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गरीबी से तंग दिव्यांग महिला ने जहर खाकर जान दी
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मीना की फाइल फोटो। संवाद
- फोटो : FARRUKHABAD
कायमगंज। आर्थिक तंगी से परेशान दोनों पैरों से दिव्यांग महिला ने जहरीला पदार्थ खाकर जान दे दी। महिला के दिव्यांग पति की कोरोना की दूसरी लहर में मौत हो चुकी है। महिला के एक बेटा व दो बेटी हैं। परिजनों ने मामले की सूचना पुलिस को नहीं दी।
क्षेत्र के गांव तुर्क ललैया निवासी दिव्यांग मीना जाटव (40) ने शुक्रवार शाम जहरीला पदार्थ का लिया। परिजन अस्पताल लेकर गए, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। परिजन बिना पोस्टमार्टम कराए ही शव घर लेकर चले गए।
परिजनों के मुताबिक बड़ी बेटी बबली की जिरखापुर गांव में शादी हो चुकी है। उसके 12 साल का एक मंदबुद्धि बेटा अंशुल और दो साल की मासूम बेटी गुड़िया है। मीना दिव्यांग होने के कारण कमाने में भी असमर्थ थी। जिससे परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। दामाद ने ही अंतिम संस्कार कराया।
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जिंदा रहते न पहुंचा कोई नेता
चुनावी सीजन में जिस नेता को भी महिला की मौत की जानकारी हुई, वह अपने समर्थकों के साथ उसके घर सांत्वना देने पहुंचा। इसको लेकर ग्रामीणों में रोष रहा। उनका कहना है कि जब तक मीना जिंदा रही, तब तक किसी भी नेता ने उसकी व उसके परिवार की कोई सुध नहीं ली। यदि सुध लेते तो उसे किसी न किसी योजना का लाभ मिल सकता था और उसकी जान भी न जाती।
बेटे का इलाज भी नहीं करा पा रही थी
ग्रामीणों ने बताया कि पास पड़ोस के लोग यदाकदा मीना के घर थोड़ा बहुत राशन देकर मदद पहुंचा दिया करते थे। उसकी सबसे बड़ी चिंता उसका मंदबुद्धि बेटा था, लेकिन वह मजबूर थी, परिवार का पेट तक पालना मुश्किल हो रहा था, ऐसे में वह बेटे का इलाज कैसे कराती। बेटे का क्या होगा, इस चिंता से भी वह परेशान रहा करती थी।
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क्षेत्र के गांव तुर्क ललैया निवासी दिव्यांग मीना जाटव (40) ने शुक्रवार शाम जहरीला पदार्थ का लिया। परिजन अस्पताल लेकर गए, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। परिजन बिना पोस्टमार्टम कराए ही शव घर लेकर चले गए।
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परिजनों के मुताबिक बड़ी बेटी बबली की जिरखापुर गांव में शादी हो चुकी है। उसके 12 साल का एक मंदबुद्धि बेटा अंशुल और दो साल की मासूम बेटी गुड़िया है। मीना दिव्यांग होने के कारण कमाने में भी असमर्थ थी। जिससे परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। दामाद ने ही अंतिम संस्कार कराया।
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जिंदा रहते न पहुंचा कोई नेता
चुनावी सीजन में जिस नेता को भी महिला की मौत की जानकारी हुई, वह अपने समर्थकों के साथ उसके घर सांत्वना देने पहुंचा। इसको लेकर ग्रामीणों में रोष रहा। उनका कहना है कि जब तक मीना जिंदा रही, तब तक किसी भी नेता ने उसकी व उसके परिवार की कोई सुध नहीं ली। यदि सुध लेते तो उसे किसी न किसी योजना का लाभ मिल सकता था और उसकी जान भी न जाती।
बेटे का इलाज भी नहीं करा पा रही थी
ग्रामीणों ने बताया कि पास पड़ोस के लोग यदाकदा मीना के घर थोड़ा बहुत राशन देकर मदद पहुंचा दिया करते थे। उसकी सबसे बड़ी चिंता उसका मंदबुद्धि बेटा था, लेकिन वह मजबूर थी, परिवार का पेट तक पालना मुश्किल हो रहा था, ऐसे में वह बेटे का इलाज कैसे कराती। बेटे का क्या होगा, इस चिंता से भी वह परेशान रहा करती थी।

मगीन बैठे मीना के परिजन। संवाद- फोटो : FARRUKHABAD