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Etawah News: चकरनगर क्षेत्र में पहचान खो रहीं रामलीला मंडलियां

Thu, 26 Oct 2023 01:13 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, इटावा
संवाद न्यूज एजेंसी, इटावा Updated Thu, 26 Oct 2023 01:13 AM IST
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Ramlila troupes are losing identity in Chakarnagar area
सरकारी संरक्षण ने सांस्कृतिक कार्यक्रम खो रहे अस्तित्व, चंदे-चढ़ौती के भरोसे कलाकार कर रहे संघर्ष
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संवाद न्यूज एजेंसी
चकरनगर। दशहरा व दीपावली पर बीहड़ क्षेत्र चकरनगर में 30 वर्ष पूर्व रामलीला मंचन की परंपरा गांवों में गुम हो गई है। राजनीतिक व प्रधानी चुनाव टीवी और फिल्मों के चलन से अब गांवों में लीला मंडलियां बिखर गईं। अब गिने0चुने गांवों में ही रामलीला का आयोजन किया जाता है।

पहले क्षेत्र में गांव-गांव में रामलीला होती थी। राजनीतिक मतभेदों और फिल्मों के दिखावे ने लीलाएं बंदी कगार पर ला दीं। समय के साथ युवाओं में सांस्कृतिक कार्यक्रम के प्रति लगाव भी खत्म हो गया है। दो दशक पहले दशहरा के समय गांव-गांव में रामलीला का आयोजन किया जाता था। लीला में पुरुष कलाकार ही अभिनय करते थे।
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महिला पात्रों की भूमिका भी वह ही निभाते थे, लेकिन टीवी और मोबाइल के चलन से रामलीला नाटक का चलन ही समाप्त हो गया। यदाकदा किसी गांव में रामलीला का मंचन होता भी है तो पहले ही तरह भीड़ नहीं जुटती। विभिन्न चैनलों में धार्मिक सीरियलों की बाढ़ और मल्टीमीडिया की उन्न्त तकनीक के चलते रामलीला से लोग अब दूर हो गए।
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रामायण और अन्य पौराणिक ग्रंथों का नाट्य रूपांतरण कर चैनलों में बेहतर प्रदर्शन किए जाने से लोगों का रुझान अब रामलीला से घट गया। यह अब कुछ ही गांवों में सिमट गया। पहले जिले के गांव-गांव में रामलीला करने के लिए मंडलियां थीं, लेकिन अब उनका अस्तित्व नहीं है।
सिरसा, पिपरौली गढ़िया, बिड़ोरी, चकरनगर, गढ़ा कसदा सहित सहित अन्य कई गांवों में रामलीला का मंचन होता था, लेकिन इन गांवों में अब मंडली अस्तित्व में नहीं है। रामलीला मंडलियों को सरकार से संरक्षण नहीं मिलने के कारण ये अपना अस्तित्व खो रही हैं। कुछ मंडलियां चंदे व चढ़ोती के भरोसे इस विधा को जीवित रखने संघर्ष कर रही हैं। आने वाले दिनों में रामलीला मंडलियों की पहचान ही खत्म हो सकती है।

फोटो 29::::आश मोहम्मद।

जवाहर इंटर कालेज की रामलीला थी एकता का प्रतीक
जवाहर इंटर कालेज की लीला क्षेत्र में हिंदू मुस्लिम एकता की प्रतीक थी। इसमें कलाकार मुस्लिम समुदाय के लोग थे। आश मोहम्मद बताते हैं कि वर्ष 2002 में जवाहर इंटर कालेज में कक्षा नौ के छात्र थे। हम रामलीला में हमेशा राम का किरदार निभाते थे। कुछ लोग हमको आज राम भी राम कहकर बुलाते हैं।
फोटो 30::::नरायण सिंह।
आज के बच्चों को नहीं पता कैसे होती थी रामलीला
काफी सालों तक रामलीला में राम का किरदार निभाने वाले सिरसा निवासी नरायण सिंह बताते हैं कि रामलीला की तैयारी कई दिन पहले ही शुरू कर दी जाती थी। पेटी बजाने वालों के साथ पहले अभ्यास किया जादा था। रामलीला की झंडी बांधने से लेकर स्टेज बनाने सहित अन्य कार्य सभी मिलकर करते थे। आज के युवा-बच्चों को पता तक नहीं है कि रामलीला का कैसे की जाती थी। राम के किरदार में पूरा गांव मेरे पैर छूते थे। जिससे बच्चों में सम्मान की भावना जाग्रत होती थी।



फोटो 31::: रामलीला में कभी लक्ष्मण का किरदार निभाने वाले श्री कृष्ण यादव कहते हैं कि भारतीय लोक कलाओं की उपेक्षा के कारण लोक कलाकारों के सामने रोटी के लाले पड़े हुए हैं। यदि इस ओर सरकार ने ध्यान न दिया तो आने वाले समय में लोक कलाओं का अस्तित्व मिट जाएगा।
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