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पड़ोस में फैली बीमारी, जिले में नहीं तैयारी
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
Updated Mon, 17 Aug 2015 11:52 PM IST
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पड़ोसी जनपद कानपुर देहात में विचित्र बुखार से छह
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लोगों की मौत और करीब एक हजार लोगों के बीमार होने के बाद भी जिले के
स्वास्थ्य विभाग की नींद नहीं टूटी है। बारिश के लगभग दो माह बीत जाने के
बाद भी विभाग ने संक्रामक रोगों से निपटने की तैयारी नहीं की है।
ऐसे में पड़ोस की बीमारी अगर यहां फैलती है तो स्थिति भयावह हो सकती है। विचित्र बुखार की खबर भर से ही जिले की पब्लिक दहशत में है। यही कारण है कि सोमवार को जरा ही हरारत होने पर लोग अस्पताल की ओर दौड़ पड़े। अस्पताल में सोमवार को मरीजों का आंकड़ा 18 सौ के पास पहुंच गया।
वैसे भी बारिश के मौसम में डेंगू का खतरा बढ़ जाता है। पिछले वर्षों में जिले में डेंगू के केस सामने आए थे, लेकिन अभी तक डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी से भी निपटने के स्वास्थ्य विभाग ने इंतजाम नहीं किए हैं।
कानपुर देहात के घाटमपुर क्षेत्र के गांव बौहार में विचित्र बुखार की चपेट में आने से छह लोगों की मौत एवं करीब एक हजार लोगों के बीमार होने की घटना को स्वास्थ्य विभाग ने गंभीरता से नहीं लिया है। स्थिति यह है कि जिले में अभी तक संक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए ठोस रणनीति नहीं बनी है।
अगर यहां बीमारी फैलती है तो कंट्रोल करना बहुत मुश्किल होगा। स्थिति यह है कि जिले में अभी तक संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए न तो कंट्रोल रूम बना है और न ही टीमों का गठन किया है।
जिला स्तर पर अभी तक सिर्फ एक टीम ही बनी है, जबकि पिछले वर्षों में चार चार टीमों का गठन होता रहा है। संक्रामक रोगियों के इलाज के लिए जिला अस्पताल में भी अलग से कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। मरीजों के लिए स्पेशल वार्ड भी नहीं बनाए गए हैं। ऐसे में संक्रामक बीमारियों की रोकथाम कैसे होगी, इस पर संशय है।
बारिश के मौसम में मलेरिया के साथ ही डेंगू का खतरा रहता है। पिछले वर्षों में जिले में कई केस डेंगू के पाए गए थे। बावजूद इसके जिले में अभी तक डेंगू की जांच के इंतजाम नहीं है।
स्थिति यह है कि डेंगू की जांच में इस्तेमाल होने वाली न तो किट है और न ही जिला अस्पताल में ब्लड सेपरेटर की व्यवस्था है। स्वास्थ्य विभाग के अफसर सिर्फ इस बात पर निश्चित हैं कि सैफई रिम्स में मरीजों को डेंगू का इलाज और जांच की सुविधा मिल ही जाएगी।
बारिश के मौसम में अधिकांश बीमारियां कीट पतंगों और मच्छरों से ही फैलती हैं। मच्छरों पर अंकुश लगाने का जिम्मा मलेरिया विभाग पर है, लेकिन जिले में मलेरिया विभाग की हालत दयनीय है।
मलेरिया उन्मूलन के लिए बने विभाग के पास साल भर से फॉगिंग करने वाली दवा मैलाथियोन तक नहीं है। स्टॉफ की कमी के कारण विभागीय कर्मचारियों की फील्ड में गतिविधियां भी शून्य हैं। नगर पालिका और नगर पंचायतों के साथ ग्राम पंचायतें भी कीटनाशक के छिड़काव और फॉगिंग में दिलचस्पी नहीं ले रही हैं।
जिले में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज और जांच के माकूल इंतजाम नहीं है। जिला अस्पताल भी डाक्टरों की कमी का दंश झेल रहा है।
