फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Ayodhya News ›   Giving testimony to the past glory and copper sheet

अतीत के गौरव की गवाही देते पत्र व ताम्रपत्र

Fri, 14 Aug 2015 11:32 PM IST
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूरो
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 14 Aug 2015 11:32 PM IST
विज्ञापन
इस्पाती व्यक्तित्व के थे रामप्रसाद सिंह। आजादी की यज्ञवेदी पर अपना सब कुछ हवन कर दिया। पढ़ने बनारस गए तो वहां क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए। जंग-ए-आजादी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना शुरू किया। अंग्रेजी हुकूमत ने उनके हौसले को पस्त करने की कोशिश की पर सफल नहीं हो सके।
विज्ञापन


दुखद ये है कि सेनानी की यादों को सहेजने के लिए सरकारें भी उदासीन रहीं। उनकी निशानियां यूं ही एक कमरे में पड़ी हुई हैं। पैतृक आवास में जेलयात्रा के दौर के दस्तावेज, तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त व पंजाब आर्ट कांउसिल के चेयरमैन का पत्र, इंदिरा गांधी की तरफ से दिए ताम्रपत्र उनके विराट व्यक्तित्व की गवाही दे रहे हैं।
विज्ञापन


पूरा ब्लॉक के सिरसिंडा गांव में महीपति सिंह के यहां रामप्रसाद सिंह का जन्म वर्ष 1902 में हुआ। क्रांतिकारी विचारों का बीजारोपड़ छात्र जीवन में हुआ। बनारस में  क्रांतिकारी नेताओं के सानिध्य में आते ही मां भारती को आजाद कराने को वे मचल गए।
विज्ञापन
विज्ञापन


बनारस से लेकर फैजाबाद तक के भौगोलिक क्षेत्र में  जंग-ए-आजादी में उन्होंने हिस्सा लिया। कारावास का ज्यादा समय गोंडा जेल में गुजरा। विदेशी कपड़ों की होली जलाई। सूत यज्ञ  किया। रामप्रसाद ने गांव-गांव घूमकर लोगों के कपार पर सवार गुलामी की मानसिकता को को खत्म करने व आत्मगौरव का बोध जगाने का काम किया।

 15 अगस्त  1947 को आजादी का सूरज उगा तो उसके बाद सेनानी ने खुद को ग्रामीण विकास के  लिए समर्पित कर दिया। कई पदों पर भी रहे। युवा तुर्क कहे जाने वाले चंद्रशेखर की भारत यात्रा शुरू हुई तो अवध के इस अंचल में उन्होंने अपने  छात्र जीवन के दोस्त के साथ कंधा से कंधा मिलाया। 82 वर्ष  की उम्र में  रामप्रसाद ने 28 अगस्त 1984 को इहलीला का संवरण कर लिया।

उनके पैतृक आवास में अपने समय की नामचीन हस्तियों के पत्र हैं जो उनके साथ संबंधों की गवाही दे रहे हैं। इसमें चंद्रशेखर का पत्र है, इंदिरा गांधी की ओर से दिया गया ताम्रपत्र है। तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त रामकृष्ण द्विवेदी, पंजाब आर्ट कांउसिल के चेयरमैन जीएस रंधावा, कांग्रेस शताब्दी समारोह के संयोजक सुखवंश कौर का  पत्र अब भी संरक्षित हैं।


रामप्रसाद के वंशज महेंद्र सिंह ने व्यथित हो कहा  कि बाबा की याद में न तो गांव में और न ही जिले में कोई स्मारक बना। उनकी याद को सहेजने के लिए सरकार से कई बार मांग की गई लेकिन अनसुनी कर दी गई।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed