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Bulandshahar News: 45 साल... 2.65 लाख मुकदमे विचाराधीन, इंसाफ अभी बाकी
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विकास वत्स
बुलंदशहर। ‘न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है...कानून की यह बुनियादी सीख जनपद की अदालतों के मौजूदा हालात पर पूरी तरह सटीक बैठ रही है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के आकड़े जनपद की न्यायिक प्रणाली में हो रही देरी व पुलिस अभियोजन तंत्र की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
जिले की विभिन्न अदालतों में इस समय कुल 2,65,520 (करीब 2.65 लाख) मुकदमे विचाराधीन हैं। सबसे चौंकाने वाली और विचलित करने वाली तस्वीर उन मुकदमों की है, जो पिछले चार दशकों से अदालत की फाइलों में दबे धूल फांक रहे हैं।
वर्ष 1981 में दर्ज हुआ एक आपराधिक मुकदमा पिछले 45 वर्षों से फैसले की बाट जोह रहा है। कई मामलों में तो पीड़ित, वादी व गवाह तक दुनिया छोड़ चुके हैं, लेकिन अदालत की चौखट पर तारीखों का सिलसिला आज भी जारी है।
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अदालती आंकड़ों की गहराई से पड़ताल करें तो जिले में 10 वर्ष से अधिक पुराने मुकदमों की संख्या 33,502 दर्ज है। इनमें से 30 वर्ष से अधिक पुराने मुकदमों की स्थिति व्यवस्था की सुस्ती का सबसे बड़ा प्रमाण है। वर्ष 1981 के तीन आपराधिक मामले आज भी लंबित हैं।
इसी तरह वर्ष 1982 और 1983 का एक-एक आपराधिक मुकदमा अब तक निस्तारित नहीं हो सका है। वर्ष 1987 से लेकर 1994 के बीच कुल 102 मुकदमे विचाराधीन हैं।
इनमें 95 फौजदारी और 7 दीवानी मामले शामिल हैं। यदि 1995 तक के मुकदमों को शामिल किया जाए, तो यह आंकड़ा बढ़कर 136 हो जाता है। वर्ष 1996 में 36, 1997 में 55, 1998 में 61, 1999 में 80 और वर्ष 2000 में 129 मुकदमे दर्ज हुए थे, जो आज दो दशक बाद भी किसी न्याय की दहलीज तक नहीं पहुंच सके हैं।
मुकदमों के निस्तारण की चाल सुस्त
अदालतों में आने वाले नए मुकदमों और उनके निस्तारण के अनुपात में भारी अंतर है। पिछले एक महीने के आंकड़ों पर नजर डालें तो जनपद में 56,928 नए मामले दर्ज हुए जिनमें 56,276 आपराधिक थे।
इसके विपरीत अदालतों द्वारा कुल 3,329 मामलों का ही निस्तारण किया जा सका। निस्तारित मामलों में 1,730 मुकदमों का फैसला बहस और गवाही के बाद हुआ, जबकि 1,599 का निस्तारण अनकंटेस्टेड आधार पर हुआ।
इंसाफ के लिए दर-दर भटकने को लाचार
इस न्यायिक सुस्ती की मार समाज के सबसे कमजोर तबकों पर भी पड़ रही है। आंकड़ों के अनुसार, जनपद में महिलाओं द्वारा दाखिल 12,717 मुकदमे लंबित हैं, जिनमें 8,689 फौजदारी और 4,028 दीवानी मामले शामिल हैं।
वहीं वरिष्ठ नागरिकों के 7,150 मुकदमे जिनमें 5,140 दीवानी और 2,010 फौजदारी अदालती फेर में उलझे हुए हैं। कई बुजुर्ग अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक कचहरी की सीढ़ियां चढ़ते-उतरते थक चुके हैं, लेकिन उनकी संपत्ति या फौजदारी विवादों का निपटारा नहीं हो पा रहा है।
पुलिस मॉनिटरिंग सेल की नाकामी
गंभीर व पुराने मुकदमों में अपराधियों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे भेजने के लिए प्रदेश सरकार ने पूरे राज्य में ऑपरेशन कन्विक्शन शुरू किया था। इसके तहत प्रत्येक जिले की पुलिस मॉनिटरिंग सेल को यह दायित्व दिया था कि वह अदालतों में लंबित पुराने मामलों को चिह्नित कर गवाहों की सुरक्षा व उपस्थिति तय करें।