स्थित है कि जिला अस्पताल में फिजीशियन, कार्डियोलॉजिस्ट, बालरोग विशेषज्ञ सहित कई विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद वर्षों से खाली हैं। ऐसे में संक्रामक बीमारी फैलने की स्थिति में यहां बेहतर इलाज संभव नहीं है।
ऐसे में पड़ोस की बीमारी अगर यहां फैलती है तो स्थिति भयावह हो सकती है। विचित्र बुखार की खबर भर से ही जिले की पब्लिक दहशत में है। यही कारण है कि सोमवार को जरा ही हरारत होने पर लोग अस्पताल की ओर दौड़ पड़े। अस्पताल में सोमवार को मरीजों का आंकड़ा 18 सौ के पास पहुंच गया।
वैसे भी बारिश के मौसम में डेंगू का खतरा बढ़ जाता है। पिछले वर्षों में जिले में डेंगू के केस सामने आए थे, लेकिन अभी तक डेंगू जैसी जानलेवा बीमारी से भी निपटने के स्वास्थ्य विभाग ने इंतजाम नहीं किए हैं।
कानपुर देहात के घाटमपुर क्षेत्र के गांव बौहार में विचित्र बुखार की चपेट में आने से छह लोगों की मौत एवं करीब एक हजार लोगों के बीमार होने की घटना को स्वास्थ्य विभाग ने गंभीरता से नहीं लिया है। स्थिति यह है कि जिले में अभी तक संक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए ठोस रणनीति नहीं बनी है।
अगर यहां बीमारी फैलती है तो कंट्रोल करना बहुत मुश्किल होगा। स्थिति यह है कि जिले में अभी तक संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए न तो कंट्रोल रूम बना है और न ही टीमों का गठन किया है।
जिला स्तर पर अभी तक सिर्फ एक टीम ही बनी है, जबकि पिछले वर्षों में चार चार टीमों का गठन होता रहा है। संक्रामक रोगियों के इलाज के लिए जिला अस्पताल में भी अलग से कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। मरीजों के लिए स्पेशल वार्ड भी नहीं बनाए गए हैं। ऐसे में संक्रामक बीमारियों की रोकथाम कैसे होगी, इस पर संशय है।
बारिश के मौसम में मलेरिया के साथ ही डेंगू का खतरा रहता है। पिछले वर्षों में जिले में कई केस डेंगू के पाए गए थे। बावजूद इसके जिले में अभी तक डेंगू की जांच के इंतजाम नहीं है।
स्थिति यह है कि डेंगू की जांच में इस्तेमाल होने वाली न तो किट है और न ही जिला अस्पताल में ब्लड सेपरेटर की व्यवस्था है। स्वास्थ्य विभाग के अफसर सिर्फ इस बात पर निश्चित हैं कि सैफई रिम्स में मरीजों को डेंगू का इलाज और जांच की सुविधा मिल ही जाएगी।
बारिश के मौसम में अधिकांश बीमारियां कीट पतंगों और मच्छरों से ही फैलती हैं। मच्छरों पर अंकुश लगाने का जिम्मा मलेरिया विभाग पर है, लेकिन जिले में मलेरिया विभाग की हालत दयनीय है।
मलेरिया उन्मूलन के लिए बने विभाग के पास साल भर से फॉगिंग करने वाली दवा मैलाथियोन तक नहीं है। स्टॉफ की कमी के कारण विभागीय कर्मचारियों की फील्ड में गतिविधियां भी शून्य हैं। नगर पालिका और नगर पंचायतों के साथ ग्राम पंचायतें भी कीटनाशक के छिड़काव और फॉगिंग में दिलचस्पी नहीं ले रही हैं।
जिले में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज और जांच के माकूल इंतजाम नहीं है। जिला अस्पताल भी डाक्टरों की कमी का दंश झेल रहा है।
स्थित है कि जिला अस्पताल में फिजीशियन, कार्डियोलॉजिस्ट, बालरोग विशेषज्ञ सहित कई विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद वर्षों से खाली हैं। ऐसे में संक्रामक बीमारी फैलने की स्थिति में यहां बेहतर इलाज संभव नहीं है।