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कहानियों कविताओं, निबंधों के जरिये हिंदी को समृद्ध करने में लगे युवा
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चकिया। हिंदी में एकता की भावना प्रतिध्वनित होती है। हिंदी जनसंप्रेषण, जनसंवाद की राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित है। उसे बढ़ाने तथा जन-जन तक पहुंचाने में क्षेत्र के साहित्यकारों ने काफी मदद कर रहे है। वे कहानियों, कविताओं एवं निबंधों के माध्यम से इसके विकास में लगे हुए हैं। वे लगातार इसको सशक्त बनाने में लगे हुए हैं।
हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान मिलना चाहिए। इसके लिए हिंदी भाषी क्षेत्रों को पूरे मनोयोग से काम करने की जरूरत है। चकिया नगर के निवासी पेशे से अधिवक्ता स्वतंत्र कुमार श्रीवास्तव नवल अपने पेशे के अलावा कई निबंधों, नाटकों, कहानियों लघु कथाओं, राष्ट्रीय गीतों के जरिए हिंदी के विकास में जुटे हुए हैं। उनके द्वारा रचित आस्था की धरोहर रेखा चित्र, सरहद पर फौजी, कटोरी भर आटा, सांवली तथा नियति जैसी रचनाएं हिंदी को समृद्ध कर रही हैं। वे कहते हैं कि हिंदी से ही हमारा सम्मान है हमें अपना कार्य हिंदी में ही करना चाहिए। जिससे इसका विकास होगा।
जागेश्वरनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय में भुगोल के प्रवक्ता के पद पर कार्यरत संतोष कुमार सिंह कहते हैं कि हिंदी आत्मसम्मान की भाषा है। हिंदी ऐसी भाषा है जो सभी को जोड़ती है। इसके उत्थान के लिए सभी को आगे आने की जरूरत है। संतोष कुमार हिंदी भाषा एवं साहित्यिक के विकास को लेकर हमेशा सजग रहते हैं। इनकी रचनाएं वह गौरैया ही थी, हे मातृभूमि, अमीरी मर चुकी है, हरे-भरे वृक्षों की छांव हिंदी के विकास में उनके योगदान का उदाहरण है। उनका मानना है कि हिंदी भाषा हमें समाज से जोड़ने मदद करती है यह जितना व्यापक होगी उतनी ही यह समृद्ध होगी और दुनिया में इसका मान बढ़ेगा।
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हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान मिलना चाहिए। इसके लिए हिंदी भाषी क्षेत्रों को पूरे मनोयोग से काम करने की जरूरत है। चकिया नगर के निवासी पेशे से अधिवक्ता स्वतंत्र कुमार श्रीवास्तव नवल अपने पेशे के अलावा कई निबंधों, नाटकों, कहानियों लघु कथाओं, राष्ट्रीय गीतों के जरिए हिंदी के विकास में जुटे हुए हैं। उनके द्वारा रचित आस्था की धरोहर रेखा चित्र, सरहद पर फौजी, कटोरी भर आटा, सांवली तथा नियति जैसी रचनाएं हिंदी को समृद्ध कर रही हैं। वे कहते हैं कि हिंदी से ही हमारा सम्मान है हमें अपना कार्य हिंदी में ही करना चाहिए। जिससे इसका विकास होगा।
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जागेश्वरनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय में भुगोल के प्रवक्ता के पद पर कार्यरत संतोष कुमार सिंह कहते हैं कि हिंदी आत्मसम्मान की भाषा है। हिंदी ऐसी भाषा है जो सभी को जोड़ती है। इसके उत्थान के लिए सभी को आगे आने की जरूरत है। संतोष कुमार हिंदी भाषा एवं साहित्यिक के विकास को लेकर हमेशा सजग रहते हैं। इनकी रचनाएं वह गौरैया ही थी, हे मातृभूमि, अमीरी मर चुकी है, हरे-भरे वृक्षों की छांव हिंदी के विकास में उनके योगदान का उदाहरण है। उनका मानना है कि हिंदी भाषा हमें समाज से जोड़ने मदद करती है यह जितना व्यापक होगी उतनी ही यह समृद्ध होगी और दुनिया में इसका मान बढ़ेगा।
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