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सैकड़ों एकड़ खेती की जमीन और घरों को घाघरा ने निगला
Deoria
Updated Mon, 30 Jun 2014 05:30 AM IST
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देवरिया/बरहज। बरहज ेके कपरवार के सामने घाघरा और राप्ती नदियों के संगमस्थल से परसिया कुरह गांव तक खेती की जमीनें जलधारा में विलीन हो रही हैं। आठ वर्षों में जहां परसिया कुरह गांव का नक्शा बदल गया है। वहीं नदी की धारा परसिया कुरह गांव के करीब पांच सौ परिवारों के घराें को अपने आगोश में ले चुकी है। नदी अपने मूल स्थान दक्षिण से एक किलोमीटर उत्तर तरफ रुखकर परसिया कुरह गांव के आधे भाग को समाप्त कर चुकी है। पिछले वर्ष कई परिवार बेघर हुए और सरकारी भवन उनकी शरणस्थली बने हैं। तबाही का मंजर अभी थमा नहीं है। एक सप्ताह से अड़ार टूटकर नदी में गिरने के तेज धमाके से नदी की धारा से चंद कदम दूर रहने वाले परिवार दहल जा रहे हैं। उनकी रातों की नींद गायब हो गई है।
वर्ष 2006 से घाघरा नदी की धारा अपने पुराने स्थान से खिसकने लगी। नदी की धारा परसिया कुरह गांव की तरफ कटान करने लगी। सैकड़ों एकड़ खेती की जमीनें समाप्त हो गई। वर्ष 2008 से लोगों के मकान नदी की धारा में विलीन होने लगे। यह सिलसिला शुरू हुआ तो आज भी थमा नहीं है। सरकार ने इमदाद के रूप में कुछ लोगों को मुआवजा और पट्टे की जमीन देकर बसाने का काम जरूर किया लेकिन इमदाद को लेकर भी कई वंचित लोगों में गुस्सा देखा गया। कई परिवार आज भी सरकारी भवनों में आसरा बनाए हुए हैं। बच्चों की पढ़ाई, बेटे और बिटिया की शादी की चिंता सता रही है। खेत नदी की धारा में बह गए तो दाने-दाने का मोहताज हो गए। नदी में मकानों के बहने के खतरे को देखते हुए कई परिवार अब आसरा तलाश रहे हैं। पर उन्हें अभी निराशा ही हाथ लग रही है। तहसील प्रशासन फिलहाल जगह उपलब्ध नहीं करा पा रहा है।
गांव के वंशराज सिंह कहते हैं कि नदी ने घर जमीन लेकर पांच सौ परिवारों की जिंदगी को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया। उनके पास भी 300 बीघा जमीन में महज 15 कट्ठा जमीन और घर की जमीन ही बची है। श्रवण विश्वकर्मा के परिवार को अक्टूबर 13 से प्राथमिक विद्यालय कपरवार नंबर एक और पूर्व माध्यमिक विद्यालय परसिया कुरह ऐट कपरवार में शरण मिली है। श्रवण की पत्नी कुंती देवी कहती है कि उनके बुजुर्गों ने एक कट्ठा जमीन खरीदकर मकान बनवाना था। पहले वह नदी की धारा में बह गया। उसके बाद दूसरा मकान भी अक्टूबर 13 में बह गया। उनके पास अब ठौर नहीं बचा। सात बच्चों में बेटे अमित, गोविंद, कन्हैया, धर्मेंद्र और बेटी प्रियंका, किरन और धर्मवीर की परवरिश के लिए श्रवण मेहनत मजदूरी में लगा रहा रहता है। इमदाद के रूप में 15 हजार रुपये मिले हैं। गांव के रविंद्र मिश्र का परिवार आंगनबाड़ी में शरण ली है। उनके भाई रघुवंश मणि मिश्र के परिवार को प्राथमिक विद्यालय कपरवार नंबर एक में शरण मिली है। रघुवंश मणि मिश्र कहते हैं कि आठ लाख रुपये खर्च कर 2005 में पक्का मकान बनवाया था। उसमें आठ साल ही रह पाए। सितंबर 13 में