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रिसाव से छलनी हुआ पांडेय माझा जोगिया बांध, सात किलोमीटर में 27 जगह हो रहा रिसाव
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रिसाव से छलनी हुआ पांडेय माझा जोगिया बांध, सात किलोमीटर में 27 जगह हो रहा रिसाव
रुद्रपुर। गोर्रा नदी का कोप झेल रहे पांडेयमाझा राजधर गांव के लोगों की दुश्वारियां कम होने का पाम नहीं ले रही हैं। दो बार नदी में विलीन होने के बाद तीसरी बार फिर गांव अपना अस्तित्व बनाने के लिए जूझ रहा है। यहां के लोगों की आंखों में खौफ साफ दिख रहा है।
पांडेय माझा जोगिया बांध के किनारे बसे गांव के लोगों के सिर पर मौत नाच रही है। गांव बचाने के लिए गोर्रा नदी के किनारे बसा सात किलोमीटर बांध पर 27 जगहों पर रिसाव हो रहा है। शाही और चूहे बांध को छलनी कर चुके हैं। इसे बचाने के लिए पूरा गांव दिन-रात बांध पर काम कर रहा है। करीब दो हजार की आबादी वाला पांडेयमाझा गांव दो बार बाढ़ की भेंट चढ़ चुका है। उजड़ना और बसना यहां के लोगों की नियति बन चुकी है। 40 साल से गांव का पीछा कर रही गोर्रा नदी एक बार फिर तांडव मचाने के लिए मचल रही है। गांव के इंद्रजीत सिंह ने कहा कि बाबू नदी पांखी नाही जाने दिहलस। 40 साल में दो बार गांव उजड़ चुका है। उजड़ने और बसने में गांव के लोगों की पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं। संगमधर दूबे ने कहा कि पायलट प्रोजेक्ट के इर्द-गिर्द हर जगह रिसाव से गांव का बचना मुश्किल हो गया है। सरकारी अमला पूरी तरह से हाथ उठा लिया है। गांव के लोगों के पौरुष से बांध बचा है। गांव के लोग रातभर जागकर श्रमदान कर रहे हैं। विभूती देवी ने कहा कि नदी का रुख देकर रूह कांप रहा है। हमने दो बार खौफनाक मंजर का सामना किया है। तीन मकान गवां चुके हैं। अब मकान कटा तो सिर छिपाने के लिए जगह नहीं बचेगी। कौशल्या देवी ने कहा कि दो बार उजड़ने के बाद कमर टूट चुकी है। नदी गांव का पीछा नहीं छोड़ रही है। गांव के सभी लोग नदी के कोप से कर्ज में डूबे हैं। अबकी बार गांव उजड़ा तो सब लोग सड़क पर आ जाएंगे।
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रुद्रपुर। गोर्रा नदी का कोप झेल रहे पांडेयमाझा राजधर गांव के लोगों की दुश्वारियां कम होने का पाम नहीं ले रही हैं। दो बार नदी में विलीन होने के बाद तीसरी बार फिर गांव अपना अस्तित्व बनाने के लिए जूझ रहा है। यहां के लोगों की आंखों में खौफ साफ दिख रहा है।
पांडेय माझा जोगिया बांध के किनारे बसे गांव के लोगों के सिर पर मौत नाच रही है। गांव बचाने के लिए गोर्रा नदी के किनारे बसा सात किलोमीटर बांध पर 27 जगहों पर रिसाव हो रहा है। शाही और चूहे बांध को छलनी कर चुके हैं। इसे बचाने के लिए पूरा गांव दिन-रात बांध पर काम कर रहा है। करीब दो हजार की आबादी वाला पांडेयमाझा गांव दो बार बाढ़ की भेंट चढ़ चुका है। उजड़ना और बसना यहां के लोगों की नियति बन चुकी है। 40 साल से गांव का पीछा कर रही गोर्रा नदी एक बार फिर तांडव मचाने के लिए मचल रही है। गांव के इंद्रजीत सिंह ने कहा कि बाबू नदी पांखी नाही जाने दिहलस। 40 साल में दो बार गांव उजड़ चुका है। उजड़ने और बसने में गांव के लोगों की पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं। संगमधर दूबे ने कहा कि पायलट प्रोजेक्ट के इर्द-गिर्द हर जगह रिसाव से गांव का बचना मुश्किल हो गया है। सरकारी अमला पूरी तरह से हाथ उठा लिया है। गांव के लोगों के पौरुष से बांध बचा है। गांव के लोग रातभर जागकर श्रमदान कर रहे हैं। विभूती देवी ने कहा कि नदी का रुख देकर रूह कांप रहा है। हमने दो बार खौफनाक मंजर का सामना किया है। तीन मकान गवां चुके हैं। अब मकान कटा तो सिर छिपाने के लिए जगह नहीं बचेगी। कौशल्या देवी ने कहा कि दो बार उजड़ने के बाद कमर टूट चुकी है। नदी गांव का पीछा नहीं छोड़ रही है। गांव के सभी लोग नदी के कोप से कर्ज में डूबे हैं। अबकी बार गांव उजड़ा तो सब लोग सड़क पर आ जाएंगे।
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