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सुनि लेहू अरज हमार छठी मइया
चंदौली ब्यूरो, अमर उजाला
Updated Mon, 07 Nov 2016 12:53 AM IST
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गंगा घाट पर पूजन अर्चन करती हुईं व्रती महिलाएं।
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लोक आस्था के महापर्व डाला छठ पर रविवार की शाम सरोवरों, पोखरों और नदी के तटों पर आस्थावानों का रेला उमड़ा। व्रती महिलाओं-पुरुषों ने अस्ताचल गामी सूर्य को अर्घ्य दिया। इस दौरान सरोवर तटों पर मेला लगा। यहां आतिशबाजी भी खूब हुई और छठ मइया के गीतों से इलाका गुंजायमान रहा।
सुबह से ही पर्व की तैयारियां शुरू हो गई थीं। घरों में व्रती महिलाओं ने स्नान -ध्यान के बाद अर्घ्य के लिए सूप और दउरी तैयार की। इसमें पांच प्रकार के फल, ठेकुआ, चावल से बनी मिठाइयां, फूल, माला, दीपक, रोरी, सिंदूर, कपूर, अगरबत्ती आदि सजाए। दोपहर बाद महिलाएं और पुरुष नए वस्त्र धारण कर पूरे परिवार के साथ नंगे पैर ही सरोवरों की ओर चल पड़े। कई घरों से व्रती बैंड बाजा के साथ सरोवरों पर पहुंचे तो कुछ व्रती घर से घाट तक लेटकर पहुंचीं।
घर के पुरुष सदस्य सिर पर फलों का दउरा लेकर चल रहे थे, तो बच्चे-किशोर गन्ना लेकर घाटों तक पहुंचे। महिलाएं हाथों में कलश लेकर गीत गाते हुए घाटों पर पहुंचीं। नगर के दामोदरदास पोखरा, मालगोदाम, मानसरोवर तालाब, सिकटियां, राममंदिर पोखरा, मुगलचक पोखरा, अलीनगर स्थित रामजानकी पोखरा पर अर्घ्य देने वालों की भीड़ जुटी। घाटों पर पहुंच कर व्रतियों ने तय स्थान पर फलों की टोकरी, सूप आदि रखे। इसके बाद वेदी बनाकर पूजा अर्चना की और कलश स्थापित किया। सरोवर के पास गन्ने का मंडप बनाया और धूप, दीप, फूल माला से पूजा अर्चना कर कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्य के अस्त होने का इंतजार किया।
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इसके बाद डूबते सूर्य को दूध, जल आदि से अर्घ्य दिया। अर्घ्य दिलाने के लिए भी लोगों का तांता लगा।
इसके पूर्व प्रमुख तालाबों के किनारे विद्युत झालर और हाइमास्ट लाइट से रोशन किया गया था। कई पूजा समिति के लोगों ने अर्घ्य के लिए लोगों को दूध उपलब्ध कराए। अर्घ्य देने वालों को देखने के लिए भी भीड़ लगी रही। यही नहीं तालाब के आस पास मेला लगा। यहां बच्चों ने चाट पकौड़े, गोलगप्पा का आनंद लिया और खिलौना और गुब्बारे खूब खरीदे। वहीं युवाओं ने यहां आतिशबाजी भी की।
पूजन अर्चन के बाद महिलाएं कलश लेकर गीत गाते हुए वापस लौटीं। वहीं कुछ महिलाएं घाट पर ही सुबह के अर्घ्य के लिए रुक गईं। कई घाटों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए। वहीं शहर से कई इलाकों के व्रती वाहन बुक कर अर्घ्य देने के लिए वाराणसी गए। उधर छठ पर घरों से व्रतियों के निकलने के पूर्व उनके घर के लोगों ने ही घर के साथ साथ आसपास की गलियों की साफ सफाई की।
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सुबह से ही पर्व की तैयारियां शुरू हो गई थीं। घरों में व्रती महिलाओं ने स्नान -ध्यान के बाद अर्घ्य के लिए सूप और दउरी तैयार की। इसमें पांच प्रकार के फल, ठेकुआ, चावल से बनी मिठाइयां, फूल, माला, दीपक, रोरी, सिंदूर, कपूर, अगरबत्ती आदि सजाए। दोपहर बाद महिलाएं और पुरुष नए वस्त्र धारण कर पूरे परिवार के साथ नंगे पैर ही सरोवरों की ओर चल पड़े। कई घरों से व्रती बैंड बाजा के साथ सरोवरों पर पहुंचे तो कुछ व्रती घर से घाट तक लेटकर पहुंचीं।
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घर के पुरुष सदस्य सिर पर फलों का दउरा लेकर चल रहे थे, तो बच्चे-किशोर गन्ना लेकर घाटों तक पहुंचे। महिलाएं हाथों में कलश लेकर गीत गाते हुए घाटों पर पहुंचीं। नगर के दामोदरदास पोखरा, मालगोदाम, मानसरोवर तालाब, सिकटियां, राममंदिर पोखरा, मुगलचक पोखरा, अलीनगर स्थित रामजानकी पोखरा पर अर्घ्य देने वालों की भीड़ जुटी। घाटों पर पहुंच कर व्रतियों ने तय स्थान पर फलों की टोकरी, सूप आदि रखे। इसके बाद वेदी बनाकर पूजा अर्चना की और कलश स्थापित किया। सरोवर के पास गन्ने का मंडप बनाया और धूप, दीप, फूल माला से पूजा अर्चना कर कमर भर पानी में खड़े होकर सूर्य के अस्त होने का इंतजार किया।
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इसके बाद डूबते सूर्य को दूध, जल आदि से अर्घ्य दिया। अर्घ्य दिलाने के लिए भी लोगों का तांता लगा।
इसके पूर्व प्रमुख तालाबों के किनारे विद्युत झालर और हाइमास्ट लाइट से रोशन किया गया था। कई पूजा समिति के लोगों ने अर्घ्य के लिए लोगों को दूध उपलब्ध कराए। अर्घ्य देने वालों को देखने के लिए भी भीड़ लगी रही। यही नहीं तालाब के आस पास मेला लगा। यहां बच्चों ने चाट पकौड़े, गोलगप्पा का आनंद लिया और खिलौना और गुब्बारे खूब खरीदे। वहीं युवाओं ने यहां आतिशबाजी भी की।
पूजन अर्चन के बाद महिलाएं कलश लेकर गीत गाते हुए वापस लौटीं। वहीं कुछ महिलाएं घाट पर ही सुबह के अर्घ्य के लिए रुक गईं। कई घाटों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए। वहीं शहर से कई इलाकों के व्रती वाहन बुक कर अर्घ्य देने के लिए वाराणसी गए। उधर छठ पर घरों से व्रतियों के निकलने के पूर्व उनके घर के लोगों ने ही घर के साथ साथ आसपास की गलियों की साफ सफाई की।