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पिता ने मंजिल तक पहुंचाया
ब्यूरो/ अमरउजाला, चंदौली
Updated Mon, 20 Jun 2016 01:48 AM IST
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एसडीएम सदर सृष्टि धवन और पुलिस अधीक्षक चंदौली किरीट राठौड़।
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पिता की प्रेरणा और मार्गदर्शन ने इन्हें उनकी मंजिल तक पहुंचाया। पिता की मजबूत प्रेरणा न होती तो ये दोनों आज इस मुकाम पर नहीं होते। ये दोनों इस मामले में अपने को खुशनसीब मानते हैं। बात हो रही है चंदौली के आफीसर्स दंपती किरीट राठौड़ और डॉ. सृष्टि धवन की। किरीट जिले के आला पुलिस आफिसर (एसपी) हैं तो सृष्टि सदर तहसील की एसडीएम। फादर्स डे पर इस दंपती से उनके पिता के बारे में बात की गई।
पापा की प्रेरणा से ही संबल
किरीट बताते हैं कि मैंने साधारण परिवार में जन्म लिया। पापा श्री हरिभाई राठौड़ सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। उन्होंने मुझे पढ़ाने में कोई कोताही नहीं की। कदम-कदम पर मेरा उत्साहवर्धन किया। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में एमटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने राजकीय इंजीनियरिंग कालेज, अहमदाबाद में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर ज्वाइन किया। मैं अपने कैरियर से संतुष्ट था लेकिन पापा ने कहा कि तुम्हारी मंजिल यह नहीं है। तुम्हें तो देश की सर्वोच्च सेवा की तैयारी करनी है। उनके इन शब्दों ने मुझे प्रेरित किया और मैं संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी में जी-जान से जुट गया। पापा का आशीर्वाद और प्रोत्साहन करना मेरा संबल बना और मैं 2010 बैच में आईपीएस में सेलेक्ट हो गया। खुशी की बात यह थी कि मैंने पहले प्रयास में यह सफलता हासिल की थी। वास्तव में अब मेरे पास जनसेवा का एक बड़ा फलक है, जो इंजीनियरिंग कालेज के शिक्षक के तौर पर नहीं था। इसका सारा श्रेय मेरे पापा को है। फादर्स डे पर मैंने अपने पापा को फोन करके उनका आशीर्वाद लिया।
बेटों जैसा ही माना मुझे भी
डॉ. सृष्टि बताती हैं कि मेरे पापा विजय धवन (अब स्वर्गीय) मेरे दोनों भाइयों और मेरी पढ़ाई के प्रति शुरू से गंभीर थे। पापा हमेशा हमारी पढ़ाई का ध्यान रखते थे। पापा ने कभी भी मुझे बेटों से कम महत्व नहीं दिया बल्कि भाइयों से बढ़कर माना। हर कदम पर मेरा उत्साहवर्धन किया। पापा की इच्छा थी कि मैं डॉक्टर बनूं। उनकी प्रेरणा से मैंने अहमदाबाद मेडिकल कालेज से बीडीएस की डिग्री हासिल की। मैं प्रैक्टिस करना चाहती थी। पर पापा मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। एक बार मेरे जन्मदिन पर उन्होंने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कविता सुनाई -‘जीवन का उद्देश्य नहीं है, शांत भवन में टिक रहना; किंतु पहुंचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं..।’ कविता सुनाकर कहा -अपना उद्देश्य बड़ा करो। इसके बाद उनकी प्रेरणा से मैं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग गई। यूपी में 2009 की लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी और सफल होकर असिस्टेंट कमिश्नर (वाणिज्य कर) बनी। इसके बाद मैंने फिर परीक्षा दी और 2011 में एसडीएम बनी। सृष्टि बताती हैं कि आज मैंने पापा की तस्वीर पर फूल-माला चढ़ाकर उनको याद किया।
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पापा की प्रेरणा से ही संबल
किरीट बताते हैं कि मैंने साधारण परिवार में जन्म लिया। पापा श्री हरिभाई राठौड़ सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। उन्होंने मुझे पढ़ाने में कोई कोताही नहीं की। कदम-कदम पर मेरा उत्साहवर्धन किया। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में एमटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने राजकीय इंजीनियरिंग कालेज, अहमदाबाद में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर ज्वाइन किया। मैं अपने कैरियर से संतुष्ट था लेकिन पापा ने कहा कि तुम्हारी मंजिल यह नहीं है। तुम्हें तो देश की सर्वोच्च सेवा की तैयारी करनी है। उनके इन शब्दों ने मुझे प्रेरित किया और मैं संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी में जी-जान से जुट गया। पापा का आशीर्वाद और प्रोत्साहन करना मेरा संबल बना और मैं 2010 बैच में आईपीएस में सेलेक्ट हो गया। खुशी की बात यह थी कि मैंने पहले प्रयास में यह सफलता हासिल की थी। वास्तव में अब मेरे पास जनसेवा का एक बड़ा फलक है, जो इंजीनियरिंग कालेज के शिक्षक के तौर पर नहीं था। इसका सारा श्रेय मेरे पापा को है। फादर्स डे पर मैंने अपने पापा को फोन करके उनका आशीर्वाद लिया।
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बेटों जैसा ही माना मुझे भी
डॉ. सृष्टि बताती हैं कि मेरे पापा विजय धवन (अब स्वर्गीय) मेरे दोनों भाइयों और मेरी पढ़ाई के प्रति शुरू से गंभीर थे। पापा हमेशा हमारी पढ़ाई का ध्यान रखते थे। पापा ने कभी भी मुझे बेटों से कम महत्व नहीं दिया बल्कि भाइयों से बढ़कर माना। हर कदम पर मेरा उत्साहवर्धन किया। पापा की इच्छा थी कि मैं डॉक्टर बनूं। उनकी प्रेरणा से मैंने अहमदाबाद मेडिकल कालेज से बीडीएस की डिग्री हासिल की। मैं प्रैक्टिस करना चाहती थी। पर पापा मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। एक बार मेरे जन्मदिन पर उन्होंने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कविता सुनाई -‘जीवन का उद्देश्य नहीं है, शांत भवन में टिक रहना; किंतु पहुंचना उस सीमा तक जिसके आगे राह नहीं..।’ कविता सुनाकर कहा -अपना उद्देश्य बड़ा करो। इसके बाद उनकी प्रेरणा से मैं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग गई। यूपी में 2009 की लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी और सफल होकर असिस्टेंट कमिश्नर (वाणिज्य कर) बनी। इसके बाद मैंने फिर परीक्षा दी और 2011 में एसडीएम बनी। सृष्टि बताती हैं कि आज मैंने पापा की तस्वीर पर फूल-माला चढ़ाकर उनको याद किया।
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