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UP: इन रणबांकुरों ने आजादी से पूर्व फहराया था झंडा, गोली लगने के बाद भी नहीं झुकने दिया था तिरंगा

Fri, 12 Aug 2022 10:34 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया।
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया। Published by: गोरखपुर ब्यूरो Updated Fri, 12 Aug 2022 10:34 AM IST
सार

2007 में शहीदों के सम्मान और दीपदान कार्यक्रम में विशेष परिशिष्ट प्रकाशित किया गया था। जबकि कार्यक्रम की शुरुआत किए जाने पर सम्मानित भी किया था। उनका कहना है कि शहीद स्थली पर शुरुआती दौर में दो-चार, आज सैकड़ों की संख्या में लोग दीपदान में हिस्सा लेते हुए श्रद्धांजलि देते हैं।

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Pt Vishwanath Mishra and Jagannath Malla hoisted flag before independence
आजादी का अमृत महोत्सव। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

स्वतंत्रता आंदोलन के दीवानों ने अंग्रेजों की गोली लगने के बाद भी तिरंगा झंडा झुकने नहीं दिया था। शहीद पंडित विश्वनाथ मिश्र और जगन्नाथ मल्ल ने 14 अगस्त 1942 को देश की आन-बान-शान तिरंगा झंडा को फहराकर बरहज को आजाद घोषित करते हुए अंग्रेजों का हौसला पस्त कर दिया था। रणबांकुरों की शहादत आज भी अविस्मरणीय है।

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सरयू नदी तट पर बसे कुरह परसियां गांव निवासी अमर शहीद पंडित विश्वनाथ मिश्र और बरौली गांव के जगन्नाथ मल्ल 25 वर्ष की अवस्था में ही अंग्रेज कैप्टन मूर की गोली लगने से शहीद हो गए थे। शहीद विश्वनाथ मिश्र के बड़े भाई के पुत्र श्यामबिहारी मिश्र का कहना है कि हजारों की संख्या में भीड़ की रहनुमाई करते हुए दोनों लोगों ने झंडा फहराकर बरहज क्षेत्र को आजाद घोषित कर दिया था।
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उनका कहना है कि पंडित रामधारी सिंह दिनकर की कविता कलम आज उनकी जय बोल से प्रभावित होकर पंडित विश्वनाथ मिश्र ने आजादी की आग में अपनी आहुति दी थी। स्व. लक्ष्मी मिश्र की तीन संतानों में तीसरे नंबर के पुत्र विश्वनाथ कक्षा आठवीं की पढ़ाई के बाद देश सेवा में जुट गए थे। लोगों का कहना है कि देश को आजादी की अनुभूति कराने वाले पंडित विश्वनाथ मिश्र के गांव को प्रशासन सरयू नदी की कटान से नहीं बचा पाया था। प्रशासन ने गांव के विस्थापित लोगों को जगह-जगह कुछ जमीन देकर इतिश्री कर ली।
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2006 में सगे भाइयों ने शहीद स्मारक पर शुरू किया था दीपदान कार्यक्रम

नंदना पश्चिमी वार्ड निवासी सगे भाई अनिल निषाद और सुधीर निषाद ने 2006 में पंडित विश्वनाथ मिश्र के परिजनों के साथ मिलकर शहीद स्मारक पर दीपदान कार्यक्रम की शुरुआत की थी। यह आज भी जारी है। समाजसेवी अनिल निषाद का कहना है कि कार्यक्रम को बढ़ावा देने में अमर उजाला परिवार का अनुकरणीय योगदान रहा है।

2007 में शहीदों के सम्मान और दीपदान कार्यक्रम में विशेष परिशिष्ट प्रकाशित किया गया था। जबकि कार्यक्रम की शुरुआत किए जाने पर सम्मानित भी किया था। उनका कहना है कि शहीद स्थली पर शुरुआती दौर में दो-चार, आज सैकड़ों की संख्या में लोग दीपदान में हिस्सा लेते हुए श्रद्धांजलि देते हैं।
 

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