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Budaun News: जनता दल की लहर में हार गए थे पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव
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बदायूं लोकसभा सीट: गठबंधन किए और अकेले भी लड़ी पर चालीस साल से नहीं जीत पाई कांग्रेस
यादव और मुस्लिम मतों का झुकाव शरद यादव की ओर होने की वजह से कमजोर पड़ गए थे रामनरेश
अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं। यादव बहुल लोकसभा क्षेत्र बदायूं में 1989 का चुनाव काफी दिलचस्प रहा। तब कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव और जनता दल के शरद यादव उम्मीदवार थे। यादव मतदाताओं के लिए दोनों में एक को चुनना था तब बहुमत के साथ लोग शरद यादव के पक्ष में आए और जनता दल को जिताया। उस समय मुस्लिम मतों का ज्यादा झुकाव जनता दल की ओर रहा था।
लोकसभा के लिए 17 बार चुनाव हुए। कांग्रेस ने बदायूं संसदीय क्षेत्र मे 16 चुनाव लड़े। सिर्फ 2014 के चुनाव में उम्मीदवार नहीं उतारा। कांग्रेस पांच बार जीती है। पांच बार जमानत जब्त हुई। कांग्रेस तीन बार दूसरे और तीन बार तीसरे स्थान पर रही। आखिरी बार 40 साल पहले 1984 में कांग्रेस से सलीम शेरवानी सांसद बने थे। अगर अतीत पर नजर डालते हैं तो 1952, 1957, 1971, 1980 और 1984 में कांग्रेस के उम्मीदवार जीते हैं। साल 1989 के चुनाव में तत्कालीन दिग्गज नेता और उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री रहे रामनरेश यादव को बदायूं में 92086 मतों के अंतर से हार मिली थी। राम नरेश यादव को 133626 (27.82 फीसदी) मत मिले थे। तब उनके मुकाबले शरद यादव ने जीत हासिल की थी।तब केंद्रीय मंत्री रहे जनता दल के शरद यादव ने 225712 मत पाकर उन्हें हराया था। शरद यादव को 47.00 फीसदी मत मिले थे।
पहली बार 1996 में जमानत नहीं बचा सकी। उस समय परवीन आजाद उम्मीदवार थीं। उनको 21449 यानि 4.06 फीसदी मत मिल सके थे। उसके बाद 1998 में कांग्रेस की जमानत जब्त हुई। तब कांग्रेस ने वर्तमान जिलाध्यक्ष ठाकुर ओमकार सिंह को प्रत्याशी बनाया था उन्हें मात्र 9532 वोट ( 1.51 फीसदी ) मिल सके। साल 1999 में भी कांग्रेस जमानत नहीं बचा सकी। कांग्रेस ने शांति देवी को प्रत्याशी बनाया था उन्हें 26418 (4.37 फीसदी) वोट मिले। 2004 में भी कांग्रेस के प्रत्याशी महबूब हुसैन अंसारी को 20359(3.45 फीसद) वोट मिले थे। कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में बदायूं सीट पर सबसे कम वोट पाने वाले प्रत्याशी का रिकार्ड ठाकुर ओंकार सिंह के खाते में दर्ज है। इसके बाद 2019 में बदायूं लोकसभा क्षेत्र से पांच बार के सांसद रहे सलीम इकबाल शेरवानी भी कांग्रेस के टिकट पर अपनी जमानत नहीं बचा सके थे। शेरवानी को 51947 ( 4.8 फीसदी) वोट ही मिल सके। तब ऐसा लगा कि बदायूं की सियासत में सलीम शेरवानी का रसूख लगभग समाप्त हो गया।
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इन चुनावों में कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही
1962 में कांग्रेस प्रत्याशी रघुवीर सहाय 46613 (21.93 फीसदी)
1991 में कांग्रेस के सलीम शेरवानी76680 (17.08 फीसदी)
2009 में सलीम शेरवानी कांग्रेस के टिकट पर 193834 (26.29 फीसदी)
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इन चुनावों में कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही
1967 में कांग्रेस दूसरे नम्बर पर रही उसके प्रत्याशी ए हरनामी को 54670 (18 फीसदी) मत मिले।
1977 में कांग्रेस के मुशीर अहमद 88904 (26.13 फीसदी) मत मिले।
1989 में कांग्रेस के राम नरेश यादव 133626 (27.82 फीसदी) मत मिले।
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बदन सिंह थे कांग्रेस के पहले सांसद
1952 पहले आम चुनाव में बदन सिंह 71074 मत पाए। कुल पड़े मतों में 54.21 फीसदी उनके पक्ष में मतदान हुआ। 1957: कांग्रेस के रघुवीर सहाय 88807 मत पाकर एकतरफा जीत हासिल की। उन्हें 44.24 फीसदी मत मिले। 1971 में कांग्रेस के करन सिंह यादव 90,504 मत पाकर जीते। उन्हें 34.19 फीसदी मत मिले थे। 1980 में कांग्रेस के मोहम्मद असरार अहमद 123603 मत पाकर जीते। उन्हें 38.28 फीसदी मत मिले थे। इसके बाद 1984 में कांग्रेस: सलीम इकबाल शेरवानी 183524 मत पाकर जीते। उन्हें 44.59 फीसदी मत मिले।
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1980 के दशक में बदली राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस परंपरागत जनाधार को जोड़कर नहीं रख सकी। न ही कोई नया जनाधार बनाने में सफल हो सकी, परिणाम स्वरूप हार होती रही। देश आज लोकतंत्र बनाम तानाशाही के बीच संघर्ष के दौर में है। कांग्रेस से लोगों को उम्मीद है। लोग वैचारिक तौर पर मंथन करेंगे तो कांग्रेस फिर से जीतेगी। -अजीत सिंह यादव, प्रदेश सचिव कांग्रेस
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मैं उस समय यूथ कांग्रेस में था। चुनाव देखकर तब हम लोग नहीं सोच रहे थे कि हार जाएंगे। लोग रामनरेश यादव की सादगी को पसंद कर रहे थे लेकिन 1989 में लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही सांप्रदायिक दंगा हो गया था। दंगे की आग में लोग झुलसे थे और कांग्रेस की सत्ता थी। इसलिए नुकसान उठाना पड़ा। वोट कम मिले थे। -ओमकार सिंह, जिलाध्यक्ष
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यादव और मुस्लिम मतों का झुकाव शरद यादव की ओर होने की वजह से कमजोर पड़ गए थे रामनरेश
अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं। यादव बहुल लोकसभा क्षेत्र बदायूं में 1989 का चुनाव काफी दिलचस्प रहा। तब कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव और जनता दल के शरद यादव उम्मीदवार थे। यादव मतदाताओं के लिए दोनों में एक को चुनना था तब बहुमत के साथ लोग शरद यादव के पक्ष में आए और जनता दल को जिताया। उस समय मुस्लिम मतों का ज्यादा झुकाव जनता दल की ओर रहा था।
लोकसभा के लिए 17 बार चुनाव हुए। कांग्रेस ने बदायूं संसदीय क्षेत्र मे 16 चुनाव लड़े। सिर्फ 2014 के चुनाव में उम्मीदवार नहीं उतारा। कांग्रेस पांच बार जीती है। पांच बार जमानत जब्त हुई। कांग्रेस तीन बार दूसरे और तीन बार तीसरे स्थान पर रही। आखिरी बार 40 साल पहले 1984 में कांग्रेस से सलीम शेरवानी सांसद बने थे। अगर अतीत पर नजर डालते हैं तो 1952, 1957, 1971, 1980 और 1984 में कांग्रेस के उम्मीदवार जीते हैं। साल 1989 के चुनाव में तत्कालीन दिग्गज नेता और उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री रहे रामनरेश यादव को बदायूं में 92086 मतों के अंतर से हार मिली थी। राम नरेश यादव को 133626 (27.82 फीसदी) मत मिले थे। तब उनके मुकाबले शरद यादव ने जीत हासिल की थी।तब केंद्रीय मंत्री रहे जनता दल के शरद यादव ने 225712 मत पाकर उन्हें हराया था। शरद यादव को 47.00 फीसदी मत मिले थे।
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पहली बार 1996 में जमानत नहीं बचा सकी। उस समय परवीन आजाद उम्मीदवार थीं। उनको 21449 यानि 4.06 फीसदी मत मिल सके थे। उसके बाद 1998 में कांग्रेस की जमानत जब्त हुई। तब कांग्रेस ने वर्तमान जिलाध्यक्ष ठाकुर ओमकार सिंह को प्रत्याशी बनाया था उन्हें मात्र 9532 वोट ( 1.51 फीसदी ) मिल सके। साल 1999 में भी कांग्रेस जमानत नहीं बचा सकी। कांग्रेस ने शांति देवी को प्रत्याशी बनाया था उन्हें 26418 (4.37 फीसदी) वोट मिले। 2004 में भी कांग्रेस के प्रत्याशी महबूब हुसैन अंसारी को 20359(3.45 फीसद) वोट मिले थे। कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में बदायूं सीट पर सबसे कम वोट पाने वाले प्रत्याशी का रिकार्ड ठाकुर ओंकार सिंह के खाते में दर्ज है। इसके बाद 2019 में बदायूं लोकसभा क्षेत्र से पांच बार के सांसद रहे सलीम इकबाल शेरवानी भी कांग्रेस के टिकट पर अपनी जमानत नहीं बचा सके थे। शेरवानी को 51947 ( 4.8 फीसदी) वोट ही मिल सके। तब ऐसा लगा कि बदायूं की सियासत में सलीम शेरवानी का रसूख लगभग समाप्त हो गया।
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इन चुनावों में कांग्रेस तीसरे स्थान पर रही
1962 में कांग्रेस प्रत्याशी रघुवीर सहाय 46613 (21.93 फीसदी)
1991 में कांग्रेस के सलीम शेरवानी76680 (17.08 फीसदी)
2009 में सलीम शेरवानी कांग्रेस के टिकट पर 193834 (26.29 फीसदी)
इन चुनावों में कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही
1967 में कांग्रेस दूसरे नम्बर पर रही उसके प्रत्याशी ए हरनामी को 54670 (18 फीसदी) मत मिले।
1977 में कांग्रेस के मुशीर अहमद 88904 (26.13 फीसदी) मत मिले।
1989 में कांग्रेस के राम नरेश यादव 133626 (27.82 फीसदी) मत मिले।
बदन सिंह थे कांग्रेस के पहले सांसद
1952 पहले आम चुनाव में बदन सिंह 71074 मत पाए। कुल पड़े मतों में 54.21 फीसदी उनके पक्ष में मतदान हुआ। 1957: कांग्रेस के रघुवीर सहाय 88807 मत पाकर एकतरफा जीत हासिल की। उन्हें 44.24 फीसदी मत मिले। 1971 में कांग्रेस के करन सिंह यादव 90,504 मत पाकर जीते। उन्हें 34.19 फीसदी मत मिले थे। 1980 में कांग्रेस के मोहम्मद असरार अहमद 123603 मत पाकर जीते। उन्हें 38.28 फीसदी मत मिले थे। इसके बाद 1984 में कांग्रेस: सलीम इकबाल शेरवानी 183524 मत पाकर जीते। उन्हें 44.59 फीसदी मत मिले।
1980 के दशक में बदली राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस परंपरागत जनाधार को जोड़कर नहीं रख सकी। न ही कोई नया जनाधार बनाने में सफल हो सकी, परिणाम स्वरूप हार होती रही। देश आज लोकतंत्र बनाम तानाशाही के बीच संघर्ष के दौर में है। कांग्रेस से लोगों को उम्मीद है। लोग वैचारिक तौर पर मंथन करेंगे तो कांग्रेस फिर से जीतेगी। -अजीत सिंह यादव, प्रदेश सचिव कांग्रेस
मैं उस समय यूथ कांग्रेस में था। चुनाव देखकर तब हम लोग नहीं सोच रहे थे कि हार जाएंगे। लोग रामनरेश यादव की सादगी को पसंद कर रहे थे लेकिन 1989 में लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही सांप्रदायिक दंगा हो गया था। दंगे की आग में लोग झुलसे थे और कांग्रेस की सत्ता थी। इसलिए नुकसान उठाना पड़ा। वोट कम मिले थे। -ओमकार सिंह, जिलाध्यक्ष