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Basti News: आंखों से नहीं, अनुभूति से मां का स्वरूप गढ़ रहे रामपाल
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बस्ती के बबुरहवा में मूर्ति बनाते रामपाल।-संवाद
- फोटो : Samvad
बस्ती। सूरदास ने कृष्ण की बाल लीलाओं और उनके रूप-सौंदर्य का ऐसा सजीव वर्णन किया कि भक्ति साहित्य में उनके ‘अंतःचक्षु’ की मिसाल दी जाने लगी। आंखों से परे अनुभूति की इसी दुनिया की एक झलक बस्ती के बबुरहवा चौराहे पर भी दिखाई देती है। यहां जन्म से दृष्टिहीन रामपाल 24 वर्षों से मिट्टी में मां का स्वरूप गढ़ रहे हैं।
रामपाल मां की प्रतिमा बनाते समय उसका चेहरा देख नहीं सकते, लेकिन मिट्टी को छूकर उसके आकार को महसूस करते हैं। उंगलियां चेहरे की गोलाई टटोलती हैं और धीरे-धीरे वही मिट्टी देवी के स्वरूप में बदलती जाती है। सूरदास की अनुभूति शब्दों में कृष्ण को सजीव करती थी, रामपाल की अनुभूति मिट्टी से आस्था का चेहरा गढ़ रही है।
इनसेट
कोलकाता के रहने वाले हैं रामपाल
रामपाल मूल रूप से कोलकाता के निकुंज नगर, शांतिपुर क्षेत्र के रहने वाले हैं। उनके तीन भाई हैं और तीनों ही जन्म से दृष्टिहीन हैं। पिता विनय कृष्ण पाल ने बेटों को हुनर देने का फैसला किया। उन्होंने ही रामपाल को महज चार साल की उम्र में प्रतिमा बनाने का काम सिखाना शुरू किया। बांस की खपच्चियां काटने, जोड़ने और बांधने से लेकर मिट्टी चढ़ाने और प्रतिमा को आकार देने तक का हुनर सीखने में करीब दस साल लग गए।
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इनसेट
जख्मी हुए हाथ, फिर भी जारी रहा अभ्यास
हमारी टीम से बातचीत में रामपाल ने बताया कि शुरुआती दिनों में हथौड़ी और कील से हाथ जख्मी होते थे, कई बार प्रतिमा बिगड़ी भी, लेकिन अभ्यास जारी रहा। धीरे-धीरे उनकी उंगलियां मिट्टी की नमी और बनावट पहचानने लगीं। अब वह सिर्फ स्पर्श के सहारे चेहरे की गोलाई, नाक, होंठ और शरीर की आकृति तक तय कर लेते हैं। मूर्तियों में वह हानिकारक रंगों और प्लास्टर ऑफ पेरिस आदि का प्रयोग नहीं करते हैं। उनकी कला और जीवन पर एक प्रमुख पेंट कंपनी लघु फिल्म भी बना चुकी है।
इनसेट
24 साल से बबुरहवा में बना रहे मूर्तियां
रामपाल ने बताया कि वह 42 साल से मूर्तिकारी करते हैं। उनके पूरे क्षेत्र के लोगों का यही कारोबार है। वह जाति के कुम्हार हैं। मिट्टी से ही मूर्तिकारी करते हैं। बस्ती के बबुरहवा में करीब 24 साल से रह रहे हैं। मार्च-अप्रैल तक वह परिवार के साथ बबुरहवा आते हैं और करीब छह माह तक मूर्तियां बनाते हैं। इस साल उन्होंने दुर्गाजी की 45 मूर्तियां बनाई हैं और पांच अन्य मूर्ति बनाई हैं।
इनसेट
पहले से बुक होती हैं मूर्तियां
रामपाल बताते हैं कि वे पत्नी कंचना, बेटा सौरभ व बहू के साथ बैसाख में आ गए थे। परिवार के लोगों और मजदूरों के साथ उन्होंने मूर्तियां बनाई हैं। इनमें कई प्रतिमाएं तो पहले से ही बुक हो चुकी हैं। हर साल पर्याप्त कमाई हो जाती है, जिससे परिवार का खर्च चलता है। इसमें स्थानीय लोगों का भी सहयोग मिलता है। क्षेत्र के लोग उनके हुनर की सराहना करते हुए अच्छा व्यवहार करते हैं। वहीं, दो दशक से रामपाल की इस अनोखी कला को देखते ही हर कोई मानो ठहर सा जाता है।
