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मौसम में गरमाहट ने कम कर दी गेहूं की बढ़वार

Thu, 08 Feb 2018 06:19 PM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बदायूं
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बदायूं Updated Thu, 08 Feb 2018 06:19 PM IST
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Weather effect on wheat crop
गेहूं की फसल के लिए तापमान में उतार-चढ़ाव नुकसानदेह साबित हो रहा है। एक तो कल्ले फूटने के समय फसल को जिस तरह से कोहरे की जरूरत थी, वह कम पड़ा। यह समय पौधों में बालियां निकलने का है पर दिन में तापमान बढ़ जाने से खेतों में नमी कम होने लगी है। मौसम की गरमाहट ने गेहूं के पौधों का कद पिछले साल के मुकाबले करीब 15 सेंटीमीटर तक कम कर दिया है। 
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इलाके के काश्तकारों ने एक मीटर या फिर उससे अधिक ऊंचाई वाली गेहूं की जिन प्रजातियों के बीज की बुआई की, उनमें डब्ल्यूएच- 1124, पीवी डब्ल्यू- 550, पीवी डब्ल्यू- 343, एचडी- 2967, एचडी-3086, पीवी डब्ल्यू-226, डीबीडल्यू- 17 और पीवी डब्ल्यू- 373 शामिल हैं। पीवी डब्ल्यू-373 को छोड़ दें तो बाकी सभी प्रजातियों के बीज की बुआई का सही समय नवंबर का महीना होता है लेकिन नवंबर के बजाय बुआई का काम दिसंबर महीने तक चला। नवंबर के अंतिम दिनों में गेहूं की फसल में कल्ले फूटने का समय होता है। कल्ले फूटने के लिए दिन का तापमान 18 डिग्री के आसपास रहना चाहिए। रात में तापमान तो ठीक रहा लेकिन उस समय भी दिन में मौसम में उतार-चढ़ाव की वजह से कल्ले प्रभावित हो गए। इसी तरह पौधों की बढ़वार के लिए दिसंबर लास्ट और जनवरी का पूरा महीना कोई ज्यादा ठीक नहीं रहा। इस समय तक पौधों की ऊंचाई आधा मीटर से ज्यादा नहीं हो पाई। मान लो कि एक-डेढ़ सप्ताह में थोड़ी बढ़वार हो जाएगी लेकिन पौधे एक मीटर ऊंचाई को छू नहीं पाएंगे। ऐसे में उत्पादन प्रति बीघा करीब 50 किलोग्राम कम रहने की आशंका भी बढ़ गई है। 
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भूसा कम निकलने से चारे की होगी किल्लत 
उझानी। गेहूं के पौधों की बढ़वार से अच्छे उत्पादन के साथ पशुुओं के लिए पर्याप्त मात्रा में भूसे के रूप में चारे का बंदोबस्त हो जाता है। जब पौधे ही छोटे रह जाएंगे तो भूसा कम निकलना भी स्वाभाविक बात है। पशुओं के लिए भूसा ही प्रमुख चारा है। हरा चारा भी भूसे में मिलाकर पशुओं को खिलाया जाता है। जब भूसा ही कम होगा तो पशुओं के लिए चारे का बंदोबस्त करने में पशुपालकों के लिए दिक्कत आएगी।
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बूंदाबांदी हो तो मिले पौधों को संजीवनी 
उझानी। आसमान में बादलों को देख यही लगता है कि फरवरी महीना में एक-दो बार बूंदाबांदी हो सकती है। बूंदाबांदी होने पर खेतों में नमी का माहौल बना तो गेहूं के पौधों की बढ़वार कुछ हद तक हो सकती है। इससे जहां फसल को सिंचाई का फायदा मिलेगा, वहीं पौधों पर धूल के कण बह जाने से उत्पादन थोड़ा-बहुत बढ़ सकता है। किसानों की मानें तो फसल को जो फायदा दो बार सिंचाई करने से नहीं होता, वह बूंदाबांदी से एक बार में मिल जाता है। 


मौसम में गरमाहट आलू और सरसों के लिए तो अच्छी है लेकिन गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा रही है। किसानों को गेहूं के खेतों में नमी बरकरार रखनी चाहिए। दिन में नमी रहने से खासकर रात के समय बालियों में दाने मजबूत हो सकते हैं। पौधों को नमी सोखने में एनर्जी खराब नहीं करनी पड़ेगी।
- डॉ. अर्जुन सिंह, कृषि वैज्ञानिक
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