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अपराधियों को कहां से मिलते हैं कारतूस, पुलिस नहीं जानती
फैजाबाद/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 22 Jun 2015 10:58 PM IST
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ऐसे मामलों में कार्रवाई के दौरान पुलिस अवैध असलहे और कारतूस तो बरामद कर लेती है। लेकिन उन्हें बनाने और बेचने वालों तक पहुंच नहीं पाती। आर्म्स एक्ट की रिपोर्ट दर्ज करने के साथ ही विवेचना की स्क्रिप्ट तैयार कर पुलिस अपनी रिपोर्ट अदालत भेज देती है।
पुलिस के आंकड़ों पर गौर करें तो इस वर्ष छह माह में जिले में आर्म्स एक्ट के 68 मामले दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में 32 तमंचे 68 कारतूस तथा 36 चाकू की बरामदगी हुई। वर्ष 2014 में आर्म्स एक्ट के 93 मामले दर्ज किये गये थे।
निरोधात्मक कार्रवाई के तहत हर साल पुलिस बड़े पैमाने पर अवैध असलहे व कारतूस बरामद करती है। लेकिन अवैध असलहे बनाने वालों तक पहुंच नहीं पाती। फैक्ट्री मेड कारतूस की अवैध बिक्री करने वालों पर शिकंजा कस नहीं पाती। पुलिस की कार्रवाई किसी भी घटना में अपराधी की गिरफ्तारी और असलहों की बरामदगी तक ही सीमित रहती है।
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अवैध पिस्टल, रिवाल्वर तथा तमंचे व कारतूस की बरामदगी पर पुलिस हर बार बिहार प्रांत से खरीदे जाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेती है। कोई मुंगेर तो कोई अन्य जिले का नाम बताता है। तमंचे प्रदेश के कई जनपदों में बनने की बात प्रकाश में आती है।
हालांकि पुलिस टीम न तो संबंधित जनपदों को जांच के लिए जाती है और न ही छापेमारी के लिए। फैक्ट्री में बनने वाले कारतूस अपराधियों तक पहुंचने के तंत्र का खुलासा नहीं हो पाता है।
एसपी सिटी आरएस गौतम का कहना है कि ऐसा नहीं है कि विवेचना में लापरवाही बरती जाती है। अक्सर पकड़े जाने वाला अपराधी तमंचे व कारतूस देने वालों के बारे में सही सूचना नहीं देता। इससे तलाश अधूरी रह जाती है।
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पुलिस के आंकड़ों पर गौर करें तो इस वर्ष छह माह में जिले में आर्म्स एक्ट के 68 मामले दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में 32 तमंचे 68 कारतूस तथा 36 चाकू की बरामदगी हुई। वर्ष 2014 में आर्म्स एक्ट के 93 मामले दर्ज किये गये थे।
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निरोधात्मक कार्रवाई के तहत हर साल पुलिस बड़े पैमाने पर अवैध असलहे व कारतूस बरामद करती है। लेकिन अवैध असलहे बनाने वालों तक पहुंच नहीं पाती। फैक्ट्री मेड कारतूस की अवैध बिक्री करने वालों पर शिकंजा कस नहीं पाती। पुलिस की कार्रवाई किसी भी घटना में अपराधी की गिरफ्तारी और असलहों की बरामदगी तक ही सीमित रहती है।
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अवैध पिस्टल, रिवाल्वर तथा तमंचे व कारतूस की बरामदगी पर पुलिस हर बार बिहार प्रांत से खरीदे जाने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेती है। कोई मुंगेर तो कोई अन्य जिले का नाम बताता है। तमंचे प्रदेश के कई जनपदों में बनने की बात प्रकाश में आती है।
हालांकि पुलिस टीम न तो संबंधित जनपदों को जांच के लिए जाती है और न ही छापेमारी के लिए। फैक्ट्री में बनने वाले कारतूस अपराधियों तक पहुंचने के तंत्र का खुलासा नहीं हो पाता है।
एसपी सिटी आरएस गौतम का कहना है कि ऐसा नहीं है कि विवेचना में लापरवाही बरती जाती है। अक्सर पकड़े जाने वाला अपराधी तमंचे व कारतूस देने वालों के बारे में सही सूचना नहीं देता। इससे तलाश अधूरी रह जाती है।