{"_id":"6105934b8ebc3e091b10413c","slug":"jhulanotsav-should-also-be-organized-in-the-temporary-temple-faizabad-news-lko5893492119","type":"story","status":"publish","title_hn":"अस्थायी मंदिर में भी झूलनोत्सव का आयोजन हो","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अस्थायी मंदिर में भी झूलनोत्सव का आयोजन हो
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अयोध्या। रामनगरी का सावन मेला वैष्णव मंदिरों में आयोजित होने वाले झूलनोत्सव के लिए ही प्रसिद्ध है। झूलनोत्सव के आरंभ से लेकर विराम तक मंदिरों में विराजमान भगवान के विग्रहों को झूले पर प्रतिष्ठित कर प्रतिदिन सांस्कृतिक संध्या का आयोजन होता है। इसमें आध्यात्म के साथ गीत-संगीत की त्रिवेणी भी प्रवाहित होती है।
हालांकि इस उत्सव से रामलला वंचित रह जाते हैं क्योंकि अस्थायी मंदिर में अभी तक रामलला के लिए झूला विहार की व्यवस्था नहीं की गई है। श्रीरामजन्मभूमि के पुजारी सहित संतों ने अस्थायी मंदिर में रामलला के लिए झूला लगवाने की मांग की है ताकि झूलनोत्सव की परंपरा का निर्वहन किया जा सके।
अयोध्या के मंदिरों में श्रावण शुक्ल तृतीया से झूलनोत्सव की धूम शुरू हो जाती है जबकि रामलला को श्रावण शुक्ल पंचमी से झूला विहार कराने की परंपरा रही है। अस्थायी मंदिर में रामलला के झूलन महोत्सव की परंपरा का निर्वहन नहीं हो पा रहा है।
विज्ञापन
श्रीरामजन्मभूमि के मुख्य अर्चक आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि अस्थायी मंदिर में भगवान के झूला विहार के लिए अभी तक झूला नहीं बनवाया गया है। पिछले वर्ष भी रामलला झूलन विहार नहीं कर सके थे, इस वर्ष भी अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है।
आचार्य सत्येंद्र दास ने बताया कि मेक शिफ्ट स्ट्रक्चर में करीब 28 वर्षों तक रहे रामलला के यहां भी झूलनोत्सव का आयोजन सीमित स्तर पर होता रहा है। संगीनों के साए में विराजमान रहे रामलला को काष्ठ के झूले पर प्रतिदिन प्रतिष्ठित कर दिया जाता था और रूटीन प्रक्रिया में निर्धारित अवधि में श्रद्धालु रामलला के झूलन विहार का दर्शन कर पाते थे।
उन्होंने बताया कि सावन पूर्णिमा तक प्रतिदिन रामलला का अभिषेक किया जाता था और खीर प्रसाद का भोग भी लगाया जाता था। अस्थायी मंदिर में काफी जगह है। एक झूला यहां लगाया जाना चाहिए ताकि रामलला को झूला विहार कराकर झूलनोत्सव की परंपरा का निर्वहन किया जा सके और भक्त भी अपने आराध्य के झूलन विहार का दर्शन कर सकें।
बावन मंदिर के महंत वैदेही बल्लभ शरण ने कहा कि अस्थायी मंदिर में झूलन परंपरा का निर्वहन करना ही चाहिए। ट्रस्ट को चाहिए कि वह भव्य झूला बनवाए ताकि रामलला झूलनोत्सव से वंचित न हों, भक्तों के लिए भी यह श्रद्धा का केंद्र होगा। आचार्य पीठ तपस्वी छावनी मंदिर के महंत परमहंस दास कहते हैं कि अब रामलला टेंट से निकलकर अस्थायी मंदिर में विराजमान हैं।
कोई कानूनी अड़चन भी नहीं रह गयी है। रामलला के राग-भोग से लेकर पूजन-अर्चन की व्यवस्था सुधरी है तो रामलला के उत्सव-समैया की भी भव्य व्यवस्था की जानी चाहिए। श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को अस्थायी मंदिर में रामलला के लिए झूला लगवाया जाना चाहिए।
