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फार्मासिस्ट कर रहे बच्चों का इलाज
ब्यूरो/अमर उजाला, इटावा
Updated Thu, 07 May 2015 11:08 PM IST
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नाम बच्चा अस्पताल और यहां पर डाक्टर कोई नहीं, बच्चों का इलाज फार्मासिस्ट करता है। बच्चों को इलाज के लिए लाने वाले ज्यादातर मरीजों को तो यह पता तक नहीं है।
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जिसे अस्पताल की जमीनी हकीकत पता है वह तंगी के वजह से विशेषज्ञ डाक्टर की जगह फार्मासिस्ट से ही इलाज कराने को मजबूर हैं। हाल ही में बच्चा अस्पताल की जर्जर छत को तुड़वाकर लाखों रुपये से नई छत बनवा दी, लेकिन किसी ने भी यहां डाक्टरों की तैनाती कराने का ख्याल नहीं रखा।
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सच्चाई यही है कि यदि कोई फार्मासिस्ट अपना निजी क्लीनिक खोल कर बैठ जाए तो वह स्वास्थ्य विभाग के अफसरों को खटकने लगेगा। उसे नोटिस भेजकर बताया जाएगा कि मरीजों का इलाज करने का अधिकार उसे नहीं है।
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तस्वीर का दूसरा पहलू बच्चा अस्पताल में दिखता है। यहां खुलेआम बच्चों का इलाज फार्मासिस्ट के जिम्मे है। अफसरों को भी यह पता है लेकिन वे अपनी मजबूरी गिनाते हैं। अफसरों की यह लापरवाही कभी किसी बच्चे के लिए घातक साबित हो सकती है।
बच्चा अस्पताल में अपने दो वर्षीय मासूम बेटे के साथ एक महिला नंबर के इंतजार में खड़ी थी। उसे पूछा गया कि यहां डाक्टर नहीं है और कमरे में जो व्यक्ति बच्चों को इलाज मुहैया करा रहे हैं वह फार्मासिस्ट विनोद कटियार हैं। महिला बोली मालूम है, लेकिन तंगी से समझौता कर रही हूं। बेटे को बुखार है, जिला अस्पताल में भी डाक्टर नहीं है। प्राइवेट में सौ से दो सौ रुपये फीस है।
इस व्यवस्था पर सीएमएस डा. पीसी पांडेय फरमाते हैं बालरोग और फिजीशियन की तैनाती के लिए चार बार शासन को पत्र लिख चुके हैं। अभी भी प्रयास जारी है। बच्चा अस्पताल में बालरोग विशेषज्ञ की तैनाती नहीं है। मजबूरी में सामान्य बीमारियों की दवा बच्चों को फार्मासिस्ट की ओर से दी जा रही है।
बच्चों के लिए नहीं बनवा सके अस्पताल
वर्ष 1971 में नुमाइश के पास बच्चा अस्पताल का उद्घाटन हुआ। तीन दशक तक तो यह अस्पताल काफी अच्छी तरह से चला। डाक्टरों की तैनाती रही और बीमार बच्चों को भर्ती आदि की भी व्यवस्था रही।
वर्ष 2000 से बच्चा अस्पताल को बदहाली का ग्रहण लग गया। आज न तो यहां डाक्टर हैं और न ही बच्चों को भर्ती करने की कोई व्यवस्था है।
अस्पताल की दशा सुधरे इसके लिए न तो सरकार ने ध्यान दिया और न ही विपक्षी दलों ने। जरा-जरा से बात पर धरना-प्रदर्शन और सरकार को ज्ञापन भेजने वाले जनप्रतिनिधियों और विपक्षी दलों के नेताओं ने भी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को कभी भी मुद्दा नहीं बनाया।
डाक्टर नहीं, नर्सें कराती हैं डिलीवरी
भरथना (इटावा)। एक तरफ शासन संस्थागत प्रसव कराने का प्रयास कर रहा है वहीं दूसरी तरफ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में महिला डाक्टरों के पद खाली पड़े होने से संस्थागत प्रसव को झटका लग रहा है।
भरथना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर डाक्टर न होने के कारण नर्सों को डिलीवरी करनी पड़ रही है। जरा सी भी सीजर की स्थिति बनती है तो प्रसूता को इटावा या पीजीआई रेफर कर दिया जाता है। डाक्टरों के साथ पैरामेडिकल स्टाफ के पद रिक्त होने से भरथनावासियों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं दूर की कौड़ी साबित हो रही है।
कई बार डाक्टरों के पद भरे जाने की कवायद हो चुकी है लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है। गौरतलब है कि सीएचसी भरथना में प्रसूत एवं महिला रोग विशेषज्ञ समेत डाक्टरों के छह पद स्वीकृत हैं। वर्तमान में संविदा आयुष चिकित्सक को मिलाकर तीन पद भरे हुए हैं। महिला डाक्टर का पद तो पिछले दो सालों से खाली है।
विभाग ने 29 जनवरी 2013 को महिला डाक्टर के रूप में डा. साधना शर्मा की नियुक्ति की थी। 22 फरवरी 2013 को उन्होंने सीएचसी आकर ज्वाइन भी कर लिया था। इसके बाद से उनका कोई अता-पता नहीं है।
सीएमओ स्तर पर उनके पते पर कई बार नोटिस भी भेजा गया, लेकिन उसे रिसीव नहीं किया गया। डिलीवरी कराने का पूरा जिम्मा नर्सों पर हैं। इनके भी चार पद स्वीकृत है लेकिन भरे केवल दो हैं।
सीएचसी में नार्मल डिलीवरी तो नर्सें करा दी जाती है लेकिन जैसे की किसी महिला की हालत बिगड़ती है या फिर नर्स अवकाश पर होती है तो रेफर का फरमान सुना दिया जाता है। सीएचसी भरथना पर प्रतिमाह करीब दो सैकड़ा डिलीवरी होती हैं। हालत बिगड़ने देख कई को जिला अस्पताल या सैफई रेफर कर दिया जाता है।
क्षेत्र की तीन पीएचसी डाक्टर न होने के कारण भगवान भरोसे हैं। पाली खुर्द में पदस्थ डाक्टर दो साल के प्रशिक्षण पर है। हथनोई पीएचसी फार्मेसिस्ट के हवाले कर दी गई है। बहारपुरा में जुगाड़ से काम चल रहा है।
इस पर सीएचसी प्रभारी डा. सतेंद्र यादव कहते हैं, सीएचसी में डाक्टरों के छह पदों में से तीन भरे हैं। महिला डाक्टर का पद करीब दो साल से रिक्त है। ऐसे में नार्मल डिलीवरी नर्सों को करवाना पड़ता है। पद भरने के प्रयास किए जाते रहे हैं।
नए सीएमओ ने ग्रहण किया पदभार
इटावा। इटावा के नए सीएमओ के रूप में डा. आर के नैय्यर ने गुरुवार को देर शाम पदभार ग्रहण कर लिया। इससे पहले वे लखनऊ में संयुक्त निदेशक के पद पर थे। दो दिन पहले ही उन्हें इटावा का सीएमओ बनाए जाने के आदेश हुए थे।
पदभार ग्रहण करते समय निवृत्तमान सीएमओ डा. राजेश यादव भी मौजूद थे। इसके बाद उन्होंने दफ्तर के अधिकारियों तथा कर्मचारियों से परिचय प्राप्त किया।
इसके बाद उन्होंने पत्रकारों से मुलाकात की। इस दौरान चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं को ग्रामीण क्षेत्र तक ले जाना उनका मुख्य उद्देश्य है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर भी पूरा ध्यान दिया जाएगा। डाक्टरों की कमी को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि शासन से खाली पड़े पद भरने की मांग की जाएगी।
यद्धपि डाक्टरों की कमी प्रदेश स्तरीय समस्या है लेकिन इसके बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं को आम आदमी तक पहुंचाने के हर संभव प्रयास किए जाएंगे। डा. नैय्यर ने कहा कि काम में लापरवाही किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। एक डाक्टर का फर्ज अपने मरीजों पर पूरा ध्यान देने का है। डाक्टरों को इस पर ध्यान देना चाहिए।