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Budaun News: बदायूं में नहीं मिली जमीन, अब उन्नाव में वन विभाग को जगह देगा एनएचएआई
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बदायूं। बरेली-मथुरा नेशनल हाईवे के तीसरे चरण के काम में बदायूं जनपद में वन विभाग के 5660 पेड़ आड़े आ रहे हैं, जिनका कटान किया जाना है। इन पेड़ों के स्थान पर दूसरी जगह अन्य पौधे लगाने के लिए एनएचएआई ने वन विभाग के लिए दातागंज में जमीन देखी थी, पर वह वन विभाग को पसंद नहीं आयी। इसके बाद में वन विभाग को अब उन्नाव में जगह दी जा रही है। इसका प्रस्ताव बनाकर भारत सरकार को भेज दिया गया है।
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का बरेली-मथुरा मार्ग पर काम चल रहा है। इसमें कासगंज से बदायूं के बीच मार्ग का तीसरे चरण में चौड़ीकरण का काम किया जाएगा। वन विभाग करीब 48 हेक्टेयर जमीन पर लगे 5660 पेड़ एनएचएआई के काम में बाधक बन रहे हैं। ऐसे में ये पेड़ एनएचएआई की तरफ से काटे जाएंगे, लेकिन इनको कटाने से पहले एनएचएआई को वन विभाग को इन पेड़ों को लगाने के लिए जमीन मुहैया कराई जाएगी।
एनएचएआई जिला प्रशासन के सहयोग से जमीन की तलाश कर रहा था। प्रशासन को दातागंज तहसील क्षेत्र में जमीन मिली थी। इन जमीन को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अधिकारियों ने वन विभाग को दिखाई, पर जमीन पसंद नहीं आयी। इसके बाद में नए सिर से फिर जमीन की तलाश की जाने लगी। लेकिन जिले में जमीन नहीं मिल सकी।
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इसके बाद यूपी के अन्य जनपदों में जमीन की तलाश को शुरू कर दिया। अब चित्रकूट मंडल के उन्नाव जिले में एनएचएआई जमीन मिल गई। उन्होंने वन विभाग को जमीन दिखाने के बाद में भारत सरकार को प्रस्ताव बनाकर भेज दिया। अधिकारियों के अनुसार जल्द ही वहां से स्वीकृति मिल जाएंगी। इसके बाद में वन विभाग की ओर से वहां पर पौधरोपण किया जाएगा।
चार चरणों में होगा काम
बरेली-मथुरा नेशनल हाईवे का निर्माण चार चरणों में हो रहा है। पहले चरण में मथुरा से हाथरस, दूसरे में हाथरस से कासगंज, तीसरे में कासगंज से बदायूं और चौथे में बदायूं से बरेली के बीच हाईवे के चौड़ीकरण का काम होगा। हाईवे की चौड़ाई बढ़ाकर 45 मीटर की जाएगी। जिन स्थानों पर दूसरे मार्ग हाईवे को लिंक करेंगे, वहां की चौड़ाई 52 मीटर और हाईवे पर बनाए जाने वाले अंडरपासों की चौड़ाई 50 मीटर रखी जाएगी।
डूब क्षेत्र होने की वजह से किया मना
दातागंज में जो जगह देखी गई। उस जमीन पर वन विभाग ने डूब क्षेत्र बताते हुए जमीन लेने से मना कर दिया। उनका कहना है अगर यहां पर पेड़ लगाए भी गए, बारिश और बाढ़ के दिनों में यह क्षेत्र डूब जाएगा। इससे वहां लगे पौधे नष्ट होने की प्रबल संभावना है।
दातागंज में जो जगह देखी, वह वन विभाग को पसंद नहीं आयी, अब उन्नाव में जगह देखी है। उसका प्रस्ताव बनाकर भारत सरकार को भेज दिया है। - उत्कर्ष शुक्ला, परियोजना निदेशक
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भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का बरेली-मथुरा मार्ग पर काम चल रहा है। इसमें कासगंज से बदायूं के बीच मार्ग का तीसरे चरण में चौड़ीकरण का काम किया जाएगा। वन विभाग करीब 48 हेक्टेयर जमीन पर लगे 5660 पेड़ एनएचएआई के काम में बाधक बन रहे हैं। ऐसे में ये पेड़ एनएचएआई की तरफ से काटे जाएंगे, लेकिन इनको कटाने से पहले एनएचएआई को वन विभाग को इन पेड़ों को लगाने के लिए जमीन मुहैया कराई जाएगी।
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एनएचएआई जिला प्रशासन के सहयोग से जमीन की तलाश कर रहा था। प्रशासन को दातागंज तहसील क्षेत्र में जमीन मिली थी। इन जमीन को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के अधिकारियों ने वन विभाग को दिखाई, पर जमीन पसंद नहीं आयी। इसके बाद में नए सिर से फिर जमीन की तलाश की जाने लगी। लेकिन जिले में जमीन नहीं मिल सकी।
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इसके बाद यूपी के अन्य जनपदों में जमीन की तलाश को शुरू कर दिया। अब चित्रकूट मंडल के उन्नाव जिले में एनएचएआई जमीन मिल गई। उन्होंने वन विभाग को जमीन दिखाने के बाद में भारत सरकार को प्रस्ताव बनाकर भेज दिया। अधिकारियों के अनुसार जल्द ही वहां से स्वीकृति मिल जाएंगी। इसके बाद में वन विभाग की ओर से वहां पर पौधरोपण किया जाएगा।
चार चरणों में होगा काम
बरेली-मथुरा नेशनल हाईवे का निर्माण चार चरणों में हो रहा है। पहले चरण में मथुरा से हाथरस, दूसरे में हाथरस से कासगंज, तीसरे में कासगंज से बदायूं और चौथे में बदायूं से बरेली के बीच हाईवे के चौड़ीकरण का काम होगा। हाईवे की चौड़ाई बढ़ाकर 45 मीटर की जाएगी। जिन स्थानों पर दूसरे मार्ग हाईवे को लिंक करेंगे, वहां की चौड़ाई 52 मीटर और हाईवे पर बनाए जाने वाले अंडरपासों की चौड़ाई 50 मीटर रखी जाएगी।
डूब क्षेत्र होने की वजह से किया मना
दातागंज में जो जगह देखी गई। उस जमीन पर वन विभाग ने डूब क्षेत्र बताते हुए जमीन लेने से मना कर दिया। उनका कहना है अगर यहां पर पेड़ लगाए भी गए, बारिश और बाढ़ के दिनों में यह क्षेत्र डूब जाएगा। इससे वहां लगे पौधे नष्ट होने की प्रबल संभावना है।
दातागंज में जो जगह देखी, वह वन विभाग को पसंद नहीं आयी, अब उन्नाव में जगह देखी है। उसका प्रस्ताव बनाकर भारत सरकार को भेज दिया है। - उत्कर्ष शुक्ला, परियोजना निदेशक