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बढ़ता जा रहा फसलों का दायरा, सिंचाई के लिए पानी हो रहा कम
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इटावा में नहरों में पानी की उपलब्धता हो रही है कम
- फोटो : ETAWHA
इटावा। जिले में फसली क्षेत्रफल का बढ़ता दायरा और उसकी अपेक्षा सिकुड़ती नहरें आने वाले समय में किसानों के सामने बड़ा संकट खड़ा कर सकती हैं। नरौरा से ही 36 फीसदी पानी कम आ रहा है। ऐसे में नहरों में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं है। यह स्थिति कमोवेश साल भर रहती है। दरअसल, नरौरा बांध के पानी से इटावा डिवीजन, भोगनीपुर डिवीजन और कानपुर ब्रांच तीन नहरों में पानी जाता है। जिले में इटावा प्रखंड निचली गंगा नहर और भोगनीपुर प्रखंड निचली गंगा नहर से ही पूरी सिंचाई होती है।
बढ़पुरा और चकरनगर दो ब्लाकों में सिंचाई के लिए नहर सुविधा नहीं है। बाकी छह ब्लाकों बसरेहर, भरथना, ताखा, महेवा, सैफई, जसवंतनगर में नहरों और माइनरों का जाल फैला हुआ है। इन ब्लाकों की अधिकांश भूमि इसी सिंचाई पर निर्भर है। इन दोनों नहरों को नरौरा से रोजाना 8500 क्यूसेक पानी मिलना चाहिए परंतु वहां से केवल 5000 क्यूसेक पानी ही छोड़ा जा रहा है। इटावा में आते आते पानी की मात्रा 1699 क्यूसेक रह जाती है। अर्थात नहरों में क्षमता का केवल 33 फीसदी क्यूसेक पानी ही चल रहा है। ऐसी स्थिति में टेल तक पानी पहुंचता नहीं है। किसान पूरे समय नहरों में पानी छोड़ने की मांग करते हैं। पानी कब छोड़ा गया कब बंद हो गया किसानों को पता ही नहीं चल पाता।
सिंचित क्षेत्रफल बढ़ा, संसाधन वही
जिले का सिंचाई सिस्टम एक शतक से भी पुराना है। नहर सिंचाई प्रणाली अंग्रेजी शासन में शुरू हुई थी। तब सिंचित रकबे का क्षेत्रफल काफी सीमित था। समय के साथ खेती का क्षेत्रफल बढ़ा। सरकार ने भी ऊसर सुधार और भूमि सुधार जैसी योजनाएं संचालित की। जिसका असर यह हुआ कि खेती योग्य क्षेत्रफल में काफी वृद्धि हुई। परंतु उनके मुकाबले नहरों की क्षमता वृद्धि आदि के बारे में नहीं सोचा गया। रबी और खरीफ की परंपरागत फसलें करने के अलावा किसान दूसरी फसलों को भी कर रहा है।
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अब किसान को हर समय नहर और बंबा में पानी चाहिए। सिंचाई विभाग के अनुसार ऐसा कर पाना संभव नहीं है। नहरों को रोस्टर के हिसाब से ही चलाया जा सकता है। नरौरा से कानपुर ब्रांच, भोगनीपुर डिवीजन और इटावा डिवीजन तीन नहरों को संचालित किया जाता है। इसमें जब इटावा डिवीजन का पानी रोककर कानपुर ब्रांच को चलाया जाता है। इसके बाद कानपुर को रोक कर इटावा ब्रांच को चलाया जाता है। तब भी नहर पूरी क्षमता से नहीं चल पा रही है।
आधे रकबे की सिंचाई कर सकती हैं नहरें
इटावा। जिले में औसतन दो फसली चक्र में 1 लाख 80 हजार हेक्टेयर में रबी और लगभग इतनी ही में खरीफ के साथ साथ अन्य प्रकार की फसलें उगाईं जातीं हैं। नहरें यदि पूरी क्षमता से चलायी जाएं तो वे लगभग 90 हजार हैक्टेयर भूमि को सिंचित कर सकती हैं। बाकी खेती के लिए किसानों को वैकल्पिक संसाधनों के रूप में सरकारी अथवा निजी नलकूप, पंपसेट आदि का सहारा लेना पड़ता है। पहले फसल दो चक्रीय हुआ करता था। अब साल भर खेतों में कोई न कोई पैदाबार होती रहती है। इस लिहाज से पानी की जरूरत दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है।
किसानों का सहयोग जरूरी
