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6 वीं शताब्दी से कायम है मंदिरों को हजारों वर्षोँ तक सुरक्षित रखने वाली तकनीकि

Sat, 27 Feb 2021 12:22 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 27 Feb 2021 12:22 AM IST
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The technology that has kept temples safe for thousands of years since the 6th century
अयोध्या। श्रीरामजन्म भूमि पर बनने वाला राममंदिर सदियों तक अक्षुण्ण रहे इसके लिए देशभर के वास्तुविदों व इतिहासकारों की राय ली जा रही है। श्रीरामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का प्राचीन पद्घति से ही राममंदिर निर्माण करने पर जोर है।
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संघ के इतिहास संकलन समिति अवध प्रांत की उपाध्यक्ष व राजा मोहन गर्ल्स पीजी कॉलेज की प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व विभागाध्यक्ष डॉ. प्रज्ञा मिश्रा का दावा है कि मंदिरों को हजारों वर्षों तक सुरक्षित रखने की तकनीक छठवीं शताब्दी से आज भी कायम है।
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कहा कि, प्रो.जेएन बनर्जी ने अपनी किताब उत्तर भारत में कैसे शिल्पशास्त्र का निर्माण होगा इसका जिक्र किया है। शिल्प संहिता में भी मूर्तियों का स्ट्रक्चर कैसे बनेगा, इसका विस्तृत वर्णन है।
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बताया कि छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में जो मंदिर बनाए जाते थे। उनमें पत्थरों को सीमेंट से नहीं चिपकाया जाता था। बल्कि पत्थरों में चूले काटकर एक-दूसरे को फिक्स करके जोड़ते चले जाते थे। चूल काटकर एक फुट का गोल बनाया जाता था। उसी में पत्थरों को जोड़ा जाता था।
किसी भी मंदिर की लंबी आयु में उसकी तकनीक ही रोल अदा करती है। प्राचीन मंदिरों के पत्थरों की अच्छी तराशी, नक्काशी उनके बिल्डिंग स्ट्रक्चर मंदिरों को लंबी आयु प्रदान करते रहे हैं।
शाहजहां व अकबर जैसे शासकों ने भी इसी पद्घति को अपनाया था। प्राचीन पद्घति से बने मंदिरों में सोमनाथ मंदिर, लाल किला, माउंट आबू का विमल वसही, भिलवाड़ा जैन मंदिर वास्तुकला के अनुपम उदाहरण हैं।
डॉ. प्रज्ञा मिश्रा का का दावा है कि जिस पद्घति से राममंदिर बनने जा रहा है उससे भूकंप, तूफान, आंधी, चक्रवात यहां तक कि 120 किलोमीटर की रफ्तार से चलने वाली हवा भी नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगी।
बताया कि राममंदिर निर्माण के लिए जो पत्थर तराशे गए हैं उनमें प्राचीन पद्घति का ही इस्तेमाल किया गया है। राममंदिर पिरामिड नुमा होगा व नागर व द्रविड़ शैली का संयोजन होगा।
पत्थरों में कोडिंग की गई हैं, उसी कोडिंग से पत्थरों को जोड़ा जाता है। पत्थरों को जोड़ने के लिए जिपसम व चूना का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो पुरातन शैली में आता है।
बताया कि राजस्थान के जिस गुलाबी पत्थरों से राममंदिर बनने जा रहा है उनकी आयु भी हजार वर्ष से अधिक होती है। इन पर मौसम की मार का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है।
राममंदिर की भव्यता व उसकी अक्षुण्णता के लिए श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने देश के दो बड़े विशेषज्ञों को अपने साथ जोड़ा है। इसमें तमिलनाडु के डॉ.रामचंद्रन नागास्वामी व चेन्नई के केएन सुब्रमण्यम शामिल हैं।
दोनों की गणना देश के श्रेष्ठ वास्तुविदों में होती है। डॉ.रामचंद्रन नागास्वामी को मंदिरों में चोलकालीन शिबलालेखों के क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता के लिए जाना जाता है। वह तमिलनाडु पुरातत्व विभाग के संस्थापक, निदेशक रहे हैँ।

उन्हें पुरातत्व के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए पद्मभूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है। इसी तरह केएन सुब्रमण्यम की भी वास्तुविद् के रूप में बड़ी ख्याति है। ट्रस्ट इन दोनों विशेषज्ञों की राय राममंदिर निर्माण के लिए लेगी।
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