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बर्फबारी के बीच 20 घंटे लाइन में लगकर पार किया बार्डर
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अयोध्या। गोसाईगंज के बबुआपुर का निवासी सूरज तिवारी रविवार देर रात एक बजे जब घर पहुंचा तो परिजन उसे गले लगाकर रो पड़े। सूरज ने बताया कि यूक्रेन-रूस के बीच छिड़ी जंग में उन्हें तीन दिन दहशत के साए में गुजारने पड़े।
किसी तरह बॉर्डर पर पहुंचे तो वहां भी समस्या कम नहीं हुई। भीषण बर्फबारी के बीच 20 घंटे लाइन में लगकर बॉर्डर पार करना। उनके लिए यह किसी जंग से कम नहीं था। सकुशल घर पहुंचने पर उन्होंने व परिवारीजनों ने भारत सरकार का धन्यवाद ज्ञापित किया है।
सूूरज ने ‘अमर उजाला’ से बात करते एक मार्च से सात मार्च के बीच की जो दास्तां बताईं वह खौफनाक थीं। बताया कि वह यूक्रेन के पश्चिम दिशा में थे, जहां से सौ किलोमीटर दूर धमाके हो रहे थे।
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हालांकि उनके शहर में धमाके नहीं थे, लेकिन दहशत इतनी थी कि रात में सो नहीं पाते थे। वे एक फरवरी को किसी तरह शहर से निकले। वहां से स्लोवाकिया बॉर्डर नजदीक था। बॉर्डर पार करने में दो दिन लग गए।
उन्होंने बताया कि पहले बच्चों व बुजुर्गों को बॉर्डर से निकाला जा रहा था। माइनस दो डिग्री के तापमान में बर्फबारी के बीच 20 घंटे लाइन में लगकर किसी तरह बॉर्डर पार किया। इसके बाद पांच हजार रुपये किराया देकर बस से हंगरी बॉर्डर पहुंचे।
यहां उन्हें चार दिनों तक फंसना पड़ा। हंगरी बॉर्डर पार करने के बाद उनकी समस्या खत्म हुई। उन्होंने 6 मार्च को मुंबई से फ्लाइट पकड़ी और लखनऊ आए फिर लखनऊ से अयोध्या पहुंचे।
कहा कि बॉर्डर पार करने के बाद भारत सरकार की ओर से हर जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराईं गईं थी। हालांकि अब पढ़ाई बीच में लटकने की चिंता हो रही है, उम्मीद है कि भारत सरकार कुछ न कुछ रास्ता निकालेगी।
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किसी तरह बॉर्डर पर पहुंचे तो वहां भी समस्या कम नहीं हुई। भीषण बर्फबारी के बीच 20 घंटे लाइन में लगकर बॉर्डर पार करना। उनके लिए यह किसी जंग से कम नहीं था। सकुशल घर पहुंचने पर उन्होंने व परिवारीजनों ने भारत सरकार का धन्यवाद ज्ञापित किया है।
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सूूरज ने ‘अमर उजाला’ से बात करते एक मार्च से सात मार्च के बीच की जो दास्तां बताईं वह खौफनाक थीं। बताया कि वह यूक्रेन के पश्चिम दिशा में थे, जहां से सौ किलोमीटर दूर धमाके हो रहे थे।
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हालांकि उनके शहर में धमाके नहीं थे, लेकिन दहशत इतनी थी कि रात में सो नहीं पाते थे। वे एक फरवरी को किसी तरह शहर से निकले। वहां से स्लोवाकिया बॉर्डर नजदीक था। बॉर्डर पार करने में दो दिन लग गए।
उन्होंने बताया कि पहले बच्चों व बुजुर्गों को बॉर्डर से निकाला जा रहा था। माइनस दो डिग्री के तापमान में बर्फबारी के बीच 20 घंटे लाइन में लगकर किसी तरह बॉर्डर पार किया। इसके बाद पांच हजार रुपये किराया देकर बस से हंगरी बॉर्डर पहुंचे।
यहां उन्हें चार दिनों तक फंसना पड़ा। हंगरी बॉर्डर पार करने के बाद उनकी समस्या खत्म हुई। उन्होंने 6 मार्च को मुंबई से फ्लाइट पकड़ी और लखनऊ आए फिर लखनऊ से अयोध्या पहुंचे।
कहा कि बॉर्डर पार करने के बाद भारत सरकार की ओर से हर जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराईं गईं थी। हालांकि अब पढ़ाई बीच में लटकने की चिंता हो रही है, उम्मीद है कि भारत सरकार कुछ न कुछ रास्ता निकालेगी।