घाघरा ने आंखों के सामने उसे लील लिया। अब प्राइमरी स्कूल ही आसरा है। नदी के कटान से शंभूनाथ पांडेय के मकान का कुछ हिस्सा गायब हो गया है। नदी के कटान को देखते हुए कपरवार में झोपड़ी डालने के लिए पतहर के इंतजाम में लगे थे। महज चार बोझ का ही इंतजाम हो पाया। अपने दर्द को साझा करते हुए कहते हैं कि रहने के ठिकाने की बात को छोड़िए। अब तो लोग उनके गांव का नाम सुनकर रिश्ते जोड़ने से कतरा रहे हैं। बेटियों की शादी के रिश्ते तय नहीं हो पा रहे हैं। अपने नदी में समा चुके अपने मकान के आधे हिस्से को दिखाते हुए निशा कहती हैं कि एक सप्ताह से नदी ने कटान तेज कर दी है। अड़ार के गिरने की आवाज सुनकर रात में सभी परिवार के लोग चौंककर उठकर बैठ जाते हैं और नदी की तरफ जाकर देखते हैं कि कहीं उनका बचा-खुचा घर नदी में समा न जाए। परिवार के लोगों की रात में नींद गायब हो गई है।वजह साफ है कि नदी ने जिन लोगों का सबकुछ लील लिया और अब जिंदगी से जद्दोजहद जारी है।
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शासन में अटकी है परियोजना
बाढ़ खंड ने शासन को जो प्रोजेक्ट बनाकर भेजा है। उसमें कहा है कि घाघरा नदी और राप्ती नदी के संगमतट से एक किलोमीटर पूरब तरफ परसिया कुरह गांव स्थित है। इसके उत्तर बरहज की तरफ जाने वाला रामजानकी मार्र्ग स्थित है। जिसके आसपास हजारों कच्चे मकान और करीब 26 हजार की आबादी निवास करती है। दोनों नदियां बाएं तरफ अत्यधिक दवाब बनाते हुए प्रतिवर्ष करीब 50 मीटर की चौड़ाई में कटान करती चली आ रही हैं। जिसकी चपेट में परसिया कुरह गांव आया है। करीब 50 फीसदी आबादी नदी में विलीन हो चुकी है। वर्ष 2008 में तत्कालीन डीएम के निर्देश पर गांव के बाढ़ सुरक्षात्मक परियोजना बनाकर भेजा गया था। मुख्य अभियंता समिति ने विभागीय आपत्ति लगाकर परियोजना निरस्त कर दी। कहा कि एक गांव की सुरक्षा विभाग की नीति के अंतर्गत नहीं है। पुन: मुख्य अभियंता परिकल्प एवं नियोजन ने वर्ष 2013 में शासन के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि बड़े-बड़े शहरों को छोड़कर अन्य कटान रोकने का कार्य न करके यदि उन गांवों को किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर बसाया जाता है तो ज्यादा लाभप्रद होगा। हालांकि इसके बावजूद वर्ष 2013 में तत्कालीन डीएम मणि प्रसाद मिश्र के निर्देश पर बाढ़ खंड ने इस गांव को बचाने के लिए पूर्वांचल विकास निधि योजना के तहत 21.7826 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट बनाकर शासन को भेजा। इस प्रोजेक्ट में बाढ़ के पानी के दबाव की दिशा बदलने के लिए कई उपाय कि ए गए हैं। फिलहाल, इस प्रोजेक्ट के शासन से स्वीकृति का इंतजार है।
लंबित हैं ये परियोजनाएं
बरहज से मेहियवां तक डौला बांध के निर्माण एवं बाढ़ सुरक्षा कार्य के लिए 738.63 लाख की परियोजना। इसके बनने से नवापार, रगड़गंज, कोटवा, भड़सरा, मेहियवां आदि गांव जलमग्न होने से बच जाएंगे।
गौरा श्मशान घाट से मिश्र घाट के मध्य मलंग शाह मजार के पास घाघरा नदी के कटान से सुरक्षा के लिए 2012 में भेजी गई 88.16 लाख की परियोजना।
पैना में देई माता मंदिर के पास बोल्डर कटर के निर्माण के लिए 88.22 लाख की परियोजना।
नदी और बंधे के बीच बसे गांवों पर संकट।
गोर्रा के कहर से मिट रहा दो गांवों का अस्तित्व
रुद्रपुर। नदी और बंधे के बीच बसे गांवों के अस्तित्व पर संकट हर साल बढ़ता जा रहा है। इन गांवों को बचाने के लिए प्रशासन के पास कोई योजना नहीं है। रुद्रपुर में नदी और बंधे के बीच बसे दो गांवों को गोर्रा नदी हर साल छोटा करती चली जा रही है। इन गांवों के 200 परिवारों के उजड़ने का संकट बढ़ता चला जा रहा है।
गोर्रा नदी के किनारे बसा नरायनपुर की आबादी करीब दो हजार है। पूरे गांव के कटान की जद में आ जाने से मकान कटकर नदी में विलीन हो रहे हैं। एक दर्जन पक्के मकान कट कर नदी में गिर चुके हैं। हर साल मकानों के कट कर नदी में गिरने से पूरा गांव कटान की जद में आ गया है। यही हाल बहोरादलपतपुर गांव का है। यहां तो नदी आधे गांव को अपने आगोश में ले चुकी है। कटान से हर साल बर्बाद हो रहे मकानों और गांवों को बचाने में प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर लिए हैं। प्रशासन मकान कट कर बर्बाद होने पर गृह अनुदान के रूप में 1500 रुपये का चेक देकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ ले रहा है। बहोरादलपुर और नरायनपुर गांव को बचाने के लिए अब तक शासन स्तर पर भी कोई प्रयास नहीं हो पाया है। नरायनपुर के बेचू सिंह, मूरत सिंह, रामाज्ञा, राजकुमार, जयनारायण सिंह, चंद्रभान, शंकर, नन्हकू और बहोरादलपतपुर के रमेश मिश्र की तीन पक्के मकान कटकर नदी में विलीन हो चुके हैं। गांव के देवेंद्र शर्मा, सुधाकर गुप्ता, अश्विनी दुबे आदि ने कहा कि शासन और प्रशासन की मानवीय संवेदना मर चुकी है। दोनों गांव पांच साल से तेजी से कट कर नदी में जा रहे हैं। लेकिन गांव को बचाने की योजना नहीं बन पाई। हर साल मकान कट कर नदी में गिर रह हैं और प्रशासन 1500 का चेक थमा कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जा रहा है। इस बाबत एसडीएम भगवानदीन ने कहा कि सिंचाई विभाग को गांव बचाने के लिए कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश दिया जाएगा। जिलाधिकारी के माध्यम से शासन में बातचीत की जा रही है। नदी और बंधे के बीच बसे गांवों को बचाने के लिए प्रशासन कार्ययोजना बना रहा है।
गांव बचाने को कोई योजना नहीं
रुद्रपुर। नदी के कटान से मिट रहे गांवों को बचाने के लिए सिंचाई विभाग के बाढ़ कार्य खंड के पास कोई योजना नहीं है। उन्होंने गांव को बचाने में असमर्थ बता कर हाथ खड़े कर लिए हैं। वहीं प्रशासन की ओर से भी गांव को बचाने के लिए शासन में कोई कार्ययोजना नहीं भेजने से इन दोनों गांवों का मिटना तय माना जा रहा है।
कोट
सिंचाई विभाग बंधों को बचाने के लिए जिम्मेदार है। विभाग बंधो की सुरक्षा के परियोजनाओं पर काम करता है। बंधे और नदी के बीच बसे गांवों में हम कोई बचाव कार्य करने में असमर्थ है।
-बाढ़ कार्य खंड के अधिशासी अभियंता सुरेंद्र मोहन।
नासूर बनता जा रहा बाढ़ का दिया जख्म
रुद्रपुर। जिले का सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र रुद्रपुर में बाढ़ का जख्म साल दर साल बढ़ता जा रहा है। यहां बीते 30 वर्षों में नदियों ने रास्ता बदलकर कई गांवों का भूगोल बदल दिया। बाढ़ से बर्बाद गांवों के लोगों का जख्म प्रशासनिक मरहम के अभाव में नासूर बनता जा रहा है।
राप्ती नदी के कटान से माझानारायन और गायघाट के 500 परिवारों को तीन बार आशियाना गंवाना पड़ा। इन गांवों के लोगों की उजड़ने और बसने में जिंदगी तबाह हो रही है। वहीं गोर्रा नदी के कहर से सचौली गांव के लोग आज भी उबर नहीं पाए हैं। पांडेयमाझा राजधर और सचौली गांव को गोर्रा नदी राजस्व के मानचित्र से मिटा चुकी है। इन गांवों के लोगों के मकान और सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन को नदी ने लील लिया। 1998 की प्रलयकारी बाढ़ में पांडेयमाझा राजधर का नामोनिशां मिटने के बाद यहां के दो सौ परिवारों के पुनर्वास की सरकार ने कोई व्यवस्था नहीं की। अधिकांश लोगों को अगल-बगल के गांवों में जमीन खरीदकर नया आशियाना बनाना पड़ा। त्रासदी के शिकार 25 परिवारों को आज भी सड़क के किनारे फूस और छप्पर में गुजारा करना पड़ रहा है। सरकारी इमदाद के नाम पर उन्हे सिर्फ 500 रुपये मिले। 15 वर्षों से पांडेयमाझा राजधर गांव के रामवृक्ष, सिंहासन, नंदलाल, तारकेश्वर, सोहन साहनी, बिहारी, देवकी, श्रद्धा सहित 25 लोगों का परिवार पीडब्लूडी की सड़क के किनारे गुजारा कर रहा हैै। बाढ़ पीड़ितों को सड़क के किनारे ग्राम सभा की जमीन में यह कह कर बसाया गया था कि बाद में जमीन उन्हें पट्टा कर दी जाएगी। लेकिन आज तक उन्हें पट्टे के पक्के कागजात नहीं मिल पाए। रामवृक्ष, सिंहासन आदि ने बताया कि सभी लोग 15 साल से पट्टे के लिए तहसील का चक्कर काट रहे हैं।
क्या कहते हैं जिम्मेदार
एसडीएम भगवानदीन ने कहा कि बाढ़ से विस्थापित लोगों को आवासीय पट्टे का आवंटन हो जाना चाहिए। ऐसा क्यों नहीं हुआ इसकी जांच होगी। विस्थापित लोगों के पट्टे में आ रही अड़चन को दूर कराकर उन्हें पट्टे का आवंटन किया जाएगा।
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वर्ष 2006 से घाघरा नदी की धारा अपने पुराने स्थान से खिसकने लगी। नदी की धारा परसिया कुरह गांव की तरफ कटान करने लगी। सैकड़ों एकड़ खेती की जमीनें समाप्त हो गई। वर्ष 2008 से लोगों के मकान नदी की धारा में विलीन होने लगे। यह सिलसिला शुरू हुआ तो आज भी थमा नहीं है। सरकार ने इमदाद के रूप में कुछ लोगों को मुआवजा और पट्टे की जमीन देकर बसाने का काम जरूर किया लेकिन इमदाद को लेकर भी कई वंचित लोगों में गुस्सा देखा गया। कई परिवार आज भी सरकारी भवनों में आसरा बनाए हुए हैं। बच्चों की पढ़ाई, बेटे और बिटिया की शादी की चिंता सता रही है। खेत नदी की धारा में बह गए तो दाने-दाने का मोहताज हो गए। नदी में मकानों के बहने के खतरे को देखते हुए कई परिवार अब आसरा तलाश रहे हैं। पर उन्हें अभी निराशा ही हाथ लग रही है। तहसील प्रशासन फिलहाल जगह उपलब्ध नहीं करा पा रहा है।
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गांव के वंशराज सिंह कहते हैं कि नदी ने घर जमीन लेकर पांच सौ परिवारों की जिंदगी को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया। उनके पास भी 300 बीघा जमीन में महज 15 कट्ठा जमीन और घर की जमीन ही बची है। श्रवण विश्वकर्मा के परिवार को अक्टूबर 13 से प्राथमिक विद्यालय कपरवार नंबर एक और पूर्व माध्यमिक विद्यालय परसिया कुरह ऐट कपरवार में शरण मिली है। श्रवण की पत्नी कुंती देवी कहती है कि उनके बुजुर्गों ने एक कट्ठा जमीन खरीदकर मकान बनवाना था। पहले वह नदी की धारा में बह गया। उसके बाद दूसरा मकान भी अक्टूबर 13 में बह गया। उनके पास अब ठौर नहीं बचा। सात बच्चों में बेटे अमित, गोविंद, कन्हैया, धर्मेंद्र और बेटी प्रियंका, किरन और धर्मवीर की परवरिश के लिए श्रवण मेहनत मजदूरी में लगा रहा रहता है। इमदाद के रूप में 15 हजार रुपये मिले हैं। गांव के रविंद्र मिश्र का परिवार आंगनबाड़ी में शरण ली है। उनके भाई रघुवंश मणि मिश्र के परिवार को प्राथमिक विद्यालय कपरवार नंबर एक में शरण मिली है। रघुवंश मणि मिश्र कहते हैं कि आठ लाख रुपये खर्च कर 2005 में पक्का मकान बनवाया था। उसमें आठ साल ही रह पाए। सितंबर 13 में घाघरा ने आंखों के सामने उसे लील लिया। अब प्राइमरी स्कूल ही आसरा है। नदी के कटान से शंभूनाथ पांडेय के मकान का कुछ हिस्सा गायब हो गया है। नदी के कटान को देखते हुए कपरवार में झोपड़ी डालने के लिए पतहर के इंतजाम में लगे थे। महज चार बोझ का ही इंतजाम हो पाया। अपने दर्द को साझा करते हुए कहते हैं कि रहने के ठिकाने की बात को छोड़िए। अब तो लोग उनके गांव का नाम सुनकर रिश्ते जोड़ने से कतरा रहे हैं। बेटियों की शादी के रिश्ते तय नहीं हो पा रहे हैं। अपने नदी में समा चुके अपने मकान के आधे हिस्से को दिखाते हुए निशा कहती हैं कि एक सप्ताह से नदी ने कटान तेज कर दी है। अड़ार के गिरने की आवाज सुनकर रात में सभी परिवार के लोग चौंककर उठकर बैठ जाते हैं और नदी की तरफ जाकर देखते हैं कि कहीं उनका बचा-खुचा घर नदी में समा न जाए। परिवार के लोगों की रात में नींद गायब हो गई है।वजह साफ है कि नदी ने जिन लोगों का सबकुछ लील लिया और अब जिंदगी से जद्दोजहद जारी है।
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शासन में अटकी है परियोजना
बाढ़ खंड ने शासन को जो प्रोजेक्ट बनाकर भेजा है। उसमें कहा है कि घाघरा नदी और राप्ती नदी के संगमतट से एक किलोमीटर पूरब तरफ परसिया कुरह गांव स्थित है। इसके उत्तर बरहज की तरफ जाने वाला रामजानकी मार्र्ग स्थित है। जिसके आसपास हजारों कच्चे मकान और करीब 26 हजार की आबादी निवास करती है। दोनों नदियां बाएं तरफ अत्यधिक दवाब बनाते हुए प्रतिवर्ष करीब 50 मीटर की चौड़ाई में कटान करती चली आ रही हैं। जिसकी चपेट में परसिया कुरह गांव आया है। करीब 50 फीसदी आबादी नदी में विलीन हो चुकी है। वर्ष 2008 में तत्कालीन डीएम के निर्देश पर गांव के बाढ़ सुरक्षात्मक परियोजना बनाकर भेजा गया था। मुख्य अभियंता समिति ने विभागीय आपत्ति लगाकर परियोजना निरस्त कर दी। कहा कि एक गांव की सुरक्षा विभाग की नीति के अंतर्गत नहीं है। पुन: मुख्य अभियंता परिकल्प एवं नियोजन ने वर्ष 2013 में शासन के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि बड़े-बड़े शहरों को छोड़कर अन्य कटान रोकने का कार्य न करके यदि उन गांवों को किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर बसाया जाता है तो ज्यादा लाभप्रद होगा। हालांकि इसके बावजूद वर्ष 2013 में तत्कालीन डीएम मणि प्रसाद मिश्र के निर्देश पर बाढ़ खंड ने इस गांव को बचाने के लिए पूर्वांचल विकास निधि योजना के तहत 21.7826 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट बनाकर शासन को भेजा। इस प्रोजेक्ट में बाढ़ के पानी के दबाव की दिशा बदलने के लिए कई उपाय कि ए गए हैं। फिलहाल, इस प्रोजेक्ट के शासन से स्वीकृति का इंतजार है।
लंबित हैं ये परियोजनाएं
बरहज से मेहियवां तक डौला बांध के निर्माण एवं बाढ़ सुरक्षा कार्य के लिए 738.63 लाख की परियोजना। इसके बनने से नवापार, रगड़गंज, कोटवा, भड़सरा, मेहियवां आदि गांव जलमग्न होने से बच जाएंगे।
गौरा श्मशान घाट से मिश्र घाट के मध्य मलंग शाह मजार के पास घाघरा नदी के कटान से सुरक्षा के लिए 2012 में भेजी गई 88.16 लाख की परियोजना।
पैना में देई माता मंदिर के पास बोल्डर कटर के निर्माण के लिए 88.22 लाख की परियोजना।
नदी और बंधे के बीच बसे गांवों पर संकट।
गोर्रा के कहर से मिट रहा दो गांवों का अस्तित्व
रुद्रपुर। नदी और बंधे के बीच बसे गांवों के अस्तित्व पर संकट हर साल बढ़ता जा रहा है। इन गांवों को बचाने के लिए प्रशासन के पास कोई योजना नहीं है। रुद्रपुर में नदी और बंधे के बीच बसे दो गांवों को गोर्रा नदी हर साल छोटा करती चली जा रही है। इन गांवों के 200 परिवारों के उजड़ने का संकट बढ़ता चला जा रहा है।
गोर्रा नदी के किनारे बसा नरायनपुर की आबादी करीब दो हजार है। पूरे गांव के कटान की जद में आ जाने से मकान कटकर नदी में विलीन हो रहे हैं। एक दर्जन पक्के मकान कट कर नदी में गिर चुके हैं। हर साल मकानों के कट कर नदी में गिरने से पूरा गांव कटान की जद में आ गया है। यही हाल बहोरादलपतपुर गांव का है। यहां तो नदी आधे गांव को अपने आगोश में ले चुकी है। कटान से हर साल बर्बाद हो रहे मकानों और गांवों को बचाने में प्रशासन ने अपने हाथ खड़े कर लिए हैं। प्रशासन मकान कट कर बर्बाद होने पर गृह अनुदान के रूप में 1500 रुपये का चेक देकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ ले रहा है। बहोरादलपुर और नरायनपुर गांव को बचाने के लिए अब तक शासन स्तर पर भी कोई प्रयास नहीं हो पाया है। नरायनपुर के बेचू सिंह, मूरत सिंह, रामाज्ञा, राजकुमार, जयनारायण सिंह, चंद्रभान, शंकर, नन्हकू और बहोरादलपतपुर के रमेश मिश्र की तीन पक्के मकान कटकर नदी में विलीन हो चुके हैं। गांव के देवेंद्र शर्मा, सुधाकर गुप्ता, अश्विनी दुबे आदि ने कहा कि शासन और प्रशासन की मानवीय संवेदना मर चुकी है। दोनों गांव पांच साल से तेजी से कट कर नदी में जा रहे हैं। लेकिन गांव को बचाने की योजना नहीं बन पाई। हर साल मकान कट कर नदी में गिर रह हैं और प्रशासन 1500 का चेक थमा कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जा रहा है। इस बाबत एसडीएम भगवानदीन ने कहा कि सिंचाई विभाग को गांव बचाने के लिए कार्ययोजना तैयार करने का निर्देश दिया जाएगा। जिलाधिकारी के माध्यम से शासन में बातचीत की जा रही है। नदी और बंधे के बीच बसे गांवों को बचाने के लिए प्रशासन कार्ययोजना बना रहा है।
गांव बचाने को कोई योजना नहीं
रुद्रपुर। नदी के कटान से मिट रहे गांवों को बचाने के लिए सिंचाई विभाग के बाढ़ कार्य खंड के पास कोई योजना नहीं है। उन्होंने गांव को बचाने में असमर्थ बता कर हाथ खड़े कर लिए हैं। वहीं प्रशासन की ओर से भी गांव को बचाने के लिए शासन में कोई कार्ययोजना नहीं भेजने से इन दोनों गांवों का मिटना तय माना जा रहा है।
कोट
सिंचाई विभाग बंधों को बचाने के लिए जिम्मेदार है। विभाग बंधो की सुरक्षा के परियोजनाओं पर काम करता है। बंधे और नदी के बीच बसे गांवों में हम कोई बचाव कार्य करने में असमर्थ है।
-बाढ़ कार्य खंड के अधिशासी अभियंता सुरेंद्र मोहन।
नासूर बनता जा रहा बाढ़ का दिया जख्म
रुद्रपुर। जिले का सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र रुद्रपुर में बाढ़ का जख्म साल दर साल बढ़ता जा रहा है। यहां बीते 30 वर्षों में नदियों ने रास्ता बदलकर कई गांवों का भूगोल बदल दिया। बाढ़ से बर्बाद गांवों के लोगों का जख्म प्रशासनिक मरहम के अभाव में नासूर बनता जा रहा है।
राप्ती नदी के कटान से माझानारायन और गायघाट के 500 परिवारों को तीन बार आशियाना गंवाना पड़ा। इन गांवों के लोगों की उजड़ने और बसने में जिंदगी तबाह हो रही है। वहीं गोर्रा नदी के कहर से सचौली गांव के लोग आज भी उबर नहीं पाए हैं। पांडेयमाझा राजधर और सचौली गांव को गोर्रा नदी राजस्व के मानचित्र से मिटा चुकी है। इन गांवों के लोगों के मकान और सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन को नदी ने लील लिया। 1998 की प्रलयकारी बाढ़ में पांडेयमाझा राजधर का नामोनिशां मिटने के बाद यहां के दो सौ परिवारों के पुनर्वास की सरकार ने कोई व्यवस्था नहीं की। अधिकांश लोगों को अगल-बगल के गांवों में जमीन खरीदकर नया आशियाना बनाना पड़ा। त्रासदी के शिकार 25 परिवारों को आज भी सड़क के किनारे फूस और छप्पर में गुजारा करना पड़ रहा है। सरकारी इमदाद के नाम पर उन्हे सिर्फ 500 रुपये मिले। 15 वर्षों से पांडेयमाझा राजधर गांव के रामवृक्ष, सिंहासन, नंदलाल, तारकेश्वर, सोहन साहनी, बिहारी, देवकी, श्रद्धा सहित 25 लोगों का परिवार पीडब्लूडी की सड़क के किनारे गुजारा कर रहा हैै। बाढ़ पीड़ितों को सड़क के किनारे ग्राम सभा की जमीन में यह कह कर बसाया गया था कि बाद में जमीन उन्हें पट्टा कर दी जाएगी। लेकिन आज तक उन्हें पट्टे के पक्के कागजात नहीं मिल पाए। रामवृक्ष, सिंहासन आदि ने बताया कि सभी लोग 15 साल से पट्टे के लिए तहसील का चक्कर काट रहे हैं।
क्या कहते हैं जिम्मेदार
एसडीएम भगवानदीन ने कहा कि बाढ़ से विस्थापित लोगों को आवासीय पट्टे का आवंटन हो जाना चाहिए। ऐसा क्यों नहीं हुआ इसकी जांच होगी। विस्थापित लोगों के पट्टे में आ रही अड़चन को दूर कराकर उन्हें पट्टे का आवंटन किया जाएगा।