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Ayodhya News: तीन माह में तैयार हो जाता है मोटा अनाज
Sun, 26 Feb 2023 12:25 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Sun, 26 Feb 2023 12:25 AM IST
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कुमारगंज (अयोध्या)। जिस मोटे अनाज में सेहत का खजाना छिपा है, उसकी बुआई का समय आ रहा है। किसान अभी से इसकी तैयारी कर सकते हैं। जिस तरह से केंद्र व राज्य सरकार बजट में मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा देने का प्रावधान कर रही हैं। उससे जाहिर है कि इनकी खेती करने वाले किसानों को अच्छा मुनाफा हो सकता है। खास बात यह है कि मोटे अनाज की फसल तीन माह के अंदर तैयार हो जाती है। मोटे अनाज में इन दिनों जायद फसल के रूप में जेठी सवां की बुआई की जा सकती है। नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की मानें तो मोटे अनाज के लिए दोमट मिट्टी सर्वोत्तम है, लेकिन यह हर तरह की मिट्टी में बोया जा सकता है। बशर्ते खेत में पानी का भराव न होता हो। खरीफ के सीजन में ज्वार, बाजरा, सावां, कोदो, काकुन, रागी या मडुआ, कुटकी फसल मोटे अनाज अंतर्गत बोई जाती है।
हालांकि बाजरा जैसी कुछ फसलों को छोड़कर बाकी फसलों के लिए उन्नत बीज अभी उपलब्ध नहीं हैं। क्योंकि अयोध्या जिले में प्राय: इनकी खेती बंद सी हो गई थी। मगर अब कृषि विश्वविद्यालय लगातार आधुनिक प्रजातियों को तैयार करने पर काम कर रहा है। निदेशक प्रसार डॉ. एपी राव कहते हैं कि फिलहाल सवां की आधुनिकतम प्रजाति बीएल 207, भावना तनु 164, तनु 145 उपलब्ध है। इसी तरह कुटकी की प्रमुख प्रजातियां जेके-4, जेके 8, जेके 36 और जेके 137 ही मुख्यत: उपलब्ध हैं। राव ने कहा कि मोटे अनाज की फसल 80 से 90 दिन के अंदर तैयार हो जाती है।
यहां से मिल सकते हैं आधुनिक बीज
किसान मोटे अनाज की उन्नतशील प्रजातियां भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद और विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा से मंगवा सकते हैं। नरेंद्र देव कृषि विवि और कृषि विज्ञान केंद्रों पर मोटे अनाज की नई प्रजातियों के उत्पादन पर काम चल रहा है। मोटे अनाजों की कुछ प्रजातियों जैसे सवां, काकून, रागी की कुछ प्रजातियां अमेठी के शादीपुर गांव में उन्नतशील किसान अवधेश कुमार सिंह या फिर कृषि विज्ञान केंद्र कटोरा अमेठी में भी मिलते हैं। केवीके प्रभारी डॉ. एके आनंद कहते हैं कि मोटे अनाज की मांग बढ़ने पर किसान प्रोत्साहित होंगे।
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उत्पादन कम है, दाम महंगा होना चाहिए
मोटे अनाज का औसत उत्पादन 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। बेहतर प्रबंधन व संतुलित निवेश से इसे 20 क्विंटल तक पहुंचाया जा सकता है। बावजूद इसके गेहूं-धान जैसी फसलों से यह काफी पीछे रहेगा। ऐसे में किसानों का मानना है कि जब तक इसकी कीमत सामान्य अनाज के मुकाबले अधिक नहीं होगा। तब तक किसान इसकी ओर आकर्षित नहीं होंगे।
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हालांकि बाजरा जैसी कुछ फसलों को छोड़कर बाकी फसलों के लिए उन्नत बीज अभी उपलब्ध नहीं हैं। क्योंकि अयोध्या जिले में प्राय: इनकी खेती बंद सी हो गई थी। मगर अब कृषि विश्वविद्यालय लगातार आधुनिक प्रजातियों को तैयार करने पर काम कर रहा है। निदेशक प्रसार डॉ. एपी राव कहते हैं कि फिलहाल सवां की आधुनिकतम प्रजाति बीएल 207, भावना तनु 164, तनु 145 उपलब्ध है। इसी तरह कुटकी की प्रमुख प्रजातियां जेके-4, जेके 8, जेके 36 और जेके 137 ही मुख्यत: उपलब्ध हैं। राव ने कहा कि मोटे अनाज की फसल 80 से 90 दिन के अंदर तैयार हो जाती है।
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यहां से मिल सकते हैं आधुनिक बीज
किसान मोटे अनाज की उन्नतशील प्रजातियां भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद और विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा से मंगवा सकते हैं। नरेंद्र देव कृषि विवि और कृषि विज्ञान केंद्रों पर मोटे अनाज की नई प्रजातियों के उत्पादन पर काम चल रहा है। मोटे अनाजों की कुछ प्रजातियों जैसे सवां, काकून, रागी की कुछ प्रजातियां अमेठी के शादीपुर गांव में उन्नतशील किसान अवधेश कुमार सिंह या फिर कृषि विज्ञान केंद्र कटोरा अमेठी में भी मिलते हैं। केवीके प्रभारी डॉ. एके आनंद कहते हैं कि मोटे अनाज की मांग बढ़ने पर किसान प्रोत्साहित होंगे।
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उत्पादन कम है, दाम महंगा होना चाहिए
मोटे अनाज का औसत उत्पादन 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। बेहतर प्रबंधन व संतुलित निवेश से इसे 20 क्विंटल तक पहुंचाया जा सकता है। बावजूद इसके गेहूं-धान जैसी फसलों से यह काफी पीछे रहेगा। ऐसे में किसानों का मानना है कि जब तक इसकी कीमत सामान्य अनाज के मुकाबले अधिक नहीं होगा। तब तक किसान इसकी ओर आकर्षित नहीं होंगे।