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दिलकश बदायूंनी ने दोहा शैली में लिखा हिंदुस्तान का इंतिहास
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किताबों से भरे कमरे में मौजूद शायल दिलकश बदायूंनी।संवाद
- फोटो : BADAUN
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बदायूं। देश अंग्रेजों की गुलामी से उबरने के दौर में था। उसी दौरान वर्ष 1946 में पैदा हुए शायर व इतिहासकार दिलकश बदायूंनी अब बुजुर्ग होने के साथ शारीरिक रूप से कमजोर हो चुके हैं। बरेली रोड से सटे नई सराय मोहल्ले की तंग गली में बने घर में वह अब भी अपना अधिकांश वक्त किताबों के बीच रहकर गुजारते हैं। वह दोहा चौपाई और छंद की शैली में बदायूं से लेकर दिल्ली तक का इतिहास लिख चुके हैं।
कादरचौक क्षेत्र के लोहाठेर गांव के मूल निवासी दिलकश बदायूंनी अपने जमाने के चुनिंदा शायरों में एक रहे हैं। शनिवार को बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी पुरानी यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि उनका असली नाम अलाउद्दीन है। उनके पिता शमसुद्दीन शम्स अपने जमाने के नामचीन शायर थे। उन्हें शायरी पिता से विरासत में मिली। उस जमाने में अलाउद्दीन ने बदायूं से इंटरमीडिएट किया और फिर उर्दू में आगे की पढ़ाई की। इस बीच उन्हें बदायूं नगर पालिका में क्लर्क की नौकरी मिल गई। फिर नगर पालिका इंटर कॉलेज में रहे। तत्कालीन अधिकारियों ने उनका साहित्य व शायरी में लगाव देखकर उन्हें नगर पालिका की लाइब्रेरी में तैनात कर दिया।
दिलकश बदायूंनी ने बताया कि यहीं से उनका साहित्यिक सफर शुरू हो गया। मुशायरा के आयोजनों में शिरकत के साथ ही उन्होंने शायरी और अपने पसंदीदा विषय इतिहास लेखन को आगे बढ़ाया। इतिहास की तमाम पुस्तकों को पढ़ने के साथ ही उन्होंने जिज्ञासा शांत करने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में काफी समय बिताया। फिलहाल दिलकश बदायूंनी की बैठक का कमरा उनकी किताबों के साथ ही उर्दू व हिंदी की तमाम दूसरे लेखकों की पुस्तकों से लबरेज है। उनका रहने से लेकर सोने तक का ज्यादा वक्त इसी कमरे में किताबों के साथ गुजरता है।
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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी व अटल बिहारी कर चुके हैं पुस्तक का विमोचन
दिलकश बदायूंनी की करीब दो दर्जन पुस्तकें विभिन्न विषयों पर प्रकाशित हुईं हैं। इनमें रुबाई, नज्म, गजल, कतआत और बच्चों के हास्य व्यंग्य से जुड़ी रचनाएं शामिल हैं। इनमें इतिहास के आइने में बदायूं पुस्तक का विमोचन प्रधानमंत्री रहने के दौरान अटल बिहारी बाजपेई ने संसद भवन स्थित अपने निजी कार्यालय में किया था। इतिहास पर लिखी दूसरी पुस्तक का विमोचन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था।
वक्त के साथ बदली शायरी और शायर
दिलकश बदायूंनी का अधिकांश साहित्य व लेखन मुगल शासकों के दौर से जुड़ा है। हालांकि उनका दावा है कि उन्होंने राजा ययाति से लेकर वैदिक काल तक के इतिहास को अपनी पुस्तकों में शामिल किया है। इतिहास लेखन का तरीका भी दोहा, चौपाई व छंद के रूप में किया गया है। वह स्वीकार करते हैं कि शायरी का तरीका उनके जमाने से अब बहुत बदल चुका है। कवि व शायर समाज की नब्ज समझकर रचनाएं बनाते और सुनाते हैं। बदलते दौर के साथ बदलना मजबूरी है। बदलाव नहीं करेंगे तो लोग शायरों को खारिज कर देंगे।
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कादरचौक क्षेत्र के लोहाठेर गांव के मूल निवासी दिलकश बदायूंनी अपने जमाने के चुनिंदा शायरों में एक रहे हैं। शनिवार को बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी पुरानी यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि उनका असली नाम अलाउद्दीन है। उनके पिता शमसुद्दीन शम्स अपने जमाने के नामचीन शायर थे। उन्हें शायरी पिता से विरासत में मिली। उस जमाने में अलाउद्दीन ने बदायूं से इंटरमीडिएट किया और फिर उर्दू में आगे की पढ़ाई की। इस बीच उन्हें बदायूं नगर पालिका में क्लर्क की नौकरी मिल गई। फिर नगर पालिका इंटर कॉलेज में रहे। तत्कालीन अधिकारियों ने उनका साहित्य व शायरी में लगाव देखकर उन्हें नगर पालिका की लाइब्रेरी में तैनात कर दिया।
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दिलकश बदायूंनी ने बताया कि यहीं से उनका साहित्यिक सफर शुरू हो गया। मुशायरा के आयोजनों में शिरकत के साथ ही उन्होंने शायरी और अपने पसंदीदा विषय इतिहास लेखन को आगे बढ़ाया। इतिहास की तमाम पुस्तकों को पढ़ने के साथ ही उन्होंने जिज्ञासा शांत करने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में काफी समय बिताया। फिलहाल दिलकश बदायूंनी की बैठक का कमरा उनकी किताबों के साथ ही उर्दू व हिंदी की तमाम दूसरे लेखकों की पुस्तकों से लबरेज है। उनका रहने से लेकर सोने तक का ज्यादा वक्त इसी कमरे में किताबों के साथ गुजरता है।
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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी व अटल बिहारी कर चुके हैं पुस्तक का विमोचन
दिलकश बदायूंनी की करीब दो दर्जन पुस्तकें विभिन्न विषयों पर प्रकाशित हुईं हैं। इनमें रुबाई, नज्म, गजल, कतआत और बच्चों के हास्य व्यंग्य से जुड़ी रचनाएं शामिल हैं। इनमें इतिहास के आइने में बदायूं पुस्तक का विमोचन प्रधानमंत्री रहने के दौरान अटल बिहारी बाजपेई ने संसद भवन स्थित अपने निजी कार्यालय में किया था। इतिहास पर लिखी दूसरी पुस्तक का विमोचन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था।
वक्त के साथ बदली शायरी और शायर
दिलकश बदायूंनी का अधिकांश साहित्य व लेखन मुगल शासकों के दौर से जुड़ा है। हालांकि उनका दावा है कि उन्होंने राजा ययाति से लेकर वैदिक काल तक के इतिहास को अपनी पुस्तकों में शामिल किया है। इतिहास लेखन का तरीका भी दोहा, चौपाई व छंद के रूप में किया गया है। वह स्वीकार करते हैं कि शायरी का तरीका उनके जमाने से अब बहुत बदल चुका है। कवि व शायर समाज की नब्ज समझकर रचनाएं बनाते और सुनाते हैं। बदलते दौर के साथ बदलना मजबूरी है। बदलाव नहीं करेंगे तो लोग शायरों को खारिज कर देंगे।