भले ही खत्म हो गया, लेकिन उसकी दहशत की कहानियां आज भी ग्रामीणों की यादों में जिंदा हैं। कटरी के लोग आज भी उस दौर को याद कर सिहर उठते हैं, जब कटरी किंग के नाम से मशहूर कलुआ का खौफ चारों ओर पसरा रहता था।
कल्लू, नज्जू और गिरोह के अन्य बदमाशों की तुलना में देवेंद्र उम्र में सबसे छोटा था, लेकिन उसकी दहशत किसी से कम नहीं थी। कम उम्र के बावजूद उसने जल्द ही गैंग में नंबर दो की हैसियत हासिल कर ली थी। तेज निशानेबाजी के कारण वह गिरोह का शॉर्प शूटर माना जाता था। पुलिस से मोर्चे के दौरान सबसे ज्यादा आक्रामक रुख उसी का होता था। पुलिस अधिकारियों के लिए यह बात हमेशा हैरत का विषय रही कि देवेंद्र कभी सीधे सामने नहीं आता था। जब भी गिरोह पुलिस के घेरे में फंसता, वह चालाकी से दूसरे साथियों को साथ लेकर निकल भागता था। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी। सूत्रों के अनुसार, 15 जनवरी 2006 को फतेहगंज पूर्वी की कटरी में कल्लू को जिस मुठभेड़ में ढेर किया गया, उस दौरान देवेंद्र नदी के उस पार से पुलिस पर गोलियां बरसा रहा था। कल्लू की बंदूक के शांत होते ही वह भी वहां से भाग या था। कल्लू की मौत के बाद देवेंद्र ही गिरोह की नई कड़ी बन गया, जिसकी तलाश में पुलिस लंबे समय तक सर्च ऑपरेशन चलाती रही।
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देवेंद्र के सीने में कई राज, न हथियार मिले न किसान
- कलुआ के एनकाउंटर के बाद भी हथियारों का जखीरा बना रहस्य
- देवेंद्र ने किया समर्पण लेकिन सच कभी उजागर न हुआ
संवाद न्यूज एजेंसी
फर्रुखाबाद। डकैत कलुआ के मारे जाने के बाद तीन जिलों की पुलिस ने गंगा-रामगंगा की कटरी का चप्पा-चप्पा छान मारा, लेकिन गिरोह के पास मौजूद हथियारों का जखीरा आख़िर तक हाथ नहीं लग सका। गिरोह के पास जो असलहे थे, उनमें कई ऐसे थे, जिन्हें पुलिस से ही मुठभेड़ों के दौरान छीना गया था।
कलुआ डकैत के मारे जाने के बाद गैंग की कमान उसके सबसे युवा और शॉर्प शूटर साथी देवेंद्र फौजी ने संभाली। करीब एक साल तक उसने बचे-खुचे गिरोह का नेतृत्व किया और पुलिस को चकमा देता रहा। बढ़ते दबाव के बीच उसने आखिरकार आत्मसमर्पण कर दिया।
देवेंद्र को रिमांड पर लेकर पुलिस ने घंटों पूछताछ की, मगर उसके सीने में दबे कई बड़े राज कभी बाहर नहीं आ सके। न तो हथियारों के ठिकाने का सुराग मिला, न ही अगवा किसानों की असल कहानी। कलुआ गैंग के इस रहस्यमय अध्याय ने पुलिस और स्थानीय लोगों के मन में आज तक अनगिनत सवाल छोड़ दिए हैं।
गंगा-रामगंगा की कटरी में दो दशक तक आतंक मचाने वाले कल्लू गिरोह का देवेंद्र सबसे भरोसेमंद साथी था। जिसे पूरा इलाका देवेंद्र फौजी के नाम से जानने लगा था। उसके छोटे बाल, मजबूत कद-काठी और दमदार स्टाइल को देखकर कलुआ डकैत ने ही उसे ‘फौजी’ कहना शुरू किया, बाद में यह नाम पूरे गिरोह और इलाके में मशहूर हो गया।
देवेंद्र के आपराधिक सफर की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है। उसका चाचा उस वक्त पटनिया गांव का प्रधान था। बचपन से ही देवेंद्र अपने मामा नज्जू के घर पला-बढ़ा। नज्जू खुद कल्लू गिरोह का अहम सदस्य था। इसी रिश्ते के चलते नज्जू ने युवा भांजे को कल्लू से मिलवाया और अपराध की दुनिया में उतार दिया। तेज निशानेबाजी और दबंग अंदाज के कारण देवेंद्र जल्द ही कल्लू का दायां हाथ बन गया। गिरोह की हर बड़ी वारदात में उसकी भूमिका अहम होती थी। उसकी कम उम्र और आक्रामक रवैये ने पुलिस के लिए उसे और भी खतरनाक बना दिया।
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डकैत देवेंद्र उर्फ फौजी पर ृ8 मुकदमे, एक में फांसी, छह बार उम्रकैद
- चार पुलिसकर्मियों की हत्या में फिर सुनाई उम्रकैद, 12 लाख का अर्थदंड
संवाद न्यूज एजेंसी
फर्रुखाबाद। गंगा-रामगंगा कटरी में आतंक मचाने वाले कुख्यात डकैत देवेंद्र उर्फ फौजी को बृहस्पतिवार को विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावित क्षेत्र) शैलेन्द्र सचान की अदालत ने चार पुलिसकर्मियों की दिनदहाड़े हत्या करने के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने उस पर 12 लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया।
कटरी का यह खूंखार अपराधी भले ही अब सलाखों के पीछे है, लेकिन उसकी आपराधिक कहानियां आज भी इलाके में खौफ का पर्याय बनी हुई हैं। देवेंद्र उर्फ फौजी के खिलाफ फर्रुखाबाद सहित कई जिलों में हत्या, लूट, डकैती और पुलिस मुठभेड़ जैसी संगीन वारदातों के करीब 30 से अधिक मुकदमे दर्ज हैं। अब तक अदालतें उसे छह मामलों में उम्रकैद की सजा सुना चुकी हैं, जबकि एक मामले में फांसी की सजा भी दी जा चुकी है। इसके अलावा एक अन्य मामले में उसे 10 वर्ष की कैद की सजा हो चुकी है।
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फांसी ही है असली सजा करेंगे अपील- एडीजीसी
फोटो- 37, एडीजीसी तेज सिंह राजपूत
फर्रुखाबाद। अभियोजन पक्ष की ओर से बहस करते हुए एडीजीसी तेज सिंह राजपूत ने अदालत से सख्त सजा की मांग की। उन्होंने कहा कि फौजी जैसे खूंखार अपराधियों के लिए उम्रकैद काफी नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि पहले भी फौजी को फांसी की सजा सुनाई गई थी, मगर उसने उच्च न्यायालय में अपील कर राहत हासिल कर ली। तेज सिंह ने साफ कहा कि इस मामले में वे उच्च न्यायालय में अपील दायर कर फौजी को फांसी की सजा दिलाने का प्रयास करेंगे।
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कलुआ की सक्रियता फर्रुखाबाद से सटे शाहजहांपुर, बदायूं और बरेली तक फैली थी। गंगा-रामगंगा की कटरी के दलदली रास्तों और घने जंगलों में वह आसानी से छिप जाता था। उसके गिरोह की ताकत और स्थानीय जानकारियों के कारण पुलिस को हर बार बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता था। करीब 20 वर्षों तक कलुआ ने कानून को खुली चुनौती दी। कई बार पुलिस टीमों को भारी नुकसान पहुंचाया।
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कलुआ गिरोह के खिलाफ पुलिस ने कई बार अभियान चलाए, लेकिन हर बार उसे पकड़ने की कीमत जवानों की शहादत के रूप में चुकानी पड़ी। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार चार मार्च 2001 को कायमगंज कोतवाली क्षेत्र के गांव अहमदगंज के निकट कलुआ गिरोह से मुठभेड़ में कांस्टेबल शांतिराम शहीद हुए। डकैत उनकी रायफल लूटकर फरार हो गए। 