अस्थायी मंदिर में झूलनोत्सव को लेकर मुख्य पुजारी से वार्ता की जाएगी। यदि पहले रामलला के झूलन की व्यवस्था होती रही है तो अस्थायी मंदिर में भी इस तरह की व्यवस्था ट्रस्ट के पदाधिकारियों से वार्ता कर कराई जाएगी। रामलला अब किसी भी उत्सव से वंचित न रह जाएं, यह ट्रस्ट की भी मंशा है।
विज्ञापन
हालांकि इस उत्सव से रामलला वंचित रह जाते हैं क्योंकि अस्थायी मंदिर में अभी तक रामलला के लिए झूला विहार की व्यवस्था नहीं की गई है। श्रीरामजन्मभूमि के पुजारी सहित संतों ने अस्थायी मंदिर में रामलला के लिए झूला लगवाने की मांग की है ताकि झूलनोत्सव की परंपरा का निर्वहन किया जा सके।
विज्ञापन
अयोध्या के मंदिरों में श्रावण शुक्ल तृतीया से झूलनोत्सव की धूम शुरू हो जाती है जबकि रामलला को श्रावण शुक्ल पंचमी से झूला विहार कराने की परंपरा रही है। अस्थायी मंदिर में रामलला के झूलन महोत्सव की परंपरा का निर्वहन नहीं हो पा रहा है।
विज्ञापन
श्रीरामजन्मभूमि के मुख्य अर्चक आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि अस्थायी मंदिर में भगवान के झूला विहार के लिए अभी तक झूला नहीं बनवाया गया है। पिछले वर्ष भी रामलला झूलन विहार नहीं कर सके थे, इस वर्ष भी अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई है।
आचार्य सत्येंद्र दास ने बताया कि मेक शिफ्ट स्ट्रक्चर में करीब 28 वर्षों तक रहे रामलला के यहां भी झूलनोत्सव का आयोजन सीमित स्तर पर होता रहा है। संगीनों के साए में विराजमान रहे रामलला को काष्ठ के झूले पर प्रतिदिन प्रतिष्ठित कर दिया जाता था और रूटीन प्रक्रिया में निर्धारित अवधि में श्रद्धालु रामलला के झूलन विहार का दर्शन कर पाते थे।
उन्होंने बताया कि सावन पूर्णिमा तक प्रतिदिन रामलला का अभिषेक किया जाता था और खीर प्रसाद का भोग भी लगाया जाता था। अस्थायी मंदिर में काफी जगह है। एक झूला यहां लगाया जाना चाहिए ताकि रामलला को झूला विहार कराकर झूलनोत्सव की परंपरा का निर्वहन किया जा सके और भक्त भी अपने आराध्य के झूलन विहार का दर्शन कर सकें।
बावन मंदिर के महंत वैदेही बल्लभ शरण ने कहा कि अस्थायी मंदिर में झूलन परंपरा का निर्वहन करना ही चाहिए। ट्रस्ट को चाहिए कि वह भव्य झूला बनवाए ताकि रामलला झूलनोत्सव से वंचित न हों, भक्तों के लिए भी यह श्रद्धा का केंद्र होगा। आचार्य पीठ तपस्वी छावनी मंदिर के महंत परमहंस दास कहते हैं कि अब रामलला टेंट से निकलकर अस्थायी मंदिर में विराजमान हैं।
कोई कानूनी अड़चन भी नहीं रह गयी है। रामलला के राग-भोग से लेकर पूजन-अर्चन की व्यवस्था सुधरी है तो रामलला के उत्सव-समैया की भी भव्य व्यवस्था की जानी चाहिए। श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को अस्थायी मंदिर में रामलला के लिए झूला लगवाया जाना चाहिए।
अस्थायी मंदिर में झूलनोत्सव को लेकर मुख्य पुजारी से वार्ता की जाएगी। यदि पहले रामलला के झूलन की व्यवस्था होती रही है तो अस्थायी मंदिर में भी इस तरह की व्यवस्था ट्रस्ट के पदाधिकारियों से वार्ता कर कराई जाएगी। रामलला अब किसी भी उत्सव से वंचित न रह जाएं, यह ट्रस्ट की भी मंशा है।