समय पर वैज्ञानिक व दस्तावेजी साक्ष्य कोर्ट में दाखिल करे व प्रभावी पैरवी कराएं। बुलंदशहर में जमीन पर यह अभियान पुलिस की लापरवाही की भेंट चढ़ता दिख रहा है। दशकों से लटके मुकदमों में सबसे बड़ी रुकावट पुलिस अभियोजन की शिथिलता है।
मॉनिटरिंग सेल न तो समय पर गवाहों को समन तामील करा पा रही है और न ही संबंधित विवेचकों को साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कोर्ट में खड़ा कर पा रही है। पुलिस की मॉनिटरिंग सेल इन कड़ियों को जोड़ने में नाकाम साबित हो रही है, जिसका सीधा फायदा अभियुक्तों को मिल रहा है। पीड़ित केवल मायूसी के साथ घर लौट जाते हैं।
81 हजार मुकदमों की तारीख ही तय नहीं
आंकड़ों के अनुसार, जनपद में कुल 2,65,520 लंबित मुकदमों में से 2,44,866 मामले फौजदारी के हैं, जबकि दीवानी मामलों की संख्या 20,654 है। इनमें 1,23,551 मुकदमे (करीब 46.53 प्रतिशत) एक वर्ष से अधिक समय से पेंडिंग हैं।
प्री-लिटिगेशन व प्री-ट्रायल स्टेज पर 12,916 मामले अटके हैं, जिनमें से 72.10 प्रतिशत यानी 9,312 मामले एक साल से ज्यादा पुराने हैं। यही नहीं, कुल लंबित मामलों में से 81,363 मामले अनडेटेड यानी बिना तय तारीख के पड़े हुए हैं। इनमें 78,544 सिर्फ फौजदारी मामले हैं।
विचाराधीन मुकदमों में अधिकतर वह मामले हैं, जो बहुत कम सजा के हैं या अधीनस्थ न्यायालय के द्वारा विचाराधीन हैं। दूसरा कुछ बहुत पुराने मामले होने पर गवाहों के पते बदल जाने के चलते या कुछ गवाहों के पेश न होने के चलते लंबित रह जाते हैं। - रविंद्र शर्मा, अध्यक्ष, डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन
कई बार गवाह समय से नहीं पहुंच पाते हैं और कई बार साक्ष्य संकलन में देरी हो जाती है। इस कारण कुछ मुकदमे लंबित हो जाते हैं। न्यायपालिका साक्ष्य और संकलन के आधार पर चलती है। - धर्मेंद्र सिंह खालौर, महासचिव, डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन
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बुलंदशहर। ‘न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है...कानून की यह बुनियादी सीख जनपद की अदालतों के मौजूदा हालात पर पूरी तरह सटीक बैठ रही है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के आकड़े जनपद की न्यायिक प्रणाली में हो रही देरी व पुलिस अभियोजन तंत्र की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
जिले की विभिन्न अदालतों में इस समय कुल 2,65,520 (करीब 2.65 लाख) मुकदमे विचाराधीन हैं। सबसे चौंकाने वाली और विचलित करने वाली तस्वीर उन मुकदमों की है, जो पिछले चार दशकों से अदालत की फाइलों में दबे धूल फांक रहे हैं।
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वर्ष 1981 में दर्ज हुआ एक आपराधिक मुकदमा पिछले 45 वर्षों से फैसले की बाट जोह रहा है। कई मामलों में तो पीड़ित, वादी व गवाह तक दुनिया छोड़ चुके हैं, लेकिन अदालत की चौखट पर तारीखों का सिलसिला आज भी जारी है।
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अदालती आंकड़ों की गहराई से पड़ताल करें तो जिले में 10 वर्ष से अधिक पुराने मुकदमों की संख्या 33,502 दर्ज है। इनमें से 30 वर्ष से अधिक पुराने मुकदमों की स्थिति व्यवस्था की सुस्ती का सबसे बड़ा प्रमाण है। वर्ष 1981 के तीन आपराधिक मामले आज भी लंबित हैं।
इसी तरह वर्ष 1982 और 1983 का एक-एक आपराधिक मुकदमा अब तक निस्तारित नहीं हो सका है। वर्ष 1987 से लेकर 1994 के बीच कुल 102 मुकदमे विचाराधीन हैं।