26 मार्च 2003 को कंपिल क्षेत्र की कारव कटरी में हुई मुठभेड़ में तत्कालीन कंपिल थाना प्रभारी राजेश कुमार सिंह, मेरापुर के दारोगा उदयवीर सिंह, कंपिल थाने के कांस्टेबल उमेश चंद्र और पीएसी कांस्टेबल सेवाराम यादव बलिदान हुए। गिरोह पुलिस की रिवॉल्वर, कारबाइन, पिस्टल, राइफल और वायरलेस सेट लूट ले गया। इसमें दारोगा विवेक श्रीवास्तव, कांस्टेबल मुन्ना सिंह, सूरज सिंह, मोहर सिंह, रक्षपाल सिंह और पीएसी के साधू राम सहित आठ लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। इसी मामले में कोर्ट ने देवेंद्र कुमार उर्फ फौजी का आजीवन कारावास की सजा सुनाई। 17 सितंबर 2005 को कंपिल क्षेत्र में कारव की कटरी में नाव से जा रही पुलिस टीम पर कलुआ गैंग ने फायरिंग कर दी। इस हमले में पीएसी दारोगा चंद्रपाल सिंह, कांस्टेबल इशरत अली और दिलीप तिवारी शहीद हो गए, जबकि रमेश यादव, कमलेश दीक्षित, ओमप्रकाश और राजेश राठौर घायल हुए।
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लगातार बढ़ते पुलिस दबाव और घेराबंदी के बीच आखिरकार कलुआ का आतंक 16 जनवरी 2006 को समाप्त हुआ। बरेली पुलिस के साथ हुई भीषण मुठभेड़ में कलुआ मारा गया। उसकी मौत के साथ गंगा-रामगंगा कटरी का खौफनाक अध्याय भले ही खत्म हो गया, लेकिन उसकी दहशत की कहानियां आज भी ग्रामीणों की यादों में जिंदा हैं। कटरी के लोग आज भी उस दौर को याद कर सिहर उठते हैं, जब कटरी किंग के नाम से मशहूर कलुआ का खौफ चारों ओर पसरा रहता था।
कल्लू, नज्जू और गिरोह के अन्य बदमाशों की तुलना में देवेंद्र उम्र में सबसे छोटा था, लेकिन उसकी दहशत किसी से कम नहीं थी। कम उम्र के बावजूद उसने जल्द ही गैंग में नंबर दो की हैसियत हासिल कर ली थी। तेज निशानेबाजी के कारण वह गिरोह का शॉर्प शूटर माना जाता था। पुलिस से मोर्चे के दौरान सबसे ज्यादा आक्रामक रुख उसी का होता था। पुलिस अधिकारियों के लिए यह बात हमेशा हैरत का विषय रही कि देवेंद्र कभी सीधे सामने नहीं आता था। जब भी गिरोह पुलिस के घेरे में फंसता, वह चालाकी से दूसरे साथियों को साथ लेकर निकल भागता था। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती थी। सूत्रों के अनुसार, 15 जनवरी 2006 को फतेहगंज पूर्वी की कटरी में कल्लू को जिस मुठभेड़ में ढेर किया गया, उस दौरान देवेंद्र नदी के उस पार से पुलिस पर गोलियां बरसा रहा था। कल्लू की बंदूक के शांत होते ही वह भी वहां से भाग या था। कल्लू की मौत के बाद देवेंद्र ही गिरोह की नई कड़ी बन गया, जिसकी तलाश में पुलिस लंबे समय तक सर्च ऑपरेशन चलाती रही।
देवेंद्र के सीने में कई राज, न हथियार मिले न किसान
- कलुआ के एनकाउंटर के बाद भी हथियारों का जखीरा बना रहस्य
- देवेंद्र ने किया समर्पण लेकिन सच कभी उजागर न हुआ
संवाद न्यूज एजेंसी
फर्रुखाबाद। डकैत कलुआ के मारे जाने के बाद तीन जिलों की पुलिस ने गंगा-रामगंगा की कटरी का चप्पा-चप्पा छान मारा, लेकिन गिरोह के पास मौजूद हथियारों का जखीरा आख़िर तक हाथ नहीं लग सका। गिरोह के पास जो असलहे थे, उनमें कई ऐसे थे, जिन्हें पुलिस से ही मुठभेड़ों के दौरान छीना गया था।
कलुआ डकैत के मारे जाने के बाद गैंग की कमान उसके सबसे युवा और शॉर्प शूटर साथी देवेंद्र फौजी ने संभाली। करीब एक साल तक उसने बचे-खुचे गिरोह का नेतृत्व किया और पुलिस को चकमा देता रहा। बढ़ते दबाव के बीच उसने आखिरकार आत्मसमर्पण कर दिया।
देवेंद्र को रिमांड पर लेकर पुलिस ने घंटों पूछताछ की, मगर उसके सीने में दबे कई बड़े राज कभी बाहर नहीं आ सके। न तो हथियारों के ठिकाने का सुराग मिला, न ही अगवा किसानों की असल कहानी। कलुआ गैंग के इस रहस्यमय अध्याय ने पुलिस और स्थानीय लोगों के मन में आज तक अनगिनत सवाल छोड़ दिए हैं।
गंगा-रामगंगा की कटरी में दो दशक तक आतंक मचाने वाले कल्लू गिरोह का देवेंद्र सबसे भरोसेमंद साथी था। जिसे पूरा इलाका देवेंद्र फौजी के नाम से जानने लगा था। उसके छोटे बाल, मजबूत कद-काठी और दमदार स्टाइल को देखकर कलुआ डकैत ने ही उसे ‘फौजी’ कहना शुरू किया, बाद में यह नाम पूरे गिरोह और इलाके में मशहूर हो गया।
देवेंद्र के आपराधिक सफर की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है। उसका चाचा उस वक्त पटनिया गांव का प्रधान था। बचपन से ही देवेंद्र अपने मामा नज्जू के घर पला-बढ़ा। नज्जू खुद कल्लू गिरोह का अहम सदस्य था। इसी रिश्ते के चलते नज्जू ने युवा भांजे को कल्लू से मिलवाया और अपराध की दुनिया में उतार दिया। तेज निशानेबाजी और दबंग अंदाज के कारण देवेंद्र जल्द ही कल्लू का दायां हाथ बन गया। गिरोह की हर बड़ी वारदात में उसकी भूमिका अहम होती थी। उसकी कम उम्र और आक्रामक रवैये ने पुलिस के लिए उसे और भी खतरनाक बना दिया।
डकैत देवेंद्र उर्फ फौजी पर ृ8 मुकदमे, एक में फांसी, छह बार उम्रकैद
- चार पुलिसकर्मियों की हत्या में फिर सुनाई उम्रकैद, 12 लाख का अर्थदंड
संवाद न्यूज एजेंसी
फर्रुखाबाद। गंगा-रामगंगा कटरी में आतंक मचाने वाले कुख्यात डकैत देवेंद्र उर्फ फौजी को बृहस्पतिवार को विशेष न्यायाधीश (दस्यु प्रभावित क्षेत्र) शैलेन्द्र सचान की अदालत ने चार पुलिसकर्मियों की दिनदहाड़े हत्या करने के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने उस पर 12 लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया।
कटरी का यह खूंखार अपराधी भले ही अब सलाखों के पीछे है, लेकिन उसकी आपराधिक कहानियां आज भी इलाके में खौफ का पर्याय बनी हुई हैं। देवेंद्र उर्फ फौजी के खिलाफ फर्रुखाबाद सहित कई जिलों में हत्या, लूट, डकैती और पुलिस मुठभेड़ जैसी संगीन वारदातों के करीब 30 से अधिक मुकदमे दर्ज हैं। अब तक अदालतें उसे छह मामलों में उम्रकैद की सजा सुना चुकी हैं, जबकि एक मामले में फांसी की सजा भी दी जा चुकी है। इसके अलावा एक अन्य मामले में उसे 10 वर्ष की कैद की सजा हो चुकी है।
फांसी ही है असली सजा करेंगे अपील- एडीजीसी
फोटो- 37, एडीजीसी तेज सिंह राजपूत
फर्रुखाबाद। अभियोजन पक्ष की ओर से बहस करते हुए एडीजीसी तेज सिंह राजपूत ने अदालत से सख्त सजा की मांग की। उन्होंने कहा कि फौजी जैसे खूंखार अपराधियों के लिए उम्रकैद काफी नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि पहले भी फौजी को फांसी की सजा सुनाई गई थी, मगर उसने उच्च न्यायालय में अपील कर राहत हासिल कर ली। तेज सिंह ने साफ कहा कि इस मामले में वे उच्च न्यायालय में अपील दायर कर फौजी को फांसी की सजा दिलाने का प्रयास करेंगे।