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Bijnor News: सभी मुरादें पूरी करता हैं बाबा झारखंड शिव मंदिर
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हमारे शिवालय
फाल्गुन मास की शिवरात्रि पर दूर दराज के भक्त करते हैं जलाभिषेक
संवाद न्यूज एजेंसी
चांदपुर। श्रद्घालुओं की आस्था का प्रतीक बाबा झारखंड शिव मंदिर पर महाशिवरात्रि पर आठ मार्च की रात्रि 12.10 बजे से जलाभिषेक शुरू होगा। मंदिर के प्राकृतिक शिवलिंग की पूजा अर्चना करने वाले श्रद्घालुओं की सभी कामनाएं पूरी होती हैं।
चांदपुर से करीब दो किलोमीटर दूर स्याऊ-छाछरी मार्ग स्थित बाबा झारखंड शिव मंदिर से जुड़ी कई घटनाएं बताई जाती हैं। गांव स्याऊ निवासी रायबहादुर आर्य बताते हैं कि करीब पांच सौ साल पहले यहां घना जंगल हुआ करता था। ग्वाला गांव के लोगों के पशु चराने यहां आता था। पशुओं में एक गाय जंगल के बीच स्थित ऊंचे टीले पर जाकर एक स्थान पर रूक जाती थी। उसके थन से स्वयं ही दूध निकलने लगता था। थोड़ी देर बाद गाय वहां से चली जाती थी।
कई दिनों तक गाय का दूध निकलता देख ग्वाले ने गाय मालिक को बताया। गांववासियों ने उस स्थान पर खुदाई की तो काफी गहराई में शिवलिंग दिखाई दिया। इसके बाद गांववासियों ने उस स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया। प्रत्येक सोमवार को मंदिर पर मेले जैसा दृश्य रहता है।
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मंदिर परिसर में मोनी बाबा की समाधि भी
मंदिर परिसर में विशाल झील के बीच में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु लक्ष्मी मंदिर, श्रीहनुमान मंदिर, मां दुर्गा मंदिर, सरभंग बाबा की समाधि, शंकर पार्वती परिवार मंदिर, मोनी बाबा की समाधि, यज्ञ शाला, शनि देवता मंदिर, गायत्री माता मंदिर, विशाल पीपल देवता वृक्ष, वट देवता वृक्ष आदि मौजूद हैं। मान्यता है कि मोनी बाबा की समाधि भी शिव भक्तों की मुराद पूरी करते हैं।
यह स्थान सिद्ध पीठ है। काफी पुराना स्थान है। करीब 20 किलोमीटर दूर तक के भक्त यहां कांवड़ चढ़ाने आते हैं। मंदिर में पूजा-अर्चना करने से भक्तों की मुराद पूरी होती है। - अशोक गिरि गोस्वामी, पुजारी
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फाल्गुन मास की शिवरात्रि पर दूर दराज के भक्त करते हैं जलाभिषेक
संवाद न्यूज एजेंसी
चांदपुर। श्रद्घालुओं की आस्था का प्रतीक बाबा झारखंड शिव मंदिर पर महाशिवरात्रि पर आठ मार्च की रात्रि 12.10 बजे से जलाभिषेक शुरू होगा। मंदिर के प्राकृतिक शिवलिंग की पूजा अर्चना करने वाले श्रद्घालुओं की सभी कामनाएं पूरी होती हैं।
चांदपुर से करीब दो किलोमीटर दूर स्याऊ-छाछरी मार्ग स्थित बाबा झारखंड शिव मंदिर से जुड़ी कई घटनाएं बताई जाती हैं। गांव स्याऊ निवासी रायबहादुर आर्य बताते हैं कि करीब पांच सौ साल पहले यहां घना जंगल हुआ करता था। ग्वाला गांव के लोगों के पशु चराने यहां आता था। पशुओं में एक गाय जंगल के बीच स्थित ऊंचे टीले पर जाकर एक स्थान पर रूक जाती थी। उसके थन से स्वयं ही दूध निकलने लगता था। थोड़ी देर बाद गाय वहां से चली जाती थी।
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कई दिनों तक गाय का दूध निकलता देख ग्वाले ने गाय मालिक को बताया। गांववासियों ने उस स्थान पर खुदाई की तो काफी गहराई में शिवलिंग दिखाई दिया। इसके बाद गांववासियों ने उस स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया। प्रत्येक सोमवार को मंदिर पर मेले जैसा दृश्य रहता है।
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मंदिर परिसर में मोनी बाबा की समाधि भी
मंदिर परिसर में विशाल झील के बीच में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु लक्ष्मी मंदिर, श्रीहनुमान मंदिर, मां दुर्गा मंदिर, सरभंग बाबा की समाधि, शंकर पार्वती परिवार मंदिर, मोनी बाबा की समाधि, यज्ञ शाला, शनि देवता मंदिर, गायत्री माता मंदिर, विशाल पीपल देवता वृक्ष, वट देवता वृक्ष आदि मौजूद हैं। मान्यता है कि मोनी बाबा की समाधि भी शिव भक्तों की मुराद पूरी करते हैं।
यह स्थान सिद्ध पीठ है। काफी पुराना स्थान है। करीब 20 किलोमीटर दूर तक के भक्त यहां कांवड़ चढ़ाने आते हैं। मंदिर में पूजा-अर्चना करने से भक्तों की मुराद पूरी होती है। - अशोक गिरि गोस्वामी, पुजारी