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यूपी में भी सिर उठा सकता है विभाजन का मुद्दा

Wed, 31 Jul 2013 08:46 AM IST
मनोज श्रीवास्तव
मनोज श्रीवास्तव Updated Wed, 31 Jul 2013 08:46 AM IST
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देश में एक और नए राज्य तेलंगाना पर यूपीए सरकार की सहमति के बाद उत्तर प्रदेश के विभाजन का मुद्दा सिर उठा सकता है। यह आशंका इसलिए भी है कि चुनाव के पहले सियासी पार्टियां वोटों के लिए इस मुद्दे को हवा देती रही हैं।

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राष्ट्रीय लोकदल नेता चौधरी अजित सिंह ने केंद्रीय कैबिनेट की मीटिंग के पहले यह कहकर कि वह बैठक में तेलंगाना के सवाल के साथ ही उत्तर प्रदेश के  विभाजन का मुद्दा भी उठाएंगे, मुद्दे को हवा देने की ही कोशिश की है।
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राज्य विभाजन का मुद्दा फिलहाल ठंडे बस्ते में है। न राज्य विभाजन के समर्थक न विरोधियों में इस मुद्दे को को लेकर कोई सुगबुगाहट है। अलबत्ता तेलंगाना के बहाने ठंडे बस्ते से निकलकर यह मुद्दा लोकसभा चुनाव के पहले फिर कुछ सुर्खियां बटोर सकता है।
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विधानसभा चुनाव के पहले भी इस मुद्दे ने कुछ दिन हलचल मचाई थी। पिछली बसपा सरकार ने नवंबर 2011 में प्रदेश को चार हिस्सों पूर्वांचल, बुंदेलखंड, मध्य और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बांटने संबंधी प्रस्ताव विधानसभा से पारित करवाकर केंद्र सरकार को भेजा था।

केंद्र ने इस मसले पर कई स्पष्टीकरण मांगते हुए संबंधित प्रस्ताव वापस राज्य सरकार को लौटा दिया था। पर बसपा ने संबंधित प्रस्ताव  केंद्र को भेजने के बाद अब तक इस दिशा में कोई सक्रियता नहीं दिखाई।

विधानसभा चुनाव में भी राज्य विभाजन को मुद्दा नहीं बनाया। किसी दल ने भी खुल कर बसपा सरकार के प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया था और कहा था कि यह बसपा का चुनावी शिगूफा है। सरकार विरोधी माहौल से जनता का ध्यान बंटाने के लिए नया मुद्दा उछाल दिया गया है।

विधानसभा चुनाव में राजा बुंदेला ने बुंदेलखंड और अमर सिंह ने पूर्वाचल में राज्य विभाजन को मुद्दा बनाया। पर जनता ने दोनों को ही बुरी तरह खारिज कर दिया। चुनाव में जनता के ठंडे रुख के बाद ये दोनों भी इस मुद्दे पर खामोश हो गए।

गौरतलब है कि बहुजन समाज पार्टी के अलावा चौधरी अजित सिंह के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय लोकदल और अमर सिंह का लोकमंच प्रदेश विभाजन का समर्थक है। वहीं समाजवादी पार्टी इस विभाजन की धुर विरोधी।

कांग्रेस और भाजपा ने दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग गठित करने की मांग कर मध्यमार्ग अपनाया था। कांग्रेस का कहना था कि वह छोटे राज्यों के गठन की विरोधी नहीं है, पर कोई भी फैसला सारे पहलुओं पर सोच समझकर किया जाना चाहिए।

समाजवादी तीखे तेवरों के साथ विरोध को भावनात्मक पुट देती रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता मोहन सिंह अक्सर कहा करते हैं हम दुनियां में कहीं भी जाते हैं तो कहते हैं राम और कृष्ण की जन्मभूमि से आए हैं। पर राज्य के विभाजन के बाद इस गौरवशाली साझी विरासत से वंचित हो जाएंगे।

राज्य विभाजन का सवाल प्रदेश में नया नहीं है। गाजीपुर से सांसद विश्वनाथ गहमरी ने पहली संसद में अलग पूर्वाचल का मुद्दा  उसकी गरीबी का जिक्र करते हुए इतनी संवेदनशीलता से उठाया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू तक भावुक हो गए थे।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह मुद्दा जब-तब सिर उठाता रहता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने के लिए 1953 में चौधरी चरण सिंह समेत 97 विधायकों ने राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष प्रतिवेदन दिया था।

1956 में आयोग के अध्यक्ष के एम पनिकर ने भी यूपी के विभाजन की संस्तुति की थी। 1996-97 में बनारस के समाजवादी नेता शतरुद्र व अंजना प्रकाश, बुंदेलखंड के शंकर लाल मेहरोत्रा व चौधरी अजित सिंह ने मिलकर उत्तर प्रदेश राज्य पुर्नगठन मोर्चा बनाया था। पर जनसमर्थन के अभाव में इस मोर्चे की भी कुछ ही दिनों में हवा निकल गई।

सपा के खिलाफ बन सकता है मुद्दा

सपा अकेली पार्टी है जो राज्य के विभाजन की विरोधी है. इसलिए खासतौर से मायावती और चौधरी अजित सिंह मुलायम के खिलाफ इस मुद्दे को हथियार बनाया जा सकता है।

दोनों के मुलायम के जैसे रिश्ते हैं, उनसे यही कयास लगाया जा रहा है कि मुद्दे को हथियार बनाने में दोनों कोर कसर नहीं छोड़ेगी। इस मुद्दे पर मुलायम के साथ कोई खड़ा नजर नहीं आएगा।

मायावती ज्यादा हमलावर दिख सकती है कि क्योंकि अपनी पिछली सरकार में उन्होंने न केवल राज्य विभाजन के पक्ष में प्रस्ताव पारित कराया था बल्कि अलग तेलंगाना राज्य का भी खुलकर समर्थन किया था।

हो जाएगा केंद्र में यूपी का दबदबा
आजादी के बाद से राजनीतिक गलियारों में जुमला उछाला जाता रहा है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है। पर अगर यूपी के विभाजन की संभावनाएं बढ़ती हैं तो निश्चित ही केंद्र में यूपी का दबदबा कम होगा।


दिल्ली में लखनऊ की ताकत का कारण प्रदेश में जाने वाले सांसदों की संख्या है। यूपी 80 सांसद लोकसभा भेजता है। दिल्ली, पंजाब व हरियाणा मिला कर इतने सांसद नहीं भेज पाते। इसी कारण संसद में यूपी की आवाज देश की आवाज बन जाती है।

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