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रामपाल मां की प्रतिमा बनाते समय उसका चेहरा देख नहीं सकते, लेकिन मिट्टी को छूकर उसके आकार को महसूस करते हैं। उंगलियां चेहरे की गोलाई टटोलती हैं और धीरे-धीरे वही मिट्टी देवी के स्वरूप में बदलती जाती है। सूरदास की अनुभूति शब्दों में कृष्ण को सजीव करती थी, रामपाल की अनुभूति मिट्टी से आस्था का चेहरा गढ़ रही है।
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कोलकाता के रहने वाले हैं रामपाल
रामपाल मूल रूप से कोलकाता के निकुंज नगर, शांतिपुर क्षेत्र के रहने वाले हैं। उनके तीन भाई हैं और तीनों ही जन्म से दृष्टिहीन हैं। पिता विनय कृष्ण पाल ने बेटों को हुनर देने का फैसला किया। उन्होंने ही रामपाल को महज चार साल की उम्र में प्रतिमा बनाने का काम सिखाना शुरू किया। बांस की खपच्चियां काटने, जोड़ने और बांधने से लेकर मिट्टी चढ़ाने और प्रतिमा को आकार देने तक का हुनर सीखने में करीब दस साल लग गए।
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जख्मी हुए हाथ, फिर भी जारी रहा अभ्यास
हमारी टीम से बातचीत में रामपाल ने बताया कि शुरुआती दिनों में हथौड़ी और कील से हाथ जख्मी होते थे, कई बार प्रतिमा बिगड़ी भी, लेकिन अभ्यास जारी रहा। धीरे-धीरे उनकी उंगलियां मिट्टी की नमी और बनावट पहचानने लगीं। अब वह सिर्फ स्पर्श के सहारे चेहरे की गोलाई, नाक, होंठ और शरीर की आकृति तक तय कर लेते हैं। मूर्तियों में वह हानिकारक रंगों और प्लास्टर ऑफ पेरिस आदि का प्रयोग नहीं करते हैं। उनकी कला और जीवन पर एक प्रमुख पेंट कंपनी लघु फिल्म भी बना चुकी है।
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24 साल से बबुरहवा में बना रहे मूर्तियां
रामपाल ने बताया कि वह 42 साल से मूर्तिकारी करते हैं। उनके पूरे क्षेत्र के लोगों का यही कारोबार है। वह जाति के कुम्हार हैं। मिट्टी से ही मूर्तिकारी करते हैं। बस्ती के बबुरहवा में करीब 24 साल से रह रहे हैं। मार्च-अप्रैल तक वह परिवार के साथ बबुरहवा आते हैं और करीब छह माह तक मूर्तियां बनाते हैं। इस साल उन्होंने दुर्गाजी की 45 मूर्तियां बनाई हैं और पांच अन्य मूर्ति बनाई हैं।
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पहले से बुक होती हैं मूर्तियां
रामपाल बताते हैं कि वे पत्नी कंचना, बेटा सौरभ व बहू के साथ बैसाख में आ गए थे। परिवार के लोगों और मजदूरों के साथ उन्होंने मूर्तियां बनाई हैं। इनमें कई प्रतिमाएं तो पहले से ही बुक हो चुकी हैं। हर साल पर्याप्त कमाई हो जाती है, जिससे परिवार का खर्च चलता है। इसमें स्थानीय लोगों का भी सहयोग मिलता है। क्षेत्र के लोग उनके हुनर की सराहना करते हुए अच्छा व्यवहार करते हैं। वहीं, दो दशक से रामपाल की इस अनोखी कला को देखते ही हर कोई मानो ठहर सा जाता है।