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मरियम ने ताने झेले पर हौसला रखा बुलंद
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मरियम। संवाद
- फोटो : BADAUN
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सैदपुर (बदायूं)। सीएचसी सैदपुर की नर्स मेंटर मरियम नारी शक्ति के जज्बे की नायाब तस्वीर हैं। मरियम जहां अपने काम में गुणवत्ता के दम पर लगातार पुरस्कार झटक रहीं हैं वहीं अपनी बहनों को भी अपने जैसा बनाने में लगी हैं। मरियम उन जिम्मेदारियों को पूरा करने के अंतिम चरण में हैं, जिनकी वजह से उन्होंने शादी से परहेज किया। मरियम ने खुद को लायक बनाने में काफी संघर्ष किया और परिवार ने ताने झेले।
पड़ोसी गांव हतरा की रहने वालीं मरियम बी की उम्र तीस साल है। वह 2015 से सीएचसी में संविदा की नौकरी कर रहीं हैं। मुख्य तौर पर उनकी ड्यूटी प्रसव कक्ष में रहती है। अच्छे काम की बदौलत मरियम व उनकी टीम को राज्य स्तरीय कालाकल्प अवॉर्ड मिल चुका है। बेहतर काम के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान में वह पुरस्कार पा चुकी हैं तो कलक्ट्रेट में भाषण प्रतियोगिता के दौरान भी मौजूदा डीएम दीपा रंजन से पुरस्कृत हो चुकी हैं।
काम में अव्वल मरियम के परिवार का जिक्र करें तो पिता पहले मुंबई में मामूली नौकरी करते थे। मरियम छह बहनों में सबसे बड़ी हैं तो मां के साथ परिवार की मुखिया के तौर पर फर्ज निभाती हैं। संघर्ष की कहानी सुनाते मरियम की आंखें भर आईं। बताया कि गांव में आठवीं तक ही स्कूल था। आगे की पढ़ाई पांच किमी पैदल चलकर या टेंपो से जाकर वजीरगंज के इंटर कॉलेज से की।
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वर्ष 2005 में जब नवीं में पढ़ने वजीरगंज जाने लगीं तो लोगों ने पिता को ताने दिए कि बेटी की शादी कर डालो। मरियम ने बताया कि इंटर के बाद बदायूं के कॉलेज से बीए किया पर रोजगार का साधन नहीं बना। प्राइवेट स्कूल में नौकरी के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था। ऐसे में मुंबई में रहने वाली बुआ ने राय दी कि जीएनएम का कोर्स कर लो। पिता के पास इतने पैसे नहीं थे तब उन्होंने एजूकेशन लोन लेकर बरेली से जीएनएम का कोर्स किया। दकियानूसी लोगों ने पिता से फिर कहा कि पढ़ाई पर रुपया खर्च करने की बजाय मरियम की शादी कर दो, जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी।
जीएनएम के बाद यहां नौकरी पा ली। इससे पहले कॉलेज की वार्डन की प्रेरणा से मरियम ने अपने से छोटी बहन नाजिया को भी जीएनएम की ट्रेनिंग कराई और अपने साथ सीएचसी में काम पर लगा लिया। तीसरे नंबर की बहन नाहिदा की शादी कर दी। मरियम और नाजिया अपनी कमाई से चौथी बहन तूबा को एएनएम का कोर्स करा रही हैं। पांचवी बहन उमरा बीए और छठी सुमैया इंटर में पढ़ रही हैं।
मरियम का कहना है कि बहनों को सक्षम बनाने का संकल्प लिया था जो पूरा होता दिख रहा है। उनके पिता कोरोना होने के बाद मुंबई से आ गए थे। डेढ़ साल से घर पर हैं। पिता चाहते हैं कि वह फिर मुंबई जाकर नौकरी करें पर वह सभी बहनें उन्हें नहीं जाने देतीं। आज अब्बा खुश हैं जो उन्होंने लोगों के तानों से डरकर उन्हें घर नहीं बैठाया। उन्हें अपनी बेटियों पर फख्र है। संवाद
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पड़ोसी गांव हतरा की रहने वालीं मरियम बी की उम्र तीस साल है। वह 2015 से सीएचसी में संविदा की नौकरी कर रहीं हैं। मुख्य तौर पर उनकी ड्यूटी प्रसव कक्ष में रहती है। अच्छे काम की बदौलत मरियम व उनकी टीम को राज्य स्तरीय कालाकल्प अवॉर्ड मिल चुका है। बेहतर काम के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान में वह पुरस्कार पा चुकी हैं तो कलक्ट्रेट में भाषण प्रतियोगिता के दौरान भी मौजूदा डीएम दीपा रंजन से पुरस्कृत हो चुकी हैं।
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काम में अव्वल मरियम के परिवार का जिक्र करें तो पिता पहले मुंबई में मामूली नौकरी करते थे। मरियम छह बहनों में सबसे बड़ी हैं तो मां के साथ परिवार की मुखिया के तौर पर फर्ज निभाती हैं। संघर्ष की कहानी सुनाते मरियम की आंखें भर आईं। बताया कि गांव में आठवीं तक ही स्कूल था। आगे की पढ़ाई पांच किमी पैदल चलकर या टेंपो से जाकर वजीरगंज के इंटर कॉलेज से की।
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वर्ष 2005 में जब नवीं में पढ़ने वजीरगंज जाने लगीं तो लोगों ने पिता को ताने दिए कि बेटी की शादी कर डालो। मरियम ने बताया कि इंटर के बाद बदायूं के कॉलेज से बीए किया पर रोजगार का साधन नहीं बना। प्राइवेट स्कूल में नौकरी के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था। ऐसे में मुंबई में रहने वाली बुआ ने राय दी कि जीएनएम का कोर्स कर लो। पिता के पास इतने पैसे नहीं थे तब उन्होंने एजूकेशन लोन लेकर बरेली से जीएनएम का कोर्स किया। दकियानूसी लोगों ने पिता से फिर कहा कि पढ़ाई पर रुपया खर्च करने की बजाय मरियम की शादी कर दो, जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी।
जीएनएम के बाद यहां नौकरी पा ली। इससे पहले कॉलेज की वार्डन की प्रेरणा से मरियम ने अपने से छोटी बहन नाजिया को भी जीएनएम की ट्रेनिंग कराई और अपने साथ सीएचसी में काम पर लगा लिया। तीसरे नंबर की बहन नाहिदा की शादी कर दी। मरियम और नाजिया अपनी कमाई से चौथी बहन तूबा को एएनएम का कोर्स करा रही हैं। पांचवी बहन उमरा बीए और छठी सुमैया इंटर में पढ़ रही हैं।
मरियम का कहना है कि बहनों को सक्षम बनाने का संकल्प लिया था जो पूरा होता दिख रहा है। उनके पिता कोरोना होने के बाद मुंबई से आ गए थे। डेढ़ साल से घर पर हैं। पिता चाहते हैं कि वह फिर मुंबई जाकर नौकरी करें पर वह सभी बहनें उन्हें नहीं जाने देतीं। आज अब्बा खुश हैं जो उन्होंने लोगों के तानों से डरकर उन्हें घर नहीं बैठाया। उन्हें अपनी बेटियों पर फख्र है। संवाद