इटावा। सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता धर्मेंद्र कुमार तिवारी का कहना है कि नहरों की क्षमता सीमित है। किसान इस प्रकार के फसल चक्र को अपनाएं जिसमें पानी के अधिक उपयोग न हो। साल में निर्धारित समय और रोस्टर के हिसाब से पानी आ सकता है। किसान नहरों के पानी को बर्बाद न होने दें। अवैध कुलावे रखने अथवा खांदी काटने से दूसरे किसानों का ही नुकसान होता है। ऐसा न होने दें। पानी की बढ़ती हुई डिमांड के बारे में शासन एवं विभाग के उच्चाधिकारियों को समय-समय पर अवगत कराया जाता है।
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बढ़पुरा और चकरनगर दो ब्लाकों में सिंचाई के लिए नहर सुविधा नहीं है। बाकी छह ब्लाकों बसरेहर, भरथना, ताखा, महेवा, सैफई, जसवंतनगर में नहरों और माइनरों का जाल फैला हुआ है। इन ब्लाकों की अधिकांश भूमि इसी सिंचाई पर निर्भर है। इन दोनों नहरों को नरौरा से रोजाना 8500 क्यूसेक पानी मिलना चाहिए परंतु वहां से केवल 5000 क्यूसेक पानी ही छोड़ा जा रहा है। इटावा में आते आते पानी की मात्रा 1699 क्यूसेक रह जाती है। अर्थात नहरों में क्षमता का केवल 33 फीसदी क्यूसेक पानी ही चल रहा है। ऐसी स्थिति में टेल तक पानी पहुंचता नहीं है। किसान पूरे समय नहरों में पानी छोड़ने की मांग करते हैं। पानी कब छोड़ा गया कब बंद हो गया किसानों को पता ही नहीं चल पाता।
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सिंचित क्षेत्रफल बढ़ा, संसाधन वही
जिले का सिंचाई सिस्टम एक शतक से भी पुराना है। नहर सिंचाई प्रणाली अंग्रेजी शासन में शुरू हुई थी। तब सिंचित रकबे का क्षेत्रफल काफी सीमित था। समय के साथ खेती का क्षेत्रफल बढ़ा। सरकार ने भी ऊसर सुधार और भूमि सुधार जैसी योजनाएं संचालित की। जिसका असर यह हुआ कि खेती योग्य क्षेत्रफल में काफी वृद्धि हुई। परंतु उनके मुकाबले नहरों की क्षमता वृद्धि आदि के बारे में नहीं सोचा गया। रबी और खरीफ की परंपरागत फसलें करने के अलावा किसान दूसरी फसलों को भी कर रहा है।
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अब किसान को हर समय नहर और बंबा में पानी चाहिए। सिंचाई विभाग के अनुसार ऐसा कर पाना संभव नहीं है। नहरों को रोस्टर के हिसाब से ही चलाया जा सकता है। नरौरा से कानपुर ब्रांच, भोगनीपुर डिवीजन और इटावा डिवीजन तीन नहरों को संचालित किया जाता है। इसमें जब इटावा डिवीजन का पानी रोककर कानपुर ब्रांच को चलाया जाता है। इसके बाद कानपुर को रोक कर इटावा ब्रांच को चलाया जाता है। तब भी नहर पूरी क्षमता से नहीं चल पा रही है।
आधे रकबे की सिंचाई कर सकती हैं नहरें
इटावा। जिले में औसतन दो फसली चक्र में 1 लाख 80 हजार हेक्टेयर में रबी और लगभग इतनी ही में खरीफ के साथ साथ अन्य प्रकार की फसलें उगाईं जातीं हैं। नहरें यदि पूरी क्षमता से चलायी जाएं तो वे लगभग 90 हजार हैक्टेयर भूमि को सिंचित कर सकती हैं। बाकी खेती के लिए किसानों को वैकल्पिक संसाधनों के रूप में सरकारी अथवा निजी नलकूप, पंपसेट आदि का सहारा लेना पड़ता है। पहले फसल दो चक्रीय हुआ करता था। अब साल भर खेतों में कोई न कोई पैदाबार होती रहती है। इस लिहाज से पानी की जरूरत दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है।
किसानों का सहयोग जरूरी
इटावा। सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता धर्मेंद्र कुमार तिवारी का कहना है कि नहरों की क्षमता सीमित है। किसान इस प्रकार के फसल चक्र को अपनाएं जिसमें पानी के अधिक उपयोग न हो। साल में निर्धारित समय और रोस्टर के हिसाब से पानी आ सकता है। किसान नहरों के पानी को बर्बाद न होने दें। अवैध कुलावे रखने अथवा खांदी काटने से दूसरे किसानों का ही नुकसान होता है। ऐसा न होने दें। पानी की बढ़ती हुई डिमांड के बारे में शासन एवं विभाग के उच्चाधिकारियों को समय-समय पर अवगत कराया जाता है।