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दावा तो शुद्धता का है, गारंटी कोई नहीं
अमर उजाला ब्यूरो, एटा
Updated Tue, 17 May 2016 11:18 PM IST
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आरओ प्लांट
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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गर्मी के बढ़ते ही शहर में ठंडे पानी की मांग बढ़ गई है। इसी के साथ पानी की सप्लाई का कारोबार भी चमक उठा है। केन और बोतल में सप्लाई किया जा रहा यह पानी कितना शुद्ध है, इसे कोई नहीं जानता। खाद्य सुरक्षा विभाग में सिर्फ आठ प्लांट पंजीकृत हैं, बाकी के 15 से अधिक वाटर प्लांट बिना पंजीकरण चल रहे हैं, जब पंजीकरण ही नहीं तो शुद्धता मानकों का कितना ध्यान रखा जा रहा है, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है।
बोरिंग के पानी को पैक करने से पूर्व उसे आरओ आरओ (रिवर्स ऑस्मोसिस) सिस्टम से फिल्टर किया जाना चाहिए। पानी को बैक्टीरिया से मुक्त करने के लिए यूपी (अल्ट्रा पायलेट ) रेस से ट्रीट करने के बाद ही पानी को उपयोग में लिया जा सकता है, लेकिन इसका प्रक्रिया का पालन प्लांटों में नहीं किया जाता। पानी के प्लांट में स्टेनलेस स्टील के जार ही इस्तेमाल होने चाहिए, लेकिन इनमें प्लास्टिक और लोहे के जार का उपयोग किया जा रहा है। लोहे के जार में जंग भी लगा होता है और पूरी तरह सफाई भी नहीं होती। जार में पानी भरने से पहले चिलर प्लांट में ठंडा करते हैं, बिजली नहीं होने पर बर्फ लगाकर उसे ठंडा किया जा रहा है, जो सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है। सबमर्सिबल पंप का पानी तक सीधे भरकर सप्लाई किया जा रहा है। कभी इनके पानी या प्लांट की जांच नहीं होती।खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन अधिकारी अपूर्व श्रवास्तव ने बताया किआरओ लगाने के लिए कोई मानक नहीं है। इस प्रकार के वॉटर प्लांट में पानी सील कर नहीं बेचा जाता। सील्ड पानी बेचने वाले प्लांट के लिए बीआईएस मार्का का आरओ होेना जरूरी है। ऐसे वॉटर प्लांट लगाने की अनुमति सिर्फ नगर पालिका की एनओसी पर ही देने का प्रावधान है।
रेट भी अलग-अलग
खाद्य सुरक्षा विभाग में सिर्फ आठ सप्लायर पंजीकृत हैं। अन्य प्लांट पंजीकृत नहीं हैं। जिनका पंजीकरण नहीं वे10 से 15 रुपये तो पंजीकृत प्लांट 15 से 25 रुपये तक प्रति बीस लीटर की बोतल बाजार में बेच रहे हैं।
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ऐसे होती है जांच
पेयजल की बायोलॉजिकल और केमिकल जांच कराई जाती है। बायोलाजिकल जांच में पानी के बैक्टीरिया चेक किए जाते हैं, जबकि केमिकल जांच में पानी के अंदर पाए जाने वाले पीएच, मटमैलापन, कठोरता, क्षारीयता, क्लोराइड, आयरन, फ्लोराइड, नाइट्रेट आदि की जांच की जाती है और पानी में इसकी कितनी मात्रा होनी चाहिए इसको देखा जाता है। रिपोर्ट में जांच किया गया पानी पीने योग्य है या नहीं सिर्फ इतना लिखा जाता है।
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शहर में आठ कारोबारी पंजीकृत हैं, जबकि दो लोगों ने आवेदन किए हैं। पंजीकरण 100 और लाइसेंस फीस तीन हजार रुपये है। पंजीकृत नहीं होने के बाद भी पानी की सप्लाई कर रहे प्लांटों के मामले संज्ञान में आए हैं। लखनऊ से पानी की जांच कराने के आदेश भी मिले हैं। जल्द ही अभियान चलाकर इनके सैंपलों की जांच होगी।
- अपूर्व श्रीवास्तव, अभिहित अधिकारी, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग
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बोरिंग के पानी को पैक करने से पूर्व उसे आरओ आरओ (रिवर्स ऑस्मोसिस) सिस्टम से फिल्टर किया जाना चाहिए। पानी को बैक्टीरिया से मुक्त करने के लिए यूपी (अल्ट्रा पायलेट ) रेस से ट्रीट करने के बाद ही पानी को उपयोग में लिया जा सकता है, लेकिन इसका प्रक्रिया का पालन प्लांटों में नहीं किया जाता। पानी के प्लांट में स्टेनलेस स्टील के जार ही इस्तेमाल होने चाहिए, लेकिन इनमें प्लास्टिक और लोहे के जार का उपयोग किया जा रहा है। लोहे के जार में जंग भी लगा होता है और पूरी तरह सफाई भी नहीं होती। जार में पानी भरने से पहले चिलर प्लांट में ठंडा करते हैं, बिजली नहीं होने पर बर्फ लगाकर उसे ठंडा किया जा रहा है, जो सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है। सबमर्सिबल पंप का पानी तक सीधे भरकर सप्लाई किया जा रहा है। कभी इनके पानी या प्लांट की जांच नहीं होती।खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन अधिकारी अपूर्व श्रवास्तव ने बताया किआरओ लगाने के लिए कोई मानक नहीं है। इस प्रकार के वॉटर प्लांट में पानी सील कर नहीं बेचा जाता। सील्ड पानी बेचने वाले प्लांट के लिए बीआईएस मार्का का आरओ होेना जरूरी है। ऐसे वॉटर प्लांट लगाने की अनुमति सिर्फ नगर पालिका की एनओसी पर ही देने का प्रावधान है।
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रेट भी अलग-अलग
खाद्य सुरक्षा विभाग में सिर्फ आठ सप्लायर पंजीकृत हैं। अन्य प्लांट पंजीकृत नहीं हैं। जिनका पंजीकरण नहीं वे10 से 15 रुपये तो पंजीकृत प्लांट 15 से 25 रुपये तक प्रति बीस लीटर की बोतल बाजार में बेच रहे हैं।
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ऐसे होती है जांच
पेयजल की बायोलॉजिकल और केमिकल जांच कराई जाती है। बायोलाजिकल जांच में पानी के बैक्टीरिया चेक किए जाते हैं, जबकि केमिकल जांच में पानी के अंदर पाए जाने वाले पीएच, मटमैलापन, कठोरता, क्षारीयता, क्लोराइड, आयरन, फ्लोराइड, नाइट्रेट आदि की जांच की जाती है और पानी में इसकी कितनी मात्रा होनी चाहिए इसको देखा जाता है। रिपोर्ट में जांच किया गया पानी पीने योग्य है या नहीं सिर्फ इतना लिखा जाता है।
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शहर में आठ कारोबारी पंजीकृत हैं, जबकि दो लोगों ने आवेदन किए हैं। पंजीकरण 100 और लाइसेंस फीस तीन हजार रुपये है। पंजीकृत नहीं होने के बाद भी पानी की सप्लाई कर रहे प्लांटों के मामले संज्ञान में आए हैं। लखनऊ से पानी की जांच कराने के आदेश भी मिले हैं। जल्द ही अभियान चलाकर इनके सैंपलों की जांच होगी।
- अपूर्व श्रीवास्तव, अभिहित अधिकारी, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग