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संतों ने कहा, वेदों में नहीं है कोई जाति व्यवस्था
Updated Sun, 16 Dec 2018 12:48 AM IST
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अयोध्या। डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के नवीन परिसर में शनिवार को दो दिवसीय समरसता कुंभ का उद्घाटन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया। समरसता कुंभ के मंच पर मौजूद आरएसएस के पदाधिकारियों व संतों ने जाति व्यवस्था पर निशाना साधते हुए कहा कि हमारे वेदों व संस्कृति में जाति की कोई व्यवस्था नहीं है। सनातन समाज सदैव से समरस रहा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास ने कहा कि जितने भी धर्मगुरू हुए हैँ, सबने समरसता का पाठ पढ़ाया है। हमारे धर्म में कहा गया है कि सियाराम मय सब जग जानी... यही समरसता है। कुंभ जैसे आयोजन यह साबित करते हैं कि हमारी सनातन परंपरा में जाति व्यवस्था के लिए कोई स्थान नहीं है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह भागैय्या जी ने कहा कि समरसता जीवन मूल्य का संदेश है। सनातन धर्म सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है इसकी संकल्पना है कि पत्ते-पत्ते में परमेश्वर है। भारतीय समाज में छुआछूत, अस्पृश्यता का कभी कोई स्थान नहीं रहा। वेद उपनिषद रामायण जैसे प्रमुख ग्रंथों में भी छुआछूत के लिए कोई स्थान नहीं है।
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संत रविदास के वक्तव्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि जाति के आधार पर कोई छोटा-बड़ा नहीं है। पुणे से पधारे स्वामी गोविंद देव गिरि जी ने कहा कि समरसता का अद्भुत दर्शन कुंभ में आकर किया जा सकता है। विश्व के सभी संप्रदाय अलग-अलग होकर भी कुंभ में समरस हो जाते है। राष्ट्र के एकात्म का कुंभ एक अद्वितीय उदाहरण है। आओ मिलकर विचारें और समर्थ राष्ट्र का निर्माण करें।
भारत में समरसता का भाव जिले-जिले, गांव-गांव में जगाने के लिए अपना योगदान देना ही साधना, ईश्वर की उपासना है, यही अपेक्षा हमसे रामलला रखते हैं। राज्यमंत्री ग्राम्य विकास उत्तर प्रदेश सरकार डॉ. महेंद्र सिंह ने कहा कि कुंभ का आयोजन पूरे विश्व समुदाय के लिए समरसता का संदेश है। भेदभाव के बगैर संत समाज, धर्मावलंबी एवं गृहस्थ एक होकर विश्व समुदाय को सांस्कृतिक एकता का संदेश देते है।
राष्ट्र की संपन्न सनातन परंपरा में सामाजिक भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है। समरसता कुंभ के द्वितीय सत्र में डॉ. सुनीता शास्त्री ने कहा कि यह हम सभी का परम सौभाग्य है कि हमारे धर्म ग्रंथों में सामाजिक समरसता का उल्लेख है। प्रो. कौशल किशोर ने कहा कि सामाजिक समरसता की सबसे बड़ी शिक्षा हमें धर्म ग्रंथों से मिलती है। द्वितीय सत्र को पूज्य भंते राहुल बोधी ने भी संबोधित किया।
इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ मॅां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया। विश्वविद्यालय की छात्राओं ने कुलगीत एवं राष्ट्रगान प्रस्तुत किया। कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित ने मुख्यमंत्री को दीपोत्सव का चित्र भेंट किया गया अन्य अतिथियों का स्वागत स्मृति चिन्ह एवं अंग वस्त्र भेंटकर किया गया। संचालन प्रो. अशोक शुक्ला व धन्यवाद ज्ञापन समाज कल्याण मंत्री रमापति शास्त्री ने किया।
इस मौके पर विहिप के अंतरराष्ट्रीय संगठन मंत्री दिनेशचंद्र, समरसता कुंभ के समन्वयक जयप्रकाश चतुर्वेदी, महंत सुरेश दास, अधिकारी राजकुमार दास, महंत रामदास, महंत डॉ. भरतदास, ज्ञानी गुरूजीत सिंह, संस्कृति एवं पर्यटन सचिव अवनीश अवस्थी, सांसद लल्लू सिंह, नगर विधायक वेद गुप्ता, महापौर ऋषिकेश उपाध्याय आदि मौजूद रहे।
समरस समाज के लिए धर्मग्रंथों की ओर देना होगा ध्यान
समरसता कुंभ के स्वागत उद्बाोधन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनेाज दीक्षित ने कहा कि कुंभ का आयोजन आदिकाल से देश में चार स्थानों पर होता आ रहा है। यह महज धार्मिक आयोजन न होकरहमारी समृद्ध परंपरा का एक हिस्सा है। विश्व समुदाय में राष्ट्रीय एकता एवं वसुधैव कुटुंबकम की संकल्पना का संदेश है। समरस समाज समर्थ राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है, जब हम अपनी इन समृद्ध धरोहरों के मूल्य स्वरूप को बनाए रखेंगे। प्रो. दीक्षित ने बताया कि समरस समाज की स्थापना के लिए हमें अपने धर्म ग्रंथों की ओर पुन: ध्यान देना होगा।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास ने कहा कि जितने भी धर्मगुरू हुए हैँ, सबने समरसता का पाठ पढ़ाया है। हमारे धर्म में कहा गया है कि सियाराम मय सब जग जानी... यही समरसता है। कुंभ जैसे आयोजन यह साबित करते हैं कि हमारी सनातन परंपरा में जाति व्यवस्था के लिए कोई स्थान नहीं है।
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह भागैय्या जी ने कहा कि समरसता जीवन मूल्य का संदेश है। सनातन धर्म सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है इसकी संकल्पना है कि पत्ते-पत्ते में परमेश्वर है। भारतीय समाज में छुआछूत, अस्पृश्यता का कभी कोई स्थान नहीं रहा। वेद उपनिषद रामायण जैसे प्रमुख ग्रंथों में भी छुआछूत के लिए कोई स्थान नहीं है।
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संत रविदास के वक्तव्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि जाति के आधार पर कोई छोटा-बड़ा नहीं है। पुणे से पधारे स्वामी गोविंद देव गिरि जी ने कहा कि समरसता का अद्भुत दर्शन कुंभ में आकर किया जा सकता है। विश्व के सभी संप्रदाय अलग-अलग होकर भी कुंभ में समरस हो जाते है। राष्ट्र के एकात्म का कुंभ एक अद्वितीय उदाहरण है। आओ मिलकर विचारें और समर्थ राष्ट्र का निर्माण करें।
भारत में समरसता का भाव जिले-जिले, गांव-गांव में जगाने के लिए अपना योगदान देना ही साधना, ईश्वर की उपासना है, यही अपेक्षा हमसे रामलला रखते हैं। राज्यमंत्री ग्राम्य विकास उत्तर प्रदेश सरकार डॉ. महेंद्र सिंह ने कहा कि कुंभ का आयोजन पूरे विश्व समुदाय के लिए समरसता का संदेश है। भेदभाव के बगैर संत समाज, धर्मावलंबी एवं गृहस्थ एक होकर विश्व समुदाय को सांस्कृतिक एकता का संदेश देते है।
राष्ट्र की संपन्न सनातन परंपरा में सामाजिक भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है। समरसता कुंभ के द्वितीय सत्र में डॉ. सुनीता शास्त्री ने कहा कि यह हम सभी का परम सौभाग्य है कि हमारे धर्म ग्रंथों में सामाजिक समरसता का उल्लेख है। प्रो. कौशल किशोर ने कहा कि सामाजिक समरसता की सबसे बड़ी शिक्षा हमें धर्म ग्रंथों से मिलती है। द्वितीय सत्र को पूज्य भंते राहुल बोधी ने भी संबोधित किया।
इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ मॅां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया। विश्वविद्यालय की छात्राओं ने कुलगीत एवं राष्ट्रगान प्रस्तुत किया। कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित ने मुख्यमंत्री को दीपोत्सव का चित्र भेंट किया गया अन्य अतिथियों का स्वागत स्मृति चिन्ह एवं अंग वस्त्र भेंटकर किया गया। संचालन प्रो. अशोक शुक्ला व धन्यवाद ज्ञापन समाज कल्याण मंत्री रमापति शास्त्री ने किया।
इस मौके पर विहिप के अंतरराष्ट्रीय संगठन मंत्री दिनेशचंद्र, समरसता कुंभ के समन्वयक जयप्रकाश चतुर्वेदी, महंत सुरेश दास, अधिकारी राजकुमार दास, महंत रामदास, महंत डॉ. भरतदास, ज्ञानी गुरूजीत सिंह, संस्कृति एवं पर्यटन सचिव अवनीश अवस्थी, सांसद लल्लू सिंह, नगर विधायक वेद गुप्ता, महापौर ऋषिकेश उपाध्याय आदि मौजूद रहे।
समरस समाज के लिए धर्मग्रंथों की ओर देना होगा ध्यान
समरसता कुंभ के स्वागत उद्बाोधन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनेाज दीक्षित ने कहा कि कुंभ का आयोजन आदिकाल से देश में चार स्थानों पर होता आ रहा है। यह महज धार्मिक आयोजन न होकरहमारी समृद्ध परंपरा का एक हिस्सा है। विश्व समुदाय में राष्ट्रीय एकता एवं वसुधैव कुटुंबकम की संकल्पना का संदेश है। समरस समाज समर्थ राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है, जब हम अपनी इन समृद्ध धरोहरों के मूल्य स्वरूप को बनाए रखेंगे। प्रो. दीक्षित ने बताया कि समरस समाज की स्थापना के लिए हमें अपने धर्म ग्रंथों की ओर पुन: ध्यान देना होगा।