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नत्थू सिंह ने बनाया था राजनीतिक के दांव-पेंच में माहिर
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इटावा। बात 1966 की है, मैनपुरी में कुश्ती प्रतियोगिता के दौरान जसवंतनगर के विधायक और कुश्ती के माहिर खिलाड़ी रहे नत्थू सिंह की नजर दंगल के मैदान पर दांवपेच दिखा रहे मुलायम सिंह पर पड़ी। मुलायम ने चरखा दांव से भारीभरकम पहलवान को ऐसी पटकनी दी कि नत्थू सिंह उनके मुरीद हो गए। वह मुलायम से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें शागिर्द बना लिया। बस यहीं से एक साधारण शिक्षक की जिंदगी बदल गई।
नेताजी के करीबी और सैफई के प्रधान रामपाल वाल्मीकि ने बताया कि नत्थू सिंह के संपर्क में आने के समय मुलायम सिंह मैनपुरी के करहल स्थित जैन इंटर कॉलेज में शिक्षक थे।
नत्थू सिंह ने 1967 के विधानसभा चुनाव में जसवंतनगर की अपनी परंपरागत सीट नेता जी के लिए छोड़ दी। इस सीट से वह पहली बार संयुक्त समाजवादी पार्टी से विधायक बने। राजनीति में आने के बाद भी नेताजी का कुश्ती के प्रति लगाव कायम रहा। नत्थू सिंह ने उन्हें कुश्ती और राजनीति दोनों में माहिर बनाया। 1977 में प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार में सहकारिता मंत्री बने। राजनीति में आने से पूर्व वह आगरा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए और बीटी करने के बाद जैन इंटर कॉलेज में शिक्षक नियुक्त हुए थे। सक्रिय राजनीति में आने के बाद नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।
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पिता चाहते थे पहलवान बनाना
मुलायम सिंह की कद काठी सुडौल थी। पिता सुघर सिंह उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे। उन्होंने कई दंगलों में बड़े-बड़े पहलवानों को पटकनी भी दी। बाद में राजनीति के मैदान में विरोधियों को पटकनी देनी शुरू कर दी।
पुस्तकों में भी रहे चर्चित
नेताजी पर कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं। मुलायम सिंह यादव चिंतन और विचार पुस्तक अशोक कुमार शर्मा ने लिखी थी। राम सिंह और अंशुमान यादव की लिखी मुलायम सिंह : ए पॉलिटिकल बायोग्राफी, अब उनकी प्रमाणिक जीवनी है।
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नेताजी के करीबी और सैफई के प्रधान रामपाल वाल्मीकि ने बताया कि नत्थू सिंह के संपर्क में आने के समय मुलायम सिंह मैनपुरी के करहल स्थित जैन इंटर कॉलेज में शिक्षक थे।
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नत्थू सिंह ने 1967 के विधानसभा चुनाव में जसवंतनगर की अपनी परंपरागत सीट नेता जी के लिए छोड़ दी। इस सीट से वह पहली बार संयुक्त समाजवादी पार्टी से विधायक बने। राजनीति में आने के बाद भी नेताजी का कुश्ती के प्रति लगाव कायम रहा। नत्थू सिंह ने उन्हें कुश्ती और राजनीति दोनों में माहिर बनाया। 1977 में प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार में सहकारिता मंत्री बने। राजनीति में आने से पूर्व वह आगरा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए और बीटी करने के बाद जैन इंटर कॉलेज में शिक्षक नियुक्त हुए थे। सक्रिय राजनीति में आने के बाद नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।
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पिता चाहते थे पहलवान बनाना
मुलायम सिंह की कद काठी सुडौल थी। पिता सुघर सिंह उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे। उन्होंने कई दंगलों में बड़े-बड़े पहलवानों को पटकनी भी दी। बाद में राजनीति के मैदान में विरोधियों को पटकनी देनी शुरू कर दी।
पुस्तकों में भी रहे चर्चित
नेताजी पर कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं। मुलायम सिंह यादव चिंतन और विचार पुस्तक अशोक कुमार शर्मा ने लिखी थी। राम सिंह और अंशुमान यादव की लिखी मुलायम सिंह : ए पॉलिटिकल बायोग्राफी, अब उनकी प्रमाणिक जीवनी है।