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कांस्टेबल पापा को सेल्यूट करते देखा तो सोच लिया अफसर बनना है
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कांस्टेबल पिता व मां के साथ एसडीएम ज्योति शर्मा। संवाद
- फोटो : BADAUN
बदायूं। साधारण परिवार की बेटी ज्योति शर्मा कठिन परिश्रम की बदौलत पीसीएस अफसर बनकर लोगों को न्याय दिला रहीं हैं। कांस्टेबल पिता की तीन संतानों में सबसे बड़ी ज्योति अपनी पहली तैनाती में बदायूं आईं और इस समय बिसौली की एसडीएम हैं। छात्र जीवन में आम जनता की परेशानियों को महसूस कर चुकीं महिला अधिकारी सिस्टम के फाल्ट समझती हैं और प्रशासनिक चुस्ती से काम करने के लिए चर्चित हैं।
ज्योति शर्मा मूल रूप से मथुरा जिले की निवासी हैं। उनके पिता देवेंद्र शर्मा पुलिस में कांस्टेबल रहे जो अब प्रोन्नत होकर हेड कांस्टेबल हो चुके हैं। वह बताती हैं, पिता की शुरुआती तैनाती लखनऊ में रही तो वहीं दो कमरों के सरकारी क्वार्टर में उनका परिवार कई साल रहा। मां उमा शर्मा के अलावा परिवार में वह तीन बहन भाई वहां रहते थे। इनमें वह सबसे बड़ी हैं। उनकी छोटी बहन कीर्ति शर्मा लखनऊ विवि की गोल्ड मेडलिस्ट हैं और इस समय ओएनजीसी में वैज्ञानिक हैं। सबसे छोटे भाई दीपक शर्मा राष्ट्रीय वॉलीबॉॅल खिलाड़ी हैं।
बताया कि पिता की छोटी सी नौकरी में परिवार का खर्च और उन लोगों की पढ़ाई हुई। उन्हें याद है कि उन तीनों भाई-बहन की पढ़ाई के लिए पिता ने घर में नेट कनेक्शन कराया। मॉडम लगा था जिसमें महीने का एक जीबी डेटा तीन सौ रुपये में मिलता था। उसे वह सभी लोग हिसाब से खर्च करते थे। बताया कि पिता स्पोर्ट्समैन थे। अक्सर भाई-बहन पिता के साथ परेड ग्राउंड व पुलिस विभाग के खेल कार्यक्रमों में जाते थे। वहां देखते थे कि पिता अपने अफसरों को सेल्यूट कर पीछे खड़े हो जाते थे। उसी समय अधिकारी बनने का निश्चय कर लिया। पीसीएस के पहले प्रयास में 2017 में वह बीडीओ बनीं और छह महीने अयोध्या क्षेत्र में तैनात रहीं। दूसरे प्रयास में प्रशासनिक सेवा के लिए चुनी गईं और पहली तैनाती बदायूं में मिली।
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उन्होंने बताया कि बचपन में गांव जाती थीं तो वहां के लोगों की परेशानियां देखीं और महसूस की। पढ़ाई के दौरान प्रमाणपत्र बनवाने के लिए भी भाई-बहन घूमे हैं। उन्हें पता है कि बिना बात के किस तरह लेखपाल, बाबू के स्तर पर किस तरह काम अटका दिए जाते हैं। अकारण किसी के प्रमाणपत्र को निरस्त कर दिया जाता है। इसे लेकर आम व्यक्ति कितनी परेशानी झेलता है। इसलिए इन बातों पर उनका खास जोर रहता है कि गरीबों, कमजोरों, छात्र-छात्राओं को फिजूल की दिक्कत न हो। संवाद
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ज्योति शर्मा मूल रूप से मथुरा जिले की निवासी हैं। उनके पिता देवेंद्र शर्मा पुलिस में कांस्टेबल रहे जो अब प्रोन्नत होकर हेड कांस्टेबल हो चुके हैं। वह बताती हैं, पिता की शुरुआती तैनाती लखनऊ में रही तो वहीं दो कमरों के सरकारी क्वार्टर में उनका परिवार कई साल रहा। मां उमा शर्मा के अलावा परिवार में वह तीन बहन भाई वहां रहते थे। इनमें वह सबसे बड़ी हैं। उनकी छोटी बहन कीर्ति शर्मा लखनऊ विवि की गोल्ड मेडलिस्ट हैं और इस समय ओएनजीसी में वैज्ञानिक हैं। सबसे छोटे भाई दीपक शर्मा राष्ट्रीय वॉलीबॉॅल खिलाड़ी हैं।
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बताया कि पिता की छोटी सी नौकरी में परिवार का खर्च और उन लोगों की पढ़ाई हुई। उन्हें याद है कि उन तीनों भाई-बहन की पढ़ाई के लिए पिता ने घर में नेट कनेक्शन कराया। मॉडम लगा था जिसमें महीने का एक जीबी डेटा तीन सौ रुपये में मिलता था। उसे वह सभी लोग हिसाब से खर्च करते थे। बताया कि पिता स्पोर्ट्समैन थे। अक्सर भाई-बहन पिता के साथ परेड ग्राउंड व पुलिस विभाग के खेल कार्यक्रमों में जाते थे। वहां देखते थे कि पिता अपने अफसरों को सेल्यूट कर पीछे खड़े हो जाते थे। उसी समय अधिकारी बनने का निश्चय कर लिया। पीसीएस के पहले प्रयास में 2017 में वह बीडीओ बनीं और छह महीने अयोध्या क्षेत्र में तैनात रहीं। दूसरे प्रयास में प्रशासनिक सेवा के लिए चुनी गईं और पहली तैनाती बदायूं में मिली।
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उन्होंने बताया कि बचपन में गांव जाती थीं तो वहां के लोगों की परेशानियां देखीं और महसूस की। पढ़ाई के दौरान प्रमाणपत्र बनवाने के लिए भी भाई-बहन घूमे हैं। उन्हें पता है कि बिना बात के किस तरह लेखपाल, बाबू के स्तर पर किस तरह काम अटका दिए जाते हैं। अकारण किसी के प्रमाणपत्र को निरस्त कर दिया जाता है। इसे लेकर आम व्यक्ति कितनी परेशानी झेलता है। इसलिए इन बातों पर उनका खास जोर रहता है कि गरीबों, कमजोरों, छात्र-छात्राओं को फिजूल की दिक्कत न हो। संवाद