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राममंदिर की नई चुनौती बंशीपहाड़पुर का पत्थर

Mon, 07 Sep 2020 10:42 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 07 Sep 2020 10:42 PM IST
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Ram mandir's new challenge Bansipaharpur stone
अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि पर राममंदिर बनाने में अब एक नई चुनौती सामने आ रही है। पांच हजार साल तक अक्षुण्ण रहने वाले एकमात्र राजस्थान के बंशीपहाड़पुर के गुलाबी पत्थरों की खदानों से पत्थर निकासी पर राजस्थान के भरतपुर जिला प्रशासन ने रोक लगा दी है। जबकि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट करीब 36 करोड़ रुपये मूल्य के बेहतरीन क्षमता वाले 4.5 लाख घनफीट गुलाबी पत्थरों का ऑर्डर देने की तैयारी में है।
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राजस्थान के भरतपुर जिले में बयाना उपखंड अंतर्गत रूपवास तहसील के बंध बारैठा अभ्यारण्य स्थित बंशीपहाड़पुर की खदानों के गुलाबी पत्थर से हजारों साल तक अक्षुण्ण रहने वाले राममंदिर के निर्माण की तैयारी यहां पूरी हो गई है। एलएंडटी भारी मशीनें मंगाकर 60 मीटर गहरी नींव में सीमेंट-मोरंग व गिट्टी से 1200 पायलिंग तैयार करके इसमें राजस्थान के पत्थरों की बीम से मजबूती देगी।
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इसी नींव में सिर्फ बंशीपहाड़पुर के गुलाबी पत्थरों से 49.24 मीटर ऊंचा करीब ढाई एकड़ में एक लाख पांच हजार 147 वर्गफीट आकार के भूतल पर तीन मंजिला राममंदिर बनना है। देश में सदियों से जस की तस खड़ी तमाम इमारतें व किले इसी पत्थर से बने हैं। संसद भवन, लालकिला, बुलंद दरवाजा सहित अक्षरधाम और इस्कान के अधिकांश मंदिरों में बंशीपहाड़पुर का ही पत्थर लगा है।
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बयाना की पटेल स्टोन इंडस्ट्री के मालिक देवेंद्र पटेल ने दूरभाष पर बताया कि सबसे अच्छी क्वालिटी के पिंक सैंड स्टोन की कीमत इस समय 800 रुपये घनफीट है। इसकी उम्र कम से कम पांच हजार साल होती है। बारिश से ये पत्थर ज्यादा मजबूत, टिकाऊ और सुंदर होता जाता है। इसमें अन्य पत्थरों के मुकाबले अधिक भार सहने की क्षमता व आसानी से पच्चीकारी होती है।
देवेंद्र ने कहा कि राममंदिर निर्माण से यहां के कारोबारी व मजदूर बेहद खुश हैं, मगर दर्द इस बात का है कि सरकार ने यहां की खदानों पर रोक लगा दी है, जबकि पूरे राजस्थान की अन्य सभी खदानें चालू हैं। ऐसे में राममंदिर के लिए अच्छी क्वालिटी में तय आकार के पत्थर कैसे निकल पाएंगे।
बयाना के एसडीएम संतोष कुमार मीणा कहते हैं कि राममंदिर तो बनेगा ही, लेकिन इसके लिए अभी कोई खदान शुरू नहीं हो सकती। चौबीस घंटे में अवैध खनन में 50 गाड़ियां पकड़ी गई हैं। पिछले साल 28 करोड़ रुपये में रायल्टी का टेंडर हुआ था, सरकार का नियम है कि इससे अधिक धनराशि मिलेगी, तभी टेंडर होगा। अब बचे माह के औसत से कोई ठेकेदार आगे आए तो खदान शुरू हो सकती है।
राममंदिर के लिए रुड़की और चेन्नई के इंजीनियरिंग व शोध संस्थान से नींव की गहराई, मिट्टी की क्षमता, भूकंपरोधी रिपोर्ट, सीमेंट, मोरंग-गिट्टी समेत अन्य सामग्री के प्रयोग की जांच के साथ ही अब बंशीपहाड़पुर के पत्थर लेने से पहले उसकी धारण क्षमता की वैज्ञानिक टेस्टिंग होगी। सूत्र बताते हैं कि ट्रस्ट ने प्रसिद्ध स्टोन विशेषज्ञता वाले प्रबंध व तकनीकी संस्थानों से खदानों के ब्लाक मंगाकर जांच के बाद खरीद सुनिश्चित करने का निर्णय लिया है।
हालांकि पहले भी विहिप ने बंशीपहाड़पुर इलाके के महलपुर चूरा, तिछरा, छऊआमोड़ और सिरोंधा की खानों के पत्थर को टेस्टिंग के बाद चयनित किया था। ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र कहते हैं कि अब मंदिर के लिए पत्थरों की जरूरत पर फोकस होगा। इसे प्रयोग लायक तैयार करने में काफी वक्त लगता है। डीएम अनुज कुमार झा कहते हैं कि मंदिर निर्माण तय समय में पूरा हो, इसके लिए सभी तैयारियां मुकम्मल की जा रही हैं।
अयोध्या आए राममंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष रिटायर्ड आईएएस नृपेंद्र मिश्र ने ट्रस्ट महासचिव चंपत राय समेत वास्तुकार व इंजीनियरिंग टीम के साथ अब राममंदिर के पत्थर का ऑर्डर देने की योजना पर काम तेज किया है। श्री मिश्र पहले दौरे में ही कह चुके हैं कि पत्थर की क्वालिटी से कोई समझौता नहीं होगा। जबकि चंपत राय राममंदिर के हजारों साल तक अक्षुण्य रहने के लिए तकनीकी जांच को प्राथमिकता देते आ रहे हैं।
ट्रस्ट सूत्रों का कहना है कि अभी यहां राजस्थान से करीब डेढ़ लाख घनफीट पत्थर आ चुका है, जिसमें सवा लाख घनफीट तराशा जा चुका है। एलएंडटी नींव निर्माण में जुट गई है, ऐसे में अब अगले चरण में सदियों तक अक्षुण्ण रहने वाले बंशीपहाड़पुर के उम्दा गुलाबी पत्थर को अयोध्या लाने की प्रक्रिया शून्य से शुरू करनी है। एक ट्रक पर 25 घनफीट पत्थर का मानक है, अधिकतम 40 घनफुट पत्थर आते रहे हैं। ऐसे करीब साढ़े चार लाख घनफुट पत्थरों को श्रीराम जन्मभूमि तक पहुंचाने से लेकर उसकी तराशी व नक्काशी में मंदिर निर्माण के तय समय का ध्यान रखना बड़ी चुनौती है।
विहिप संरक्षक दिनेश चंद स्वीकारते हैं कि अब तक बंशीपहाड़पुर के पत्थरों की तराशी में करीब 20 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। राममंदिर निर्माण में इस पत्थर का प्रयोग 1990 में ही मुख्य वास्तुकार चंद्रकांत सोमपुरा ने विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे स्व. अशोक सिंघल, चंपत राय और रामबाबू के साथ मिलकर तय किया था।

सोमपुरा की टीम ने अब राममंदिर के 36 हजार 450 वर्गफीट के पुराने आकार को 84 हजार 600 वर्गफीट बढ़ाया है, साथ ही चारों तरफ 14 मीटर चौड़े कॉरिडोर से यह एक लाख पांच हजार 147 वर्गफीट हो गया है। पहले का दोमंजिला मंदिर मॉडल अब 161 फीट ऊंचे शिखर व दो गुंबदों के विस्तार के साथ तीन मंजिला किया गया है। इससे चार लाख घनफीट पत्थर का पहले का अनुमान दोगुना से अधिक होगा।
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