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भूमिपूजन के साथ नए युग का आगाज, अब भव्य गर्भगृह में विराजेंगे रामलला

Thu, 06 Aug 2020 04:56 AM IST
दुष्यंत शर्मा नितिन मिश्र, अयोध्या
नितिन मिश्र, अयोध्या Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 06 Aug 2020 04:56 AM IST
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New era begins with Bhoomipujan in ayodhya
रामलला... - फोटो : अमर उजाला

अवध पुरी अति रूचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।। अवधपुरी सोहइ एहि भांती, प्रभुहि मिलन आई जनु राती।। रामचरितमानस की ये पंक्तियां श्रीरामजन्मभूमि मंदिर के भूमिपूजन के अवसर पर साकार होती दिखीं। राम के जीवन प्रसंगों से सजा रामजन्मभूमि परिसर राममय नजर आ रहा था, रामधुन के साथ मंगलगान, मानो देवता भी पुष्प वर्षा कर रहे हों। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे त्रेतायुग जीवंत हो उठा है। रामलला के दरबार में पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे पर संकल्प की सिद्धि का संतोष प्रत्यक्ष नजर आ रहा था।  

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प्रधानमंत्री के हाथों राममंदिर के भूमिपूजन के साथ ही रामलला के नए युग का भी आगाज हुआ। उन्होंने राममंदिर के भूमि पूजन के साथ ही असंख्य बलिदानियों के स्वप्नों को भी मूर्त रूप देने की नींव रखी है। राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए 77 युद्धों का दावा किया जाता है। भगवान की जन्मभूमि पर फिर से राममंदिर की कल्पना पूर्व में अकल्पनीय हो गई थी, लेकिन समय ने करवट ली और वह कल्पना अब साकार हो रही है।
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राम जन्मभूमि की मुक्ति का संघर्ष तो करीब पांच सौ वर्ष पहले ही शुरू हो गया था, लेकिन कोर्ट की चौखट पर यह मामला 1885 में पहुंचा। निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुवर दास ने स्थानीय सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपील दायर की कि विवादित परिसर से लगे रामचबूतरा पर उन्हें मंदिर निर्माण की इजाजत दी जाए। यहीं से इस मामले का अदालती सफर शुरू हुआ। हालांकि मंदिर-मस्जिद विवाद 1528 में ही सामने आया। 
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मान्यता के अनुसार मुगल शासक बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीर बाकी ने राम जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया। इसके बाद से ही राम जन्मभूमि की मुक्ति का संघर्ष शुरू हो गया। माना जाता है कि देश की आजादी के बाद यह संघर्ष और तीव्र हो गया।
1984 में विहिप के संयोजन में इस संघर्ष ने जन आंदोलन का भी रूप ले लिया। छह दिसंबर 1992 को ढांचा विध्वंस के बाद भी रामलला की रिहाई नहीं हो सकी। 

रामलला एक छत तक को तरस गए। 27 वर्षों तक रामलला टेंट में धूप, सर्दी, गर्मी, बरसात सहते हुए विराजमान रहे। प्रभु की यह दशा हमेशा भक्तों को अखरती रही, मगर कानूनी बंदिशों के चलते वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते थे। उनके मन में बस रामलला की रिहाई का ही स्वप्न तैरता था। नौ नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट से आए फैसले के बाद रामभक्तों की वर्षों पुरानी साध पूरी हुई। इसके कुछ ही महीनों बाद सीएम योगी आदित्यनाथ ने रामलला को टेंट से निकालकर अस्थायी मंदिर में विराजित कराया। ट्रस्ट के सदस्य महंत दिनेंद्र दास कहते हैं कि अब पीएम नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर निर्माण की आधारशिला रखकर  रामभक्तों की चिर आंकाक्षा को तृप्त करने का काम किया है। यह रामनगरी के लिए एक नए युग का शुभारंभ है।


पौने तीन दशक तक रामभक्तों की व्यथा का पर्याय रहा तिरपाल का गर्भगृह
रामलला के मुख्य अर्चक आचार्य सत्येंद्र दास तो राममंदिर के भूमि पूजन के बाद भावविभोर नजर आए। उन्होंने कहा, मेरे लिए यह अवसर अत्यंत गौरवप्रद, सुखद अनुभूति वाला है। जो खुशी हो रही है वह शब्दों से परे है, बस अनुभव कर सकता हूं। रामलला के तिरपाल का गर्भगृह करोड़ों रामभक्तों की व्यथा का पर्याय रहा है। पौने तीन दशक तक तिरपाल के गर्भगृह में रामलला मौसम की मार झेलते रहे। वर्ष भर में केवल एक बार ही रामलला को नई पोशाक मिलती थी। उनकी यह दशा हम सभी रामभक्तों को विचलित करती थी। अब काले बादल छंट गए हैं, रामनगरी में सौभाग्य का नया सूर्य उदित हुआ है।


अब राम जन्मभूमि पर तेजी से होगा मंदिर निर्माण
श्रीरामजन्मभूमि ट्रस्ट ने भूमिपूजन के बाद मंदिर निर्माण की तैयारी शुरू कर दी है। कुछ ही दिनों में एलएंडटी के इंजीनियर भारी-भरकम मशीनों के साथ नींव की खुदाई शुरू करेंगे। वास्तुकार सोमपुरा बंधुओं से डिजाइन के साथ पूरा ब्योरा ले लिया गया है। पहले चरण में नींव की खुदाई होगी, इसी के साथ नींव के लिए गिट्टी, बालू और पत्थर आने शुरू हो जाएंगे। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा कि करीब दो करोड़ रुपये शुल्क जमा करके अयोध्या विकास प्राधिकरण से मंदिर का नक्शा अतिशीघ्र पास कराया जाएगा। ट्रस्ट के सदस्य डॉ. अनिल मिश्र ने बताया कि अब इंतजार की घड़ियां खत्म हो गई हैं। एलएंडटी की मशीनें जल्द ही रामलला के मंदिर के निर्माण के लिए मौके पर गरजती दिखेंगी।

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