{"_id":"6a2afffa3398b3d6b40ec4f3","slug":"left-home-to-fight-poverty-lost-life-along-the-way-deoria-news-c-208-1-deo1011-184316-2026-06-12","type":"story","status":"publish","title_hn":"Deoria News: गरीबी से लड़ने के लिए छोड़ा था घर, सफर में छिन गई जिंदगी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Deoria News: गरीबी से लड़ने के लिए छोड़ा था घर, सफर में छिन गई जिंदगी
Fri, 12 Jun 2026 12:05 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
Updated Fri, 12 Jun 2026 12:05 AM IST
विज्ञापन
सुरौली के शिवानंद की मौत के बादर रोते-बिलखते पिता माता और बहन।
पैकौली। अमेरिकी हमले में ओमान तट पर मारे गए शिवानंद चौरसिया ने परिवार की खुशियों के लिए अपने सपनों को संघर्ष की आग में तपा दिया था।
दो साल तक परिवार से दूर रहकर शिवानंद ने कभी आधा पेट खाकर तो कभी भूखे रहकर दिन गुजारे, मगर उसके हौसले कभी नहीं टूटे। उसका एक ही सपना था कि परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरे, बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ें, माता-पिता और पत्नी को परेशानी न हो।
परिजनों के अनुसार, पानी के जहाज पर नौकरी पाने के लिए काफी धन की आवश्यकता थी। गरीब परिवार से होने के कारण शिवानंद ने दो साल तक जी-तोड़ मेहनत कर एक-एक रुपये जोड़कर अपना सपना पूरा किया।
आखिरकार पांच दिसंबर 2025 को वह दिन आया, जब शिवानंद ने पहली बार समुद्री जहाज पर कदम रखा। उस दिन घर फोन कर मां कमलावती देवी और पत्नी सुशीला देवी से खुशी साझा की थी।
विज्ञापन
उसने कहा था, अब हमारी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी। बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाएंगे और परिवार को किसी चीज की कमी नहीं रहने देंगे।
बेटे की बात सुनकर माता-पिता और पत्नी की आंखों में भी सुनहरे भविष्य के सपने सज गए थे, मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 10 जून को अमेरिकी बम हमले जहाज पर तीन लोग घायल हो गए थे। इनमें शिवानंद की मौत हो गई।
घटना की सूचना जब परिजनों को मिली तो चीख-पुकार मच गई। पति की मौत की खबर सुन पत्नी सुशीला बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ीं।
मां कमलावती का रो-रोकर बुरा हाल है। पिता रामजी चौरसिया सदमे में हैं। परिवार के लोगों का कहना है कि उन्हें ऐसा लग रहा है कि उनके जीवन की खुशियां एक झटके में खत्म हो गई हों। गांव में भी शोक की लहर है। हर कोई शिवानंद के संघर्ष को याद कर भावुक है।
लोगों का कहना है कि जिसने परिवार की खुशियों के लिए कष्ट सहा, वह अपने सपनों को साकार होते देखने से पहले ही दुनिया छोड़ कर चला गया। शिवानंद की मौत ने न सिर्फ एक परिवार का सहारा छीन लिया, बल्कि कई अधूरे सपनों को भी हमेशा के लिए दफन कर दिया।
विज्ञापन
दो साल तक परिवार से दूर रहकर शिवानंद ने कभी आधा पेट खाकर तो कभी भूखे रहकर दिन गुजारे, मगर उसके हौसले कभी नहीं टूटे। उसका एक ही सपना था कि परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरे, बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ें, माता-पिता और पत्नी को परेशानी न हो।
परिजनों के अनुसार, पानी के जहाज पर नौकरी पाने के लिए काफी धन की आवश्यकता थी। गरीब परिवार से होने के कारण शिवानंद ने दो साल तक जी-तोड़ मेहनत कर एक-एक रुपये जोड़कर अपना सपना पूरा किया।
विज्ञापन
आखिरकार पांच दिसंबर 2025 को वह दिन आया, जब शिवानंद ने पहली बार समुद्री जहाज पर कदम रखा। उस दिन घर फोन कर मां कमलावती देवी और पत्नी सुशीला देवी से खुशी साझा की थी।
विज्ञापन
उसने कहा था, अब हमारी सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी। बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाएंगे और परिवार को किसी चीज की कमी नहीं रहने देंगे।
बेटे की बात सुनकर माता-पिता और पत्नी की आंखों में भी सुनहरे भविष्य के सपने सज गए थे, मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 10 जून को अमेरिकी बम हमले जहाज पर तीन लोग घायल हो गए थे। इनमें शिवानंद की मौत हो गई।
घटना की सूचना जब परिजनों को मिली तो चीख-पुकार मच गई। पति की मौत की खबर सुन पत्नी सुशीला बेसुध होकर जमीन पर गिर पड़ीं।
मां कमलावती का रो-रोकर बुरा हाल है। पिता रामजी चौरसिया सदमे में हैं। परिवार के लोगों का कहना है कि उन्हें ऐसा लग रहा है कि उनके जीवन की खुशियां एक झटके में खत्म हो गई हों। गांव में भी शोक की लहर है। हर कोई शिवानंद के संघर्ष को याद कर भावुक है।
लोगों का कहना है कि जिसने परिवार की खुशियों के लिए कष्ट सहा, वह अपने सपनों को साकार होते देखने से पहले ही दुनिया छोड़ कर चला गया। शिवानंद की मौत ने न सिर्फ एक परिवार का सहारा छीन लिया, बल्कि कई अधूरे सपनों को भी हमेशा के लिए दफन कर दिया।