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जैविक खेती के जरिए फसलों को संजीवनी दे रहे प्रदीप

Ghaziabad Bureau गाजियाबाद ब्यूरो
Updated Sat, 11 Jan 2020 11:51 PM IST
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प्रगतिशील किसान प्रदीप राजौरा। - फोटो : BULANDSHAHR
जैविक खेती के जरिए फसलों को संजीवनी दे रहे प्रदीप
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बुलंदशहर। सात साल पहले शुरू की जैविक खेती के जरिए किसान प्रदीप अपनी फसलों को संजीवनी दे रहे हैं। अपनी किसी भी फसल में वह रासायनिक यूरिया नहीं डाल रहे हैं। सिर्फ देशी गाय के गोबर और गोमूत्र को खाद के रूप में इस्तेमाल कर खेती कर रहे हैं।

जैविक खेती के लिए आजकल सरकार द्वारा जोर-शोर प्रचार किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि जैविक खेती से फसल तो बेहतर होती ही है, किसान की आय भी बढ़ती है। बहुत से किसानों ने जैविक खेती से सफलता प्राप्त की है। इसका जीता जागता उदाहरण शिकारपुर क्षेत्र के गांव फतेहपुर निवासी प्रदीप राजौरा हैं। प्रदीप ने बताया कि उनके पास 75 बीघा जमीन है। वह गोबर से बनने वाली खाद का इस्तेमाल करते हैं। उन्हाेंने बताया कि करीब आठ साल पूर्व उनके पिता जीरो बजट से प्राकृतिक खेती करने वाले वैज्ञानिक डा. सुभाष पालेकर से मिले थे। वहीं से उन्होंने प्राकृतिक खेती करने की ठानी। प्रदीप ने बताया कि वह देशी गाय के गोबर और गोमूत्र से खाद तैयार करते हैं। इसके लिए वह दो सौ लीटर के ड्रम में दस किलो ग्राम गोबर और दस लीटर गोमूत्र डालते हैं। उसमें एक किलो बेसन और एक किलो गुड़ या शक्कर डाली जाती है। फिर इसके बाद पीपल के पेड़ की जड़ों की आधा किलो मिट्टी डालकर 48 घंटे तक सुबह शाम प्लांटेशन करते है। बताया कि इसमें सूरज की किरण नहीं पहुंचनी चाहिए। 48 घंटे बाद जब खाद तैयार हो जाती है तो उसको खेतों में डाली जाती है। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खाद की सब्जी और अनाज इतना स्वादिष्ट होता है कि लोगों की डिमांड लगातार बढ़ती जा रही है। करीब 50 साल पूर्व जब लोग प्राकृतिक खेती करते थे तो जमीन का वाटर लेबल ठीक था और जमीन के पोषक तत्व भी जीवित थे। जमीन बिलकुल स्वास्थ्य रहती थी। लेकिन आज रासायन युक्त यूरिया डालने से जमीन के सभी पोषक तत्व समाप्त हो गए हैं। हर किसान को प्राकृतिक खेती की ओर लौटना चाहिए। आय के बारे में उन्होंने बताया कि आठ साल पहले और अब की आय में जमीन आसमान का अंतर है। पहले से खुशहाली का जीवन जिया जा रहा है। सब्जी और अनाज होते ही हाथों हाथ बिक जाता है।
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