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Budaun News: नगला मंदिर है कुछ खास, यहां शेर पर सवार हैं काली मां
Mon, 16 Oct 2023 11:38 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं
संवाद न्यूज एजेंसी, बदायूं
Updated Mon, 16 Oct 2023 11:38 AM IST
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शहर का नगला मंदिर। संवाद
बदायूं। नगला मंदिर जिले का प्रमुख देवी मंदिर है। साल के दोनों नवरात्र यहां भक्तों की भारी भीड़ रहती है। यह जिले के सर्वाधिक प्राचीन देवी मंदिरों में से एक है। नगला मंदिर की मिट्टी की प्राचीन मूर्ति के पास ही काली माता की भव्य प्रतिमा है। काली मां यहां शेर पर सवार हैं जो स्वरूप अन्य मंदिर में नहीं मिलता।
शक्तिपीठ नगला देवी मंदिर जिले के प्रमुख मंदिर में शुमार है। साल में आने वाले दोनों नवरात्र के दौरान भक्तों की भारी भीड़ रहती है। यह जिले के सर्वाधिक प्राचीन देवी मंदिरों में से एक है। इस मंदिर को धर्मकर्म के अलावा स्वतंत्रता आंदोलन से भी जोड़कर देखा जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1921 और 1929 में महात्मा गांधी बदायूं आए थे और उन्होंने जिले के क्रांतिकारियों में जज्बा बढ़ाया था। इसके बाद नगला शर्की के एक बाग में क्रांतिकारी बैठक किया करते थे। यहीं देवी की एक मिट्टी से बनी प्रतिमा थी। क्रांतिकारी इस प्रतिमा के पास कीर्तन के बहाने बैठते थे, ताकि अंग्रेजी सरकार को शक न हो। बाद में इसे मंदिर का रूप दे दिया गया। कई साल तक मंदिर स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र बना रहा। मंदिर के पुजारी शिव ओम शर्मा ने बताया कि मंदिर में भक्तों की मनोकामना पूरी होने के बाद वह अपनी श्रद्धानुसार चढ़ावा चढ़ाते हैं।
ऐसे करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा : नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में ऐसे वस्त्र पहनें, जिसमें सफेद और लाल रंग का मिश्रण हो। सफेद रंग का कमल चढ़ाएं, इस दौरान ह्रीं का जाप करें और माता की कथा पढ़े और अंत में आरती करें। मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय भोग शक्कर और पंचामृत है।
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शक्तिपीठ नगला देवी मंदिर जिले के प्रमुख मंदिर में शुमार है। साल में आने वाले दोनों नवरात्र के दौरान भक्तों की भारी भीड़ रहती है। यह जिले के सर्वाधिक प्राचीन देवी मंदिरों में से एक है। इस मंदिर को धर्मकर्म के अलावा स्वतंत्रता आंदोलन से भी जोड़कर देखा जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1921 और 1929 में महात्मा गांधी बदायूं आए थे और उन्होंने जिले के क्रांतिकारियों में जज्बा बढ़ाया था। इसके बाद नगला शर्की के एक बाग में क्रांतिकारी बैठक किया करते थे। यहीं देवी की एक मिट्टी से बनी प्रतिमा थी। क्रांतिकारी इस प्रतिमा के पास कीर्तन के बहाने बैठते थे, ताकि अंग्रेजी सरकार को शक न हो। बाद में इसे मंदिर का रूप दे दिया गया। कई साल तक मंदिर स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र बना रहा। मंदिर के पुजारी शिव ओम शर्मा ने बताया कि मंदिर में भक्तों की मनोकामना पूरी होने के बाद वह अपनी श्रद्धानुसार चढ़ावा चढ़ाते हैं।
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ऐसे करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा : नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा में ऐसे वस्त्र पहनें, जिसमें सफेद और लाल रंग का मिश्रण हो। सफेद रंग का कमल चढ़ाएं, इस दौरान ह्रीं का जाप करें और माता की कथा पढ़े और अंत में आरती करें। मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय भोग शक्कर और पंचामृत है।
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