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रुपहले पर्दे पर मोती बीए ने बिखेरी थी भोजपुरी गीतों की सोंधी महक

Mon, 01 Aug 2022 12:27 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 01 Aug 2022 12:27 AM IST
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moti ba jayanti
बरहज के नंदना पश्चिमी वार्ड निवासी स्व.मोती बीए का फाइल फोटो संवाद - फोटो : DEORIA
रुपहले पर्दे पर मोती बीए ने बिखेरी थी भोजपुरी गीतों की सोंधी महक
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1948 में दिलीप कुमार और कामिनी कौशल की फिल्म नदिया के पार में लिखे गीत
बरहज। नंदना पश्चिमी वार्ड निवासी और एसके इंटर कॉलेज में इतिहास के प्रवक्ता रहे स्व. मोती बीए फिल्म जगत में भोजपुरी गीतों को मुकाम देने वाले पहले शख्स थे। उनके लिखे गीतों को आज भी लोग गुनगुनाते हैं। एक अगस्त को पैतृक आवास पर उनकी जयंती धूमधाम से मनाई जाएगी।
बरेजी गांव निवासी स्व. राधाकृष्ण उपाध्याय और कौशल्या देवी के पुत्र स्व. मोती बीए ने 1942 में मुंबई के फिल्मिस्तान स्टूडियो और लाहौर के पंचौली आर्ट्स में फिल्मों के लिए गीत लिखना शुरू किया था। 1948 में रिलीज दिलीप कुमार और कामिनी कौशल अभिनीत फिल्म नदिया के पार में पहली बार गीत लिखकर उन्होंने भोजपुरी की सोंधी महक बिखेरी थी।
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फिल्म में उन्होंने कठवा के नइया बनइहे रे मलहवा और मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार... सहित 13 गीत लिखे थे। इसे संगीतकार रामचंद्र ने अपना सुर दिया था। 1951 में राजपूत फिल्म के लिए जोगीरा भी लिखा था। इसे मोहम्मद रफी, शमशाद बेगम ने आवाज दी थी जबकि सुरैया बेगम और जशराज ने अभिनय किया था।
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स्व. मोती बीए ने 1935 में रे सखी घूंघट का पट खोल, हर गुल में हैं शबनम के कतरे सहित दर्जनों कविताएं लिखी थीं। इन कविताओं ने काव्य जगत में मंचों पर खूब धूम मचाई थी। उनके लिखे असों आइल महुआबारी में बहार सजनी, तिसिया के रंग सरसइया के सारी, कहवां से अन्हरिया सुरुज दियाना बारेले हो, सनन सनन सन बहेले पुरवइया आदि गीत काफी लोकप्रिय हुए थे।
उन्होंने कैसे कहूं, सुभद्रा, सिंदूर, भक्त ध्रुव, साजन, काफिला, आशा, गजब भइले रामा सहित 80 से अधिक फिल्मों के लिए गीत लिखा था। जबकि सेमर के फूल, भोजपुरी सानेट, तुलसी रसायन, भोजपुर मुक्तक, मोती के मुक्तक, तिनका-तिनका आदि साहित्यिक रचनाएं भी लिखी थीं। संवाद

आजादी की लड़ाई में जाना पड़ा था जेल
बरहज। स्व. मोती बीए ने रुपहले पर्दे पर क्षेत्र का मान बढ़ाया है। वह 1942 की स्वाधीनता की लड़ाई में गोरखपुर जेल में नजरबंद किए गए थे। जबकि उन्हें एक बार बनारस जेल भी जाना पड़ा था। जहां साथियों के साथ वह दो माह जेल में व्यतीत किए थे। 1952 में वह एसके इंटर कॉलेज में इतिहास के प्रवक्ता पद पर नियुक्त किए गए। 1978 में राज्यपाल गणपत राय देवजी तप्प राय ने सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया था। उन्होंने अग्रगामी, आज और संसार दैनिक पत्र में सह संपादन का कार्य किया था।
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