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कथा सुनने से प्रशस्त होता ज्ञान का मार्ग : देवेंद्र प्रसादाचार्य
Updated Tue, 10 Jul 2018 11:32 PM IST
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कथा सुनने से प्रशस्त होता ज्ञान का मार्ग : देवेंद्र प्रसादाचार्य
अयोध्या। जब तक निस्वार्थ और निष्काम सेवा भाव के साथ हम भक्ति नहीं करेंगे, हमारे कर्मों का फल भी अनुकूल नहीं मिलेगा। अध्यात्म के अभाव को दूर कर हम इंद्रियों पर नियंत्रण रखना सीख लेंगे तभी हमारा सेवाधर्म फलीभूत हो सकेगा। कथा श्रवण करने से धर्म व ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।
उक्त उद्गार हैं दशरथ महल बड़ा स्थान के महंत बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंदप्रसादाचार्य जी महाराज के। वे हरिधामगोपाल मंदिर में आयोजित कथावाचक संघ की बैठक को संबोधित कर रहे थे। बैठक को संबोधित करते हुए ज.गु. हर्याचार्य ने कहा कि मन कोई अंग नहीं आत्मा का आवरण है और वही परमात्मा है। मन में घुस बैठे अहम को मार लेंगे तो जीवन संवर जाएगा। निष्काम भाव का उपदेश, आदेश और प्रचार ही धर्म की स्थापना है। वेद शास्त्रों और पुराणों में कहा गया है कि सत्य के समान दूसरा धर्म नहीं है। बैठक में वक्ताओं ने वर्तमान समय में रामकथा की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए इस परंपरा को अक्षुण्ण बनाने पर जोर दिया। संचालन तुलसीदास जी महाराज ने किया। बैठक में रामायणी राममंगल दास जी महाराज, महंत राघव दास, मानस भूषण आचार्य रत्नेश जी, महंत दिलीप दास, आचार्य रघुनाथदास त्यागी, रमेश दास शास्त्री, लवकुश शास्त्री सहित अन्य संत-महंतों ने धर्म के मूल स्वरूप पर अपने सारगर्भित विचार रखे।
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अयोध्या। जब तक निस्वार्थ और निष्काम सेवा भाव के साथ हम भक्ति नहीं करेंगे, हमारे कर्मों का फल भी अनुकूल नहीं मिलेगा। अध्यात्म के अभाव को दूर कर हम इंद्रियों पर नियंत्रण रखना सीख लेंगे तभी हमारा सेवाधर्म फलीभूत हो सकेगा। कथा श्रवण करने से धर्म व ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है।
उक्त उद्गार हैं दशरथ महल बड़ा स्थान के महंत बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंदप्रसादाचार्य जी महाराज के। वे हरिधामगोपाल मंदिर में आयोजित कथावाचक संघ की बैठक को संबोधित कर रहे थे। बैठक को संबोधित करते हुए ज.गु. हर्याचार्य ने कहा कि मन कोई अंग नहीं आत्मा का आवरण है और वही परमात्मा है। मन में घुस बैठे अहम को मार लेंगे तो जीवन संवर जाएगा। निष्काम भाव का उपदेश, आदेश और प्रचार ही धर्म की स्थापना है। वेद शास्त्रों और पुराणों में कहा गया है कि सत्य के समान दूसरा धर्म नहीं है। बैठक में वक्ताओं ने वर्तमान समय में रामकथा की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए इस परंपरा को अक्षुण्ण बनाने पर जोर दिया। संचालन तुलसीदास जी महाराज ने किया। बैठक में रामायणी राममंगल दास जी महाराज, महंत राघव दास, मानस भूषण आचार्य रत्नेश जी, महंत दिलीप दास, आचार्य रघुनाथदास त्यागी, रमेश दास शास्त्री, लवकुश शास्त्री सहित अन्य संत-महंतों ने धर्म के मूल स्वरूप पर अपने सारगर्भित विचार रखे।
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