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इंजीनियरिंग की पढ़ाई में कई रोड़े
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इटावा। इंजीनियरिंग की पढ़ाई में छात्राओं के सामने कई प्रकार की चुनौतियां हैं। ये चुनौतियां परंपराओं, माहौल और सामाजिक रीति-नीति से जुड़ी हैं। इन रूढ़ियों को तोड़कर छात्राओं में आगे बढ़ने का हौसला है। आज वे हर क्षेत्र में अपने को कुशल साबित कर रही हैं। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में अपने करियर को लेकर वे पूरी तरह से संजीदा हैं।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविद की इस बारे में जताई गई चिंता के बाद अमर उजाला ने छात्राओं का मन टटोला। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाली छात्राओं ने खुलकर मन की बात कही। कहीं अभिभावकों की मजबूरी तो कहीं सुरक्षा को लेकर विचार रखे। बीएचयू से आईआइटी कर रही छात्रा अंशुल सहाय ने चार सूत्री समाधान भी दिया। कहा कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई और छात्राओं के बीच आने वाली खाई को कम किया जा सकता है। सरकार और समाज के स्तर पर इसके प्रयास होने चाहिए। बाबा साहब भीमराव आंबेडकर अभियांत्रिकी महाविद्यालय में कंप्यूटर साइंस से बीटेक की छात्रा अंशिका ने कहा कि सबसे पहला कारण यह है कि मां-बाप बेटी की पढ़ाई पर ज्यादा खर्च नहीं करना चाहते। इंजीनियरिंग की पढ़ाई महंगी है। एक सामान्य परिवार में जब सीमित आमदनी हो तो बेटी की पढ़ाई पर अधिक खर्च न कर पाना मां-बाप की मजबूरी है।
कहा कि छात्राओं को इंटर के बाद अन्य विषयों के लिए प्रेरित किया जाता है। कृषि से बीटेक कर रही छात्रा न्यासा का कहना है कि अभिभावक खर्च का दोहरा दबाव नहीं सहन कर पाते। पहले तो बेटी की महंगी पढ़ाई में खर्चा करें, इसके बाद शादी की भी चिंता रहती है, जिससे पढ़ाई ही प्रभावित हो जाती है। दूसरा लड़के-लड़कियों का अनुपात भी कम है। इस लिहाज से भी संख्या कम रहनी स्वाभाविक है। कंप्यूटर साइंस से बीटेक कर रही यशस्वी सिंह का कहना है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई और नौकरी दोनों घर से काफी दूर होती है। ऐसे में सुरक्षा के दृष्टिकोण से अभिभावक बेटियों को बाहर भेजना ज्यादा पसंद नहीं कर सकते। पढ़ाई तो हास्टल में हो जाएगी, परंतु अकेली लड़की को इंजीनियरिंग की नौकरी करने दूसरे प्रांतों में भेजने में उन्हें असहज महसूस होता है।
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छात्रा मानसी द्विवेदी का कहना रहा कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद अधिकतर नौकरियां निजी सेक्टर में आती हैं। अभिभावक प्राइवेट की अपेक्षा सरकारी सेवाओं में बालिकाओं को भेजना ज्यादा पसंद करते हैं। इंजीनियरिंग में छात्राओं की कमी का एक कारण यह भी है। इंजीनियरिंग छात्रा दुर्गेश, प्रिया, तान्या, निशा और प्राची ने कहा कि सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा का भी है। असुरक्षा के भाव से अभिभावक बालिकाओं को घर से बहुत ज्यादा दूर पढ़ने नहीं भेजना चाहते हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई की सुविधा हर जिले में होनी चाहिए। इससे यह समस्या काफी हद तक सुलझ जाएगी।
बीएचयू की छात्रा अंशुल सहाय ने कहा कि पांच मार्च 2019 से स्कूल-कालेज बंद हैं। लोगों में जागरुकता नहीं है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई की बात तो छोड़िए बालिकाओं को प्राइमरी एजुकेशन में भी कठिनाई है। जब तक लड़कियां अपने को एक उदाहरण के रूप में सामने लाएं, तभी जागरुकता बढ़ेगी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के प्रति छात्राओं को प्रेरित करने के लिए सरकारी और सामाजिक स्तर पर बढ़ावा देने की जरूरत भी है। मसलन सरकार को स्कालरशिप जैसी योजनाएं और बालिकाओं की फीस आदि के बारे में विशेष रियायत देनी चाहिए।
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविद की इस बारे में जताई गई चिंता के बाद अमर उजाला ने छात्राओं का मन टटोला। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाली छात्राओं ने खुलकर मन की बात कही। कहीं अभिभावकों की मजबूरी तो कहीं सुरक्षा को लेकर विचार रखे। बीएचयू से आईआइटी कर रही छात्रा अंशुल सहाय ने चार सूत्री समाधान भी दिया। कहा कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई और छात्राओं के बीच आने वाली खाई को कम किया जा सकता है। सरकार और समाज के स्तर पर इसके प्रयास होने चाहिए। बाबा साहब भीमराव आंबेडकर अभियांत्रिकी महाविद्यालय में कंप्यूटर साइंस से बीटेक की छात्रा अंशिका ने कहा कि सबसे पहला कारण यह है कि मां-बाप बेटी की पढ़ाई पर ज्यादा खर्च नहीं करना चाहते। इंजीनियरिंग की पढ़ाई महंगी है। एक सामान्य परिवार में जब सीमित आमदनी हो तो बेटी की पढ़ाई पर अधिक खर्च न कर पाना मां-बाप की मजबूरी है।
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कहा कि छात्राओं को इंटर के बाद अन्य विषयों के लिए प्रेरित किया जाता है। कृषि से बीटेक कर रही छात्रा न्यासा का कहना है कि अभिभावक खर्च का दोहरा दबाव नहीं सहन कर पाते। पहले तो बेटी की महंगी पढ़ाई में खर्चा करें, इसके बाद शादी की भी चिंता रहती है, जिससे पढ़ाई ही प्रभावित हो जाती है। दूसरा लड़के-लड़कियों का अनुपात भी कम है। इस लिहाज से भी संख्या कम रहनी स्वाभाविक है। कंप्यूटर साइंस से बीटेक कर रही यशस्वी सिंह का कहना है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई और नौकरी दोनों घर से काफी दूर होती है। ऐसे में सुरक्षा के दृष्टिकोण से अभिभावक बेटियों को बाहर भेजना ज्यादा पसंद नहीं कर सकते। पढ़ाई तो हास्टल में हो जाएगी, परंतु अकेली लड़की को इंजीनियरिंग की नौकरी करने दूसरे प्रांतों में भेजने में उन्हें असहज महसूस होता है।
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छात्रा मानसी द्विवेदी का कहना रहा कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद अधिकतर नौकरियां निजी सेक्टर में आती हैं। अभिभावक प्राइवेट की अपेक्षा सरकारी सेवाओं में बालिकाओं को भेजना ज्यादा पसंद करते हैं। इंजीनियरिंग में छात्राओं की कमी का एक कारण यह भी है। इंजीनियरिंग छात्रा दुर्गेश, प्रिया, तान्या, निशा और प्राची ने कहा कि सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा का भी है। असुरक्षा के भाव से अभिभावक बालिकाओं को घर से बहुत ज्यादा दूर पढ़ने नहीं भेजना चाहते हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई की सुविधा हर जिले में होनी चाहिए। इससे यह समस्या काफी हद तक सुलझ जाएगी।
बीएचयू की छात्रा अंशुल सहाय ने कहा कि पांच मार्च 2019 से स्कूल-कालेज बंद हैं। लोगों में जागरुकता नहीं है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई की बात तो छोड़िए बालिकाओं को प्राइमरी एजुकेशन में भी कठिनाई है। जब तक लड़कियां अपने को एक उदाहरण के रूप में सामने लाएं, तभी जागरुकता बढ़ेगी। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के प्रति छात्राओं को प्रेरित करने के लिए सरकारी और सामाजिक स्तर पर बढ़ावा देने की जरूरत भी है। मसलन सरकार को स्कालरशिप जैसी योजनाएं और बालिकाओं की फीस आदि के बारे में विशेष रियायत देनी चाहिए।