इनमें 95 फौजदारी और 7 दीवानी मामले शामिल हैं। यदि 1995 तक के मुकदमों को शामिल किया जाए, तो यह आंकड़ा बढ़कर 136 हो जाता है। वर्ष 1996 में 36, 1997 में 55, 1998 में 61, 1999 में 80 और वर्ष 2000 में 129 मुकदमे दर्ज हुए थे, जो आज दो दशक बाद भी किसी न्याय की दहलीज तक नहीं पहुंच सके हैं।
मुकदमों के निस्तारण की चाल सुस्त
अदालतों में आने वाले नए मुकदमों और उनके निस्तारण के अनुपात में भारी अंतर है। पिछले एक महीने के आंकड़ों पर नजर डालें तो जनपद में 56,928 नए मामले दर्ज हुए जिनमें 56,276 आपराधिक थे।
इसके विपरीत अदालतों द्वारा कुल 3,329 मामलों का ही निस्तारण किया जा सका। निस्तारित मामलों में 1,730 मुकदमों का फैसला बहस और गवाही के बाद हुआ, जबकि 1,599 का निस्तारण अनकंटेस्टेड आधार पर हुआ।
इंसाफ के लिए दर-दर भटकने को लाचार
इस न्यायिक सुस्ती की मार समाज के सबसे कमजोर तबकों पर भी पड़ रही है। आंकड़ों के अनुसार, जनपद में महिलाओं द्वारा दाखिल 12,717 मुकदमे लंबित हैं, जिनमें 8,689 फौजदारी और 4,028 दीवानी मामले शामिल हैं।
वहीं वरिष्ठ नागरिकों के 7,150 मुकदमे जिनमें 5,140 दीवानी और 2,010 फौजदारी अदालती फेर में उलझे हुए हैं। कई बुजुर्ग अपनी जिंदगी की आखिरी सांस तक कचहरी की सीढ़ियां चढ़ते-उतरते थक चुके हैं, लेकिन उनकी संपत्ति या फौजदारी विवादों का निपटारा नहीं हो पा रहा है।
पुलिस मॉनिटरिंग सेल की नाकामी
गंभीर व पुराने मुकदमों में अपराधियों को जल्द से जल्द सलाखों के पीछे भेजने के लिए प्रदेश सरकार ने पूरे राज्य में ऑपरेशन कन्विक्शन शुरू किया था। इसके तहत प्रत्येक जिले की पुलिस मॉनिटरिंग सेल को यह दायित्व दिया था कि वह अदालतों में लंबित पुराने मामलों को चिह्नित कर गवाहों की सुरक्षा व उपस्थिति तय करें।
समय पर वैज्ञानिक व दस्तावेजी साक्ष्य कोर्ट में दाखिल करे व प्रभावी पैरवी कराएं। बुलंदशहर में जमीन पर यह अभियान पुलिस की लापरवाही की भेंट चढ़ता दिख रहा है। दशकों से लटके मुकदमों में सबसे बड़ी रुकावट पुलिस अभियोजन की शिथिलता है।
मॉनिटरिंग सेल न तो समय पर गवाहों को समन तामील करा पा रही है और न ही संबंधित विवेचकों को साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कोर्ट में खड़ा कर पा रही है। पुलिस की मॉनिटरिंग सेल इन कड़ियों को जोड़ने में नाकाम साबित हो रही है, जिसका सीधा फायदा अभियुक्तों को मिल रहा है। पीड़ित केवल मायूसी के साथ घर लौट जाते हैं।
81 हजार मुकदमों की तारीख ही तय नहीं
आंकड़ों के अनुसार, जनपद में कुल 2,65,520 लंबित मुकदमों में से 2,44,866 मामले फौजदारी के हैं, जबकि दीवानी मामलों की संख्या 20,654 है। इनमें 1,23,551 मुकदमे (करीब 46.53 प्रतिशत) एक वर्ष से अधिक समय से पेंडिंग हैं।
प्री-लिटिगेशन व प्री-ट्रायल स्टेज पर 12,916 मामले अटके हैं, जिनमें से 72.10 प्रतिशत यानी 9,312 मामले एक साल से ज्यादा पुराने हैं। यही नहीं, कुल लंबित मामलों में से 81,363 मामले अनडेटेड यानी बिना तय तारीख के पड़े हुए हैं। इनमें 78,544 सिर्फ फौजदारी मामले हैं।
विचाराधीन मुकदमों में अधिकतर वह मामले हैं, जो बहुत कम सजा के हैं या अधीनस्थ न्यायालय के द्वारा विचाराधीन हैं। दूसरा कुछ बहुत पुराने मामले होने पर गवाहों के पते बदल जाने के चलते या कुछ गवाहों के पेश न होने के चलते लंबित रह जाते हैं। - रविंद्र शर्मा, अध्यक्ष, डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन
कई बार गवाह समय से नहीं पहुंच पाते हैं और कई बार साक्ष्य संकलन में देरी हो जाती है। इस कारण कुछ मुकदमे लंबित हो जाते हैं। न्यायपालिका साक्ष्य और संकलन के आधार पर चलती है। - धर्मेंद्र सिंह खालौर, महासचिव, डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन