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इतिहास लेखन की प्रवृति बदलने की आवश्यकता: प्रो. रजवंत

Wed, 07 Feb 2018 12:19 AM IST
Updated Wed, 07 Feb 2018 12:19 AM IST
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इतिहास लेखन की प्रवृति बदलने की आवश्यकता: प्रो. रजवंत
इतिहास लेखन की प्रवृत्ति बदलने की जरूरत : प्रो. रजवंत
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फैजाबाद। इतिहास परिवर्तन व्याख्याओं की लंबी श्रृंखला है। जब इतिहास का पुनर्पाठ बदलता है तो, समाज बदलता है व इतिहास के तथ्यों के आधार पर नई विचार प्रणाली बनती है। उसी के आधार पर लेखन होता है। नए-नए विश्लेषण से नव लेखन होगा। यह बातें अवध विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध इतिहासविद् प्रो. रजवंत राव ने कहीं।
वे मंगलवार को अवध विवि व दीन दयाल उपाध्याय विवि गोरखपुर के प्री-पीएचडी कोर्स के शोध छात्र-छात्राओं को इतिहास लेखन नामक शीर्षक पर एक व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। मुख्य अतिथि प्रो. रजवंत राव ने कहा कि अंग्रेज जब भारत आए तो उन्होंने इतिहास के नए तथ्यों को खोजना प्रारंभ किया। अंग्रेजों ने सर्वप्रथम मनुस्मृति का अनुवाद करवाया, जिससे वह सफल राज कर सकें। इतिहास लेखन में दृष्टिकोण बहुत आवश्यक है। संस्कृत का विद्यार्थी जो लिखा है, उसे मान लेता है, जब कि इतिहास का विद्यार्थी ठहरकर विचार करता है, जो लिखा है उसे उसी रूप में नहीं मान लेता है। वह तर्क के आधार पर ही निर्णय लेता है। प्रो. राव ने कहा कि वर्तमान में राष्ट्रवादी, साम्राज्यवादी, मार्क्सवादी, वामपंथी तथा आदर्शवादी लेखन प्रचलित हैं, परन्तु वर्तमान भारतीय परिवेश को दृष्टिगत रखते हुए इतिहास लेखन की प्रवृत्ति एवं प्रकृति को बदलने की आवश्यकता है।
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विभागाध्यक्ष प्रो. अजय सिंह ने कहा कि इतिहास लेखन में तथ्य तो एक ही होता है परन्तु लेखन का दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न होता है। उन्होंने कहा कि शोधार्थियों को चाहिए कि सही तथ्यों का चुनाव कर अपने दृष्टिकोण से विभिन्न प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर साक्ष्यों का चुनाव करें, तभी सही निष्कर्ष की प्राप्ति हो सकती है। कार्यक्रम के प्रारम्भ में मुख्य अतिथि प्रो. रजवंत राव का स्वागत पुष्पगुच्छ, अंगवस्त्र एवं स्मृति चिह्न देकर विभागाध्यक्ष प्रो. अजय प्रताप सिंह द्वारा स्वागत किया गया। कार्यक्रम के संचालक डॉ. राजेश सिंह ने किया। कार्यक्रम में डॉ. फारूख जमाल, डॉ. संग्राम सिंह, डॉ. देव नारायण वर्मा, डॉ. राज कुमार सिंह आदि समेत विभागीय छात्र/छात्राएं के साथ-साथ शोधार्थी मौजूद